बढ़ा भरोसा निजी क्षेत्र पर

डीआरडीओ की विकसित की हुई मिसाइल टेक्नोलॉजी निजी कंपनियों को सौंपने का सरकार का फैसला युद्ध की तैयारी मजबूत करने की दिशा में अहम कदम. सैन्य-औद्योगिक आधार खड़ा करने के लिहाज से भी यह निर्णायक साबित होने वाला

defence: MISSILE production
पोकरण रेंज में 27 फरवरी 2026 को जमीन से हवा में मार करने वाली आकाश मिसाइल प्रणाली का परीक्षण

आधुनिक युद्ध में ताकतवर मिसाइल फोर्स के लिए घरेलू उद्योग जरूरी है जो सेना को लगातार सप्लाइ दे सके. मोदी सरकार की आत्मनिर्भर भारत नीति में सैन्य साजो-सामान के स्वदेशी उत्पादन पर खास ध्यान दिया गया है. अगस्त के आखिर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के एक निर्णायक फैसले से इसे नई ताकत मिली.

अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) अपनी विकसित की गई पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की टेक्नोलॉजी भारतीय निजी रक्षा कंपनियों को दे सकेगा. मकसद बड़े पैमाने पर मिसाइल उत्पादन, पर्याप्त भंडार और मजबूत सैन्य-औद्योगिक आधार बनाना है.

पहले डीआरडीओ शोध-विकास और भारत डायनामिक्स लिमिटेड जैसे रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (डीपीएसयू) उत्पादन संभालते थे. निजी कंपनियां पुर्जे और सब-सिस्टम सप्लाइ करती थीं. नई नीति प्राइवेट सेक्टर को तकनीकी शर्तों और नियामक मंजूरियों के साथ पूरी मिसाइल बनाने देगी. उत्पादन से परीक्षण, अपग्रेड और दीर्घकालीन सहायता तक एमएसएमई की भागीदारी बढ़ाना और आयात घटाना भी नई नीति का मकसद है.

अग्नि और पनडुब्बी से दागी जाने वाली के-सीरीज बैलिस्टिक मिसाइलों समेत रणनीतिक तथा एटमी क्षमता वाली प्रणालियां सरकारी नियंत्रण में रहेंगी. विदेशी साझेदारी वाला ब्रह्मोस कार्यक्रम भी इससे बाहर है. दायरे में गैर-एटमी वारहेड वाली आकाश और आकाश-एनजी, नजर की हद से परे मार करने वाली अस्त्र, कंधे से दागी जाने वाली वायु रक्षा प्रणाली वीशोरैड्स (वेरी शॉर्ट रेंज एअर डिफेंस सिस्टम), रुद्रम एंटी-रेडिएशन, नाग और सैंट एंटी-टैंक, नेवल एंटी-शिप मिसाइल-शॉर्ट रेंज तथा क्वासी-बैलिस्टिक मिसाइल प्रलय शामिल हैं.

रक्षा सचिव और डीआरडीओ प्रमुख का काम संभाल रहे राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, सितंबर 2026 के मध्य तक करीब 50 मिसाइलों की टेक्नोलॉजी उपलब्ध कराई जा चुकी थी. यह 1,100 से ज्यादा औद्योगिक साझेदारों को हुए 2,300 से ज्यादा टेक्नोलॉजी हस्तांतरण का हिस्सा है.

हस्तांतरण नॉमिनेशन से नहीं, प्रतिस्पर्धी बोली से होगा. कंपनियां टेक्नोलॉजी हस्तांतरण (टीओटी) अधिकार और डीआरडीओ के साथ विकास-सह-उत्पादन साझेदार (डीसीपीपी) बनने की होड़ में उतरेंगी. चयन में तकनीकी क्षमता, वित्तीय मजबूती, ढांचा, हाइ-एनर्जी सामग्री समेत जरूरी लाइसेंस, मंजूरियां और उत्पादन बढ़ाने की क्षमता देखी जाएगी.

यह क्षमता के आधार पर चुनी हुई मिसाइल परियोजनाएं निजी कंपनियों को देने की पहले की व्यवस्था का विस्तार है. निजी भागीदारी से लागत घटने और उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है. मिसाल है पिनाक मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर, जिसे डीआरडीओ और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (टीएएसएल) ने विकसित किया. इसके हिस्से टीएएसएल, लार्सन ऐंड टुब्रो, सोलर इंडस्ट्रीज, यंत्र इंडिया और म्यूनिशंस इंडिया ने बनाए. प्रोटोटाइप मिसाइलें भी तेजी से उत्पादन में लाई जा सकेंगी.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य और डीआरडीओ के पूर्व चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी ने 29 सितंबर को ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव साउथ’ में बताया कि संशोधित टीओटी ढांचे में ट्रांसफर शुल्क और रॉयल्टी माफ है. इससे सरकारी मदद से विकसित मिसाइल शोध और पेटेंट घरेलू निर्माताओं को मिल सकेंगे...डीसीपीपी मॉडल से '' निजी कंपनियों को शुरुआती डिजाइन से जोड़कर डीआरडीओ ने उन्हें उन्नत टेक्नोलॉजी अपनाने और प्रमुख इंटीग्रेटर बनने में मदद की. इससे निजी उद्योग आकाश, अस्त्र, नाग एटीजीएम और एमआरएसएएम जैसे कार्यक्रमों की सब-असेंबली बनाने लगा.”

रक्षा का ईको-सिस्टम
जानकारों के मुताबिक, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के टकरावों में मिसाइलों की कमी से बड़े पैमाने पर उत्पादन की जरूरत महसूस हुई. निजी कंपनियों की भागीदारी से सेना पर्याप्त भंडार रख सकेगी. डीआरडीओ अगली पीढ़ी के शोध-परीक्षण पर ध्यान देगा, जबकि उद्योग उत्पादन, सप्लाइ चेन और सहायता संभालेगा.

लेकिन एक जैसी गुणवत्ता और न्यूनतम नाकामी के साथ लगातार जटिल प्रणालियां बनाना चुनौती है. इसके लिए डीआरडीओ, स्टार्टअप, निजी उद्योग, डीपीएसयू और एमएसएमई को सेना तथा निर्यात बाजारों से जोड़ती सप्लाइ चेन चाहिए.

निजी कंपनियां तय ऑर्डर, मुनाफा और निर्यात चाहती हैं; सेना भरोसेमंद प्रणालियां, आपसी तालमेल और युद्ध में हथियारों की तेज सप्लाइ. निजी पूंजी और क्षमता लाते हुए कारोबारी हितों को सैन्य जरूरतों पर हावी होने से रोकना होगा.

मिसाइलों के टेलीमेट्री, गाइडेंस सिस्टम बनाने वाली अस्त्र माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स के प्रबंध निदेशक एम.वी. रेड्डी कहते हैं, “निजी कंपनियां रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों के एकाधिकार को चुनौती दे सकती हैं. इससे स्पर्धा बढ़ेगी, लागत घटेगी, सप्लाइ का समय सुधरेगा.”

सुरक्षा और बचाव
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. रवि गुप्ता के मुताबिक, दशकों के मार्गदर्शन से उद्योग की तकनीकी क्षमता इतनी मजबूत हुई है कि मिसाइल सब-सिस्टम बना रही कंपनियां अब पूरी टेक्नोलॉजी अपना सकती हैं.

बड़े पैमाने पर भरोसेमंद उत्पादन के मुद्दे पर गुप्ता कहते हैं, “पैमाना मांग पर निर्भर करेगा—रक्षा मंत्रालय कितनी मात्रा में और कितनी कुशलता से ऑर्डर देता है. उद्योग महंगी सुविधाओं में निवेश करके उन्हें कम ऑर्डर या नौकरशाही की देरी से खाली नहीं रखना चाहेगा.”

लेकिन वे आगाह करते हैं, “निजी क्षेत्र में एकाधिकार का जोखिम है, जहां कुछ बड़े घराने प्रतिस्पर्धा खत्म कर दें.” उनके मुताबिक, सावधानी से हस्तांतरण और तय प्रक्रियाओं से जोखिम घटेंगे. डीआरडीओ के एक पूर्व प्रमुख कहते हैं, “साइबर समेत सुरक्षा जोखिम घटाने के लिए उचित प्रक्रियाएं बनानी होंगी.”

सुरक्षा उपाय नीति के केंद्र में हैं. टेक्नोलॉजी कड़ी पात्रता पूरी करने वाली कंपनियों को ट्रांसफर होगी. गुणवत्ता, बौद्धिक संपदा और भविष्य के अपग्रेड पर डीआरडीओ की निगरानी रहेगी लेकिन कंपनियों को कुशल कर्मचारियों और खास सुविधाओं में भारी निवेश करना होगा.

डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख के मुताबिक, निजी उद्योग अभी सेना की जरूरत के मुताबिक बड़े पैमाने पर भरोसेमंद उन्नत मिसाइलें नहीं बना सकता. पुर्जे बनाने के बावजूद कमियां हैं, मसलन, बड़े व्यास के रॉकेट मोटरों की प्रोपेलेंट कास्टिंग क्षमता अपर्याप्त है.

प्रोपल्शन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीकर्स और इंटीग्रेशन क्षमता वाली सोलर डिफेंस ऐंड एअरोस्पेस, लार्सन ऐंड टुब्रो और भारत फोर्ज उत्पादन तथा परीक्षण ढांचे में निवेश कर सकती हैं. एम.वी. रेड्डी कहते हैं कि सेना से बड़ा ठेका मिले बिना इतने खर्च को सही ठहराना मुश्किल होगा.

डीआरडीओ के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कहते हैं, “अच्छी मिसाइल विकसित करके परीक्षण करना काफी नहीं. बड़ी संख्या में उत्पादन और युद्ध में भंडार की भरपाई की क्षमता भी चाहिए.” उनके मुताबिक, डीआरडीओ की नई टेक्नोलॉजी को सरकारी और निजी उद्योग की उन्नत उत्पादन क्षमता का साथ मिलना चाहिए. वे कहते हैं, “बड़ी सैन्य ताकतों ने इसी तरह क्षमता बनाई है.”

गुणवत्ता नियंत्रण, बड़े पैमाने पर उत्पादन और निवेश निजी क्षेत्र के लिए चुनौतियां हैं. फिर भी नई नीति रक्षा उद्योग को आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी सैन्य-औद्योगिक तंत्र बनाने की राह पर ले जाती है. निजी कंपनियों की बनाई भारतीय मिसाइलें इसका अहम हिस्सा होंगी.

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