प्रधान संपादक की कलम से

हनुमान अंश के निर्माण की असली कहानी इस पर पूरी तरह खरी उतरती है. इसके निर्माता चतुर्वेदी किसी चलन को भुनाने वाले फिल्म उद्योग के दिग्गज नहीं, बल्कि सच्चे भक्त हैं जिन्होंने अंतरात्मा की पुकार पर यह फिल्म बनाई

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28 अक्तूबर, 2026 का आवरण

भारत की सड़कों पर भले ही सियासी जोश छाया हुआ हो लेकिन बड़े पर्दे पर उफान कहीं और से आ रहा है. और वह है धार्मिक आस्था. एकांतप्रिय और जीवन भर भीड़-भाड़ से दूर रहने वाले गुरु नीब करौरी बाबा पर बनी फिल्म अगस्त की शुरुआत में रिलीज होने के बाद से अब तक दो करोड़ से ज्यादा लोगों को सिनेमाघरों तक खींचकर ला चुकी है.

लेखक-निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की महज 1.7 करोड़ रुपए के बजट में बनी फिल्म हनुमान अंश दुनिया भर में 400 करोड़ रु. से ज्यादा कमा चुकी है और कमाई अभी जारी है. मुंहजबानी प्रचार से फिल्म को मिली जबरदस्त कामयाबी उसके आंकड़ों से कहीं बड़ी सांस्कृतिक परिघटना बन गई है.

दर्शक सिनेमाघरों में चप्पल-जूते उतारकर बैठते और प्रार्थना करते हैं और रह-रहकर उनकी आंखें भर आती हैं. उत्तराखंड में गुरु के कैंची धाम में अचानक भीड़ बढ़ गई है और सोनी ने तो उन पर धारावाहिक बनाने का काम शुरू कर दिया है.

सच पूछिए तो यह अब तक का सबसे साफ संकेत है कि भारत का लोकप्रिय सिनेमा आखिर किस दिशा में बढ़ रहा है. अगले कुछ सीजन तक बॉक्स ऑफिस का बड़ा भार देवताओं के कंधों पर होगा.

जल्द आ रही विशाल परियोजना में पुराणों की चमक पर्दे पर सबसे भव्य रूप में दिखाई देगी. दीपावली पर सितारों से सजी रामायण: द राइज ऑफ अ लेजेंड (पार्ट 1) सिनेमाघरों के पर्दे पर उतरेगी. इस लोकप्रिय महाकाव्य के अब तक आ चुके अनगिनत रूपांतरणों के बावजूद अब उस पर यह नई कृति दिखाती है कि उद्योग आस्था आधारित फिल्मों पर कितना बड़ा दांव लगाने को तैयार है.

रणबीर कपूर राम, साई पल्लवी सीता, सनी देओल हनुमान और यश रावण बने हैं. विशेष भूमिकाओं या हास्य किरदारों को छोड़ दें तो शायद यह पहली बार है जब हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा का कोई स्टार पर्दे पर देवता बनकर पुराने दौर के दक्षिणी नायकों की राह चलेगा.

दो भागों वाली इस परियोजना के 4,000 करोड़ रुपए के बजट में नवीनतम स्पेशल इफेक्ट्स और ए.आर. रहमान तथा जर्मन संगीतकार हांस जिमर का साझा संगीत भी होगा. जाहिर है, फिल्म का प्रदर्शन ही तय करेगा कि यह चलन कितने समय तक टिकने वाला है.

इसके पीछे एक लंबी कतार है. 2027 में रामायण (पार्ट 2) के साथ कई दूसरी फिल्में आस्थावान दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में होंगी. इसकी शुरुआत जनवरी में अक्षय खन्ना की महाकाली से होगी. फरवरी में दो एनिमेशन फिल्में आएंगी—एक दुर्गा पर और दूसरी हनुमान पर, जिनको पूरी तरह एआइ से रचा गया है.

इन्हें चूकने वाले नियमित फीचर फिल्में देख सकेंगे—काली और हनुमान पर एक-एक और फिल्म, साथ ही परशुराम पर एनिमेटेड फीचर. इसमें वे फिल्में शामिल नहीं जो कि हनुमान अंश से प्रेरित होने के बाद आध्यात्मिक गुरुओं पर बन रही हैं.

एक फिल्म में राजस्थान के चौदहवीं सदी के संत रामदेव पीर पर्दे पर अवतरित होंगे, जबकि दूसरी हमारे समय के करीब के देवरहा बाबा को जीवंत करेगी, जो भक्तों को पैरों से आशीर्वाद देने के लिए मशहूर थे.

2 अक्तूबर, 2013

इन्हें लेकर जो लोग भी किंतु-परंतु कर रहे हों वे बॉक्स ऑफिस के आंकड़े देख सकते हैं. 2025 में महावतार नरसिंह ने करीब 250 करोड़ रु. कमाए. किसी भारतीय एनिमेशन फिल्म की यह अभूतपूर्व कमाई थी. जनवरी में कृष्ण पर बनी फिल्म गुजराती सिनेमा की अब तक की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्म बनी.

नरसिंह के निर्देशक अश्विन कुमार इस लहर का तर्क साफ-सीधे शब्दों में रखते हैं. वे कहते हैं, “अगर एक करोड़ लोग कुंभ मेले में जा सकते हैं तो इससे साफ है कि आस्था की कहानियां चाहने वाला बहुत बड़ा जनसमूह मौजूद है. हमें बस वे कथाएं लानी हैं जिनमें उनका सच्चा विश्वास हो, और उन्हें पूरे आत्मविश्वास से बनाना है.”

हनुमान अंश के निर्माण की असली कहानी इस पर पूरी तरह खरी उतरती है. इसके निर्माता चतुर्वेदी किसी चलन को भुनाने वाले फिल्म उद्योग के दिग्गज नहीं, बल्कि सच्चे भक्त हैं जिन्होंने अंतरात्मा की पुकार पर यह फिल्म बनाई. नीब करौरी बाबा 1973 में दुनिया से विदा हो गए थे लेकिन उनका कैंची धाम श्रद्धालुओं को खींचता रहा.

1974 में 19 साल के हिप्पी और कॉलेज छोड़ चुके स्टीव जॉब्स भी वहां पहुंचे थे. यही श्रद्धा उन्होंने मार्क जुकरबर्ग तक पहुंचाई. चतुर्वेदी ने जब फिल्म शुरू की तो वे ऐसी दुनिया से कोसों दूर थे. पैसे जुटाना कठिन था, समय भी बेहद कम. ऐसे में ऐन मौके पर पैदा हुए संकट में सहायक निर्देशक शोभिनव सत्या को रातोरात मुख्य अभिनेता बनना पड़ा.

पहले हफ्ते की फीकी 90 लाख रुपए की कमाई के बाद चतुर्वेदी और सत्या ने शहर-शहर जाकर सिनेमाघरों में दर्शकों से इस फिल्म की चर्चा दूसरों से करने की अपील की. उसके बाद वह हुआ जो नीब करौरी बाबा की कथा के अनुरूप था.

आस्था और भक्ति सिनेमा की कोई नई खोज नहीं है. भारत की पहली फीचर फिल्म, दादासाहेब फाल्के की 1913 में बनी राजा हरिश्चंद्र पौराणिक कथा ही थी और उनकी अगली तीन फिल्में भी. दरअसल, 1931 से पहले मूक युग में बनी 1,388 फिल्मों में करीब 1,000 हमारे विशाल देवमंडल से प्रेरित थीं.

इस तरह की ब्लॉकबस्टर का यह सिलसिला कभी रुका नहीं—1936 की संत तुकाराम से लेकर 1975 की जय संतोषी मां तक, जिसने शोले को कड़ी टक्कर दी. 1980 के दशक में दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत की ऐतिहासिक कामयाबी बदलते राजनैतिक माहौल से भी जुड़ गई. इसलिए हैरानी नहीं कि 2016 में बनी आरएसएस समर्थित संस्था भारतीय चित्र साधना धार्मिक विषयों वाली फिल्मों को सक्रियता से बढ़ावा दे रही है.

मगर केवल राजनीति सिनेमाघर नहीं भरती. डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह की आवरण कथा बताती है कि इस लहर के पीछे आस्थावान दर्शक पहले से तैयार हैं. दादी-नानी की रात की कहानियों में जीवंत होने वाले किरदार अब सराउंड साउंड और आधुनिक ग्राफिक्स के साथ आते हैं. भक्ति पुरानी है. फिल्मों के जादू से जुड़ा तमाशा नया. मगर कमाई बिल्कुल असली.

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