दोनों पक्षों के अपने-अपने दांव
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोप कांग्रेस की अगुआई वाले विपक्ष और सीजेपी के लिए बड़ा मुद्दा बने. लेकिन इस बार भाजपा और केंद्र के पास है उससे निबटने की जवाबी योजना. तो किसके हाथ लगेगी बाजी?

इंडिया समूह के नेता 12 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करते हुए
इस महीने की शुरुआत में एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री रोजमर्रा के सरकारी काम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले और शिष्टाचारवश उनका हाल पूछा. हमेशा जोश से भरे और विचारों-टिप्पणियों से लैस रहने वाले प्रधानमंत्री इस बार शांत थे. उन्होंने कहा, “आप जानते हैं कि क्या हो रहा है.” सचमुच, पूरा देश जानता है. मोदी सरकार ने 12 साल में शाहीन बाग के सीएए-विरोधी प्रदर्शन, किसानों की घेराबंदी और पहलवानों का धरना झेला है.
वे लड़ाइयां कानूनों, नीतियों या व्यक्तियों को लेकर थीं. इस बार सवाल रेफरी पर है. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने 23 सितंबर को छापा कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के नाम से जारी फैसलों पर 14 लिखित आपत्तियां उठाई थीं. इनमें ज्यादातर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) से जुड़ी थीं.
इन खुलासों ने विपक्ष के आरोपों को संस्थागत आधार दिया और वे सरकार के खिलाफ नया नारा बन गए. कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान में सबूतों की कमी दिख रही थी, लेकिन चुनाव आयोग के भीतर की असहमति ने उन्हें नया हथियार दे दिया. चुनौती छात्र-नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) से भी आई, जिसने प्रश्नपत्र लीक विवाद पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा पहले ही करा दिया था.
नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह अस्तित्व का सवाल था. वह मन मारकर कोई कानून वापस ले सकती थी या किसी मंत्री की बलि दे सकती थी, लेकिन मतदाता सूचियों में खामी मानने से उसके अपने जनादेश पर सवाल उठ सकता था. हलचल तेज हुई तो तीनों पक्षों की अलग-अलग रणनीतियां सामने आईं.
यह रही पहली चाल
राहुल गांधी ने 23 सितंबर को “वोट चोरी” को भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग का “देशद्रोही कृत्य” बताया. 30 सितंबर को 19 विपक्षी दलों ने ‘जनता के मताधिकार की चोरी’ के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ने का संकल्प लिया.
आंदोलन तेजी से बढ़ा—आकाशवाणी भवन पर आठ घंटे का धरना (छह अक्तूबर), ज्ञानेश कुमार को हटाने और एसआइआर रोकने की मांग लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात (नौ अक्तूबर), और अनुच्छेद 32 के तहत साझा याचिका दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक इंडिया ब्लॉक का मार्च (12 अक्तूबर).
कांग्रेस के डेटा एनालिटिक्स विभाग के चेयरमैन और राज्यसभा सांसद प्रवीण चक्रवर्ती कहते हैं कि विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें असर दिखाने लगी हैं. उनके मुताबिक, एक अनौपचारिक छोटे सर्वे से पता चलता है कि आम मतदाता भी अब पूछने लगे हैंः “कुछ तो हो रहा है और सरकार चुप है. तो क्यों चुप है?” चक्रवर्ती मानते हैं कि इस मामले में केंद्र की चुप्पी ने मुश्किल बढ़ाई है. वे पूछते हैं, “छिपाने को कुछ नहीं है तो चुनाव आयोग प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं कर रहा?”
लोकसभा सांसद और तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष मणिकम टैगोर का दावा है कि संकट ने मोदी सरकार का विधायी कार्यक्रम पहले ही बिगाड़ दिया है. सरकार ने त्योहारों से पहले विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई थी. वे आरोप लगाते हैं, “उनकी योजना सत्र बुलाकर परिसीमन कानून पारित कराने की थी.” लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
चुनावी प्रक्रिया पर संदेह और आशंकाओं के बावजूद कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों का बहिष्कार नहीं कर रही. राज्यसभा सांसद और एआइसीसी के मीडिया तथा प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा कहते हैं, “हम मोदी को अपनी पसंद का विपक्ष चुनने के लिए मैदान खाली नहीं छोड़ सकते.”
कानूनी हमला कुछ ज्यादा बारीक है. इंडिया ब्लॉक की याचिका एसआइआर कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के 27 मई के फैसले को सीधे चुनौती नहीं देती.
वह सधा हुआ सवाल उठाती हैः क्या यह कवायद कानून के मुताबिक और आयोग के सामूहिक फैसलों से हुई? याचिका में चुनाव आयोग की फाइलों और डेटाबेस एक्सेस लॉग तक पहुंच, बूथवार हटाए गए मतदाताओं की जानकारी, स्वतंत्र ऑडिट और एसआइआर पर अंतरिम रोक मांगी गई है. कोशिश न्यायिक जांच को इस ओर मोड़ने की है कि आयोग की शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह हुआ.
इधर कॉकरोच डटे मोर्चे पर
अक्तूबर की 10 तारीख को सीजेपी को स्थापित राजनैतिक दलों से अलग अपनी भीड़ जुटाने की क्षमता दिखानी थी. मगर उसके नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका की उड़ान दिल्ली उतरते ही पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.
जंतर मंतर के चार किलोमीटर दायरे को प्रतिबंधित क्षेत्र बनाकर सील कर दिया गया, 45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश बंद कर दिया गया और जंतर मंतर वाले इलाके मध्य दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया. बैरिकेड लगाकर प्रदर्शनकारियों को जुटने से रोका गया. दिल्ली पुलिस ने करीब 2,500 लोगों की हिरासत की बात कही, जबकि सुप्रीम कोर्ट के याचिकाकर्ताओं ने संख्या 7,000 बताई.
कार्रवाई के बाद रणनीति बदलनी पड़ी. सीजेपी नेतृत्व ने 12 अक्तूबर को करीब 150 प्रदेश संयोजकों के साथ बैठक करके आंदोलन को विकेंद्रित करने का फैसला किया. दीपके ने मुंबई में जेल भरो आंदोलन का ऐलान किया, जबकि महाराष्ट्र के संयोजक अजिंक्य शिंदे ने गोवा, बेंगलूरू, कोलकाता और रांची में प्रदर्शन का प्रस्ताव रखा. उन्होंने समर्थकों से कहा, “जहां भी आपको रोका जाएगा, वही आपका जंतर मंतर बन जाएगा.”
दिल्ली पुलिस ने 13 अक्तूबर को जंतर मंतर का तयशुदा प्रदर्शन स्थल का दर्जा वापस ले लिया. सीजेपी ने तुरंत “हमें हमारा जंतर मंतर वापस दो” को अपना नया नारा बना लिया.
अगले दिन तिरंगा लेकर बैरिकेड पार करने वाले दास और रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अपनी गिरफ्तारी को तिरंगा उठाने की सजा बताकर सीजेपी ने प्रदर्शन स्थल के विवाद को देशभक्ति और लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल बना दिया.
केंद्रीय मंच न मिलने पर सीजेपी अब अपने प्रदर्शन अलग-अलग जगह फैला रही है और पुलिस कार्रवाई को राजनैतिक प्रचार में बदल रही है. यह रणनीति उसे सुर्खियां और ऑनलाइन नाराजगी तो दिला सकती है, लेकिन वह इसे सरकार पर लंबे समय तक दबाव में बदल पाएगी या नहीं, यह साफ नहीं है.
साथ भी, अलग भी
बहरहाल, कांग्रेस और सीजेपी का रिश्ता प्रतिस्पर्धी दूरी से सतर्क मेलजोल तक पहुंचा है. दास और रांका की गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी ने कहा कि जंतर मंतर पर तिरंगा लहराना “अपराध नहीं” और इसके लिए युवाओं को जेल भेजना “कायरता” है.
दीपके ने उनका शुक्रिया अदा किया. मगर न इस बयान में, न राहुल के पहले के इस दावे में कि “सभी विरोध एक हैं”, सीजेपी का नाम लिया गया. कांग्रेस सीजेपी को बराबर का साझेदार माने बिना व्यापक आंदोलन की अगुआई करना चाहती है. सार्वजनिक रूप से उसका रुख सहयोगी है.
खेड़ा कहते हैं, “वे जो भी हों, उनका समर्थन कोई भी कर रहा हो, फिलहाल यह मायने नहीं रखता, जब तक वे लड़ रहे हैं.” लेकिन निजी तौर पर हिसाब अलग है. कांग्रेस के एक नेता के मुताबिक, सीजेपी अभी चुनावी खतरा नहीं लेकिन पार्टी बनाकर चुनाव लड़ी तो बन सकती है. तब तक “उन्हें खुला मैदान मिल सकता है.”
उधर, सीजेपी सरकारी दमन और कांग्रेस में समा जाने—दोनों से सतर्क है. दीपके इसे “राजनैतिक दबाव समूह” बताते हैं, जो दलों का समर्थन तो चाहता है लेकिन इंडिया ब्लॉक के अभियान में विलय नहीं. 10 अक्तूबर के बाद उन्होंने चेताया कि “अलग-अलग प्रदर्शनों के साथ अलग व्यवहार करके सरकार संदेह और अविश्वास पैदा करती है.” रांका रणनीति समझाते हैं, “सहयोग हमेशा एक ही मंच पर, एक ही समय होना जरूरी नहीं. अलग-अलग दिशाओं से दबाव बनना चाहिए.”
केंद्र का गुणा-गणित
सरकार की प्रतिक्रिया में जुलाई वाला अनुभव शामिल था. तब उसने सीजेपी को कई हफ्ते जंतर मंतर पर डटे रहने और संसद तक मार्च करने दिया था. फिर लाठीचार्ज में 100 से ज्यादा छात्र घायल हुए. पुलिस कार्रवाई की तस्वीरों ने सहानुभूति जगाई और आंदोलन फैल गया. कुछ ही हफ्तों के भीतर प्रधान शिक्षा मंत्रालय से बाहर थे और मोदी ने सभी मांगें मान ली थीं.
भाजपा का आकलन था कि उसकी गलती ताकत के इस्तेमाल से ज्यादा आंदोलन को जुटने, सहानुभूति पाने और लोगों का ध्यान खींचने के लिए समय तथा जगह देने में थी. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के नीलांजन सरकार कहते हैं, “वे पिछली बार जैसी कोई तस्वीर नहीं चाहते.”
दस अक्तूबर की योजना इसे रोकने के लिए बनी थी. लाठीचार्ज नहीं हुआ. ज्यादातर हिरासत में लिए गए लोगों को शाम तक छोड़ दिया गया, जबकि सीजेपी के तीनों नेता अगली सुबह रिहा हुए. रणनीति का दूसरा हिस्सा ज्ञानेश कुमार से जुड़ा है, जिनके मामले में सरकार के पास ज्यादा गुंजाइश नहीं. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने इंडिया टुडे से कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किसी भी कार्रवाई को चुनाव में हेरफेर की स्वीकारोक्ति माना जाएगा और इससे सरकार की वैधता पर ही सवाल उठेगा.
गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने अनुच्छेद 370 हटाने वाला कानून तैयार करने में भी मदद की थी. उन्हें संवैधानिक सुरक्षा हासिल है. मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी प्रक्रिया से ही पद से हटाया जा सकता है. इसलिए सरकार के पास उनके खिलाफ कदम उठाने की खास वजह नहीं है.
तीसरा हिस्सा बहुत सोच-समझकर किया गया काम का बंटवारा है. शाह ने एसआइआर के राजनैतिक बचाव की जिम्मेदारी संभाली है. राहुल पर “घुसपैठियों” को बचाने का उनका आरोप बहस का रुख बदलने की कोशिश है.
इससे शाह विपक्षी हमलों का मुख्य निशाना भी बनते हैं और मोदी काफी हद तक सीधी मार से बाहर रहते हैं. भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन का “विदेशी ताकतों” की भूमिका का आरोप घिसी-पिटी प्रतिक्रिया लग सकता है, लेकिन पार्टी के अंदरूनी आकलन के मुताबिक, जुलाई के उलट इस बार यह आरोप उसके मूल समर्थकों पर असर डाल रहा है.
चौथा हिस्सा सबसे ज्यादा सोचा-समझा है. भाजपा स्थापित दलों के प्रदर्शनों को लेकर सहज है और विपक्षी नेताओं को कुछ घंटों के लिए हिरासत में लेना उसे ज्यादा महंगा नहीं पड़ता. उसकी चिंता दलीय ढांचों से बाहर के युवाओं पर सीजेपी का असर है. इसलिए ‘विदेशी संबंधों’ वाले कॉकरोचों को सुरक्षा समस्या माना जाता है, जबकि कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट के पास मार्च करने दिया जाता है और हारा हुआ पक्ष बताकर खारिज कर दिया जाता है.
इंसाफ का तराजू
मगर एक पक्ष ऐसा है जिसे सरकार पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकती—न्यायपालिका. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पांच अक्तूबर को चुनाव आयोग का यह दावा खारिज कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित फॉर्म-6 घोषणा को मंजूरी दी थी. 11 अक्तूबर को जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी.
मोहना ने बंदिशों से जुड़ी अवमानना याचिका पर नोटिस जारी किया और मेट्रो, रेल तथा इंटरनेट सेवाएं बहाल करने का आदेश दिया. सरकार को उम्मीद रही होगी कि अदालतें एसआइआर को संस्थागत कवच देंगी, लेकिन उन्होंने अब अपने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.
सरकार बैरिकेड की लड़ाई जीतकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद पर बनाए रख सकती है, लेकिन हर बंद सड़क विरोधियों को नई शिकायत पकड़ा देती है. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट दखल देकर तय कर सकता है कि रेफरी कब तक जांच से बचा रहेगा. कांग्रेस को ताकतवर मुद्दा मिला है,
लेकिन लड़ाई जारी रखने के लिए उसे संगठन की ताकत दिखानी होगी. सीजेपी में टिके रहने की ऊर्जा है, मगर बदलाव कराने का असर अभी नहीं. फिलहाल लंबा टकराव तय दिखता है और भाजपा को भरोसा है कि वह विरोधियों को थका देगी.


