कॉकपिट में घुसा बैठा दुश्मन
दुबई से तेल अवीव जा रही एक फ्लाइट में सह-पायलट ने भारतीय कैप्टन पर हमला कर सुरक्षा की ऐसी खामी को सामने ला दिया जिससे निबटना उड्डयन क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ

यूएई के उप-प्रधानमंत्री अबू धाबी में तीन अक्तूबर को कैप्टन स्मित मच्छर का हाल पूछते हुए
बड़ा सीधा-सा नियम है हवाई जहाज में सुरक्षा का—जिसे विमान में नहीं होना चाहिए, उसे पायलटों से दूर रखा जाए. 11 सितंबर, 2001 यानी 9/11 हमले के बाद इस नियम को एक मजबूत सुरक्षा तंत्र में बदल दिया गया, कॉकपिट के दरवाजे मजबूत बनाए गए, उसके अंदर जाने के नियमों को सख्त किया गया, बैकग्राउंड जांच शुरू हुई और क्रू की सुरक्षा के नए तरीके अपनाए जाने लगे.
लेकिन उस स्थिति में क्या किया जा सकता है जब खतरा पहले से ही कॉकपिट के अंदर मौजूद हो? 30 सितंबर को फ्लाइदुबई की दुबई से तेल अवीव जाने वाली फ्लाइट एफजेड-1073 में हुई घटना ने इसे एक बार फिर बड़ा सवाल बना दिया.
आरोप है कि सह-पायलट हमाम अल-हमामी ने कॉकपिट में रखी कुल्हाड़ी (क्रैश एक्स) से भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला कर दिया. संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अभियोजकों ने इसे “आतंकी हमला” करार दिया है.
सैन्य और विमानन विश्लेषक आर्य घोष कहते हैं, “अगर कैप्टन मच्छर ने अदम्य मानसिक और शारीरिक साहस न दिखाया होता तो विमान में सवार सभी 174 लोगों की जान चली जाती और प्लेन तबाह हो जाता.” खून से लथपथ होने के बावजूद मच्छर ने हमलावर का मुकाबला कर किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया.
बोइंग 737 मैक्स 8 विमान में 174 यात्री और चालक दल के आठ सदस्य सवार थे. प्लेन में करीब 21 टन ईंधन रख सकते हैं. अगर कोई इसे किसी घनी आबादी वाले शहर में क्रैश करा दे तो बड़े पैमाने पर तबाही होगी.
ऐसा ही एक हादसा जून 2025 में हुआ था, जब एअर इंडिया की फ्लाइट एआइ171 अहमदाबाद में उड़ान भरने के तुरंत बाद एक हॉस्टल की इमारत से टकरा गई थी. विमान में सवार 241 और जमीन पर मौजूद 19 लोगों की मौत हो गई थी.
जब अंदर ही हो खतरा
इस घटना ने सुरक्षा की एक बहुत गंभीर चूक को उजागर किया है. एअरलाइन पायलट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष कैप्टन सैम थॉमस कहते हैं, “ट्रेनिंग के दौरान पायलट को ऐसा कुछ भी नहीं सिखाया जाता जिससे कि अपने ही सह-पायलट के हिंसक होकर उस पर हमला कर देने की स्थिति में वह अपना बचाव कर सके.”
9/11 के बाद कॉकपिट का मजबूत दरवाजा बाहरी हमलावरों को रोकने का सबसे बड़ा हथियार बना लेकिन ठीक दस साल पहले जर्मनविंग्स की फ्लाइट 9525 के हादसे ने दिखाया था कि जब खतरा अंदर ही हो, तब क्या होता है.
24 मार्च, 2015 को फ्रेंच आल्प्स के ऊपर उड़ान भरते समय कैप्टन के कुछ देर के लिए कॉकपिट से बाहर जाते ही सह-पायलट ने अंदर से लॉक कर लिया, प्लेन की ऊंचाई घटाई और कैप्टन को वापस अंदर नहीं आने दिया. आल्प्स की पहाड़ियों से टकराने के कारण एयरबस ए320 में सवार सभी 150 लोग मारे गए.
इस हादसे के बाद यूरोप ने कड़े साइकोलॉजिकल टेस्ट, डॉक्टरों की सख्त निगरानी और पायलट सपोर्ट प्रोग्राम शुरू किए. लेकिन भारत का ढांचा अलग है. फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स के अध्यक्ष कैप्टन सी.एस. रंधावा कहते हैं, “कई देशों में पायलटों की भर्ती के दौरान साइकोमेट्री टेस्ट अनिवार्य होता है. भारत में ऐसा कोई नियम नहीं है...एअरलाइंस अपनी प्रक्रिया के हिसाब से खुद सब कुछ करती हैं.”
इस रिपोर्ट के लिए संपर्क करने पर भारतीय एयरलाइंस के प्रतिनिधियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि भर्ती के समय साइकोलॉजिकल टेस्ट, बैकग्राउंड चेक और बाकी जांच से “जो भी संभव है” वह सब किया जा रहा है. जोखिम बढ़ रहा है. भारत में फिलहाल लगभग 10,000 कमर्शियल पायलट हैं और अगले पांच वर्षों में 8,000 से 10,000 नए पायलटों के इस क्षेत्र में आने की उम्मीद है.
चेतावनी की अनदेखी
फ्लाइदुबई की घटना एक और बड़ा सवाल उठाती हैः क्या होता है जब किसी व्यक्ति से जुड़े खतरे के संकेत तो मौजूद होते हैं लेकिन जानकारी एक जगह से दूसरी जगह नहीं पहुंचतीं? 29 साल के ओमान निवासी सह-पायलट को कथित तौर पर कट्टरपंथी विचारों के चलते सुरक्षा कारणों से ओमान एअर की ट्रेनिंग से हटा दिया गया था और ओमान में उड़ान भरने से रोक दिया गया था.
इसके बावजूद, उसने यूएई में सुरक्षा जांच पास कर ली और घटना से पहले करीब आठ महीने से फ्लाइदुबई में काम कर रहा था. यह बात दो बड़ी खामियों की ओर इशारा करती है. पायलट एक एअरलाइन से दूसरी एअरलाइन और एक देश से दूसरे देश जा सकते हैं, लेकिन उनसे जुड़ी खुफिया और सुरक्षा संबंधी जानकारियां आगे नहीं जातीं. मानसिक स्वास्थ्य की जांच के लिए बनाए गए पैमाने अक्सर मानसिक बीमारियों का तो पता लगा लेते हैं, लेकिन वैचारिक कट्टरता की थाह ले पाना मुश्किल है.
भारत के नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने कमर्शियल पायलटों के लिए समय-समय पर क्लास-1 मेडिकल जांच अनिवार्य कर रखी है. इसमें डॉक्टरों को डिप्रेशन, एंग्जायटी, पैनिक डिसऑर्डर और शराब या ड्रग्स के सेवन आदि के बारे में पता लगाने पर खास ध्यान देना होता है.
भर्ती के समय एअरलाइंस को प्रमाणित साइकोलॉजि-कल टूल्स इस्तेमाल करने की सलाह भी दी जाती है. लेकिन यूरोप के ईएएसए की तरह भारत में ऐसा कोई पुख्ता नियम नहीं कि पायलट को उड़ान सेवा पर भेजने से पहले अलग से साइकोलॉजिकल टेस्ट कराना ही पड़े.
डीजीसीए ने खुद 31 मई, 2023 से लागू अपने मेडिकल सर्कुलर में हर बार टेस्ट कराने की सीमाओं को स्वीकारा है. उसके मुताबिक, हर नियमित मेडिकल जांच में हर पायलट का विस्तृत साइकियाट्रिक मूल्यांकन कराना न तो व्यावहारिक है और न किफायती. वैसे भी गंभीर मानसिक बीमारी का सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल होता है. इसके बजाए, उसने नियमित जांच के दौरान ही मानसिक स्वास्थ्य का एक त्वरित आकलन करने की सलाह दी थी.
बैकग्राउंड जांच सुरक्षा की एक और परत को मजबूत करती है. कैप्टन थॉमस कहते हैं कि यह प्रक्रिया “काफी विस्तृत” होती है. उनके मुताबिक, “सुरक्षा एजेंसियों की ओर से बैकग्राउंड की पूरी पड़ताल करने के बाद ही पायलटों को एयरोड्रोम एंट्री पास (एईपी) मिलता है, जिसमें कुछ महीने लगते हैं.
नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (बीसीएएस) के एक पूर्व महानिदेशक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हालांकि बैकग्राउंड जांच में पायलट का साइकोलॉजिकल टेस्ट नहीं होता लेकिन यह काफी गहन होती है.अगर कोई व्यक्ति कट्टरपंथ की ओर बढ़ा है तो यह बात किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती है.”
हालांकि, यह व्यवस्था स्थिर नहीं है. पूर्व महानिदेशक के मुताबिक, “चीजें तेजी से बदलती हैं और मौजूदा खतरों के आधार पर सुरक्षा नियमों को अपडेट किया जाता है.”
खुफिया ब्यूरो के पूर्व असिस्टेंट डायरेक्टर वी.पी. सिंह का मानना है कि सुरक्षा जांच केवल नौकरी की शुरुआत तक सीमित नहीं होनी चाहिए. वे कहते हैं, “सुरक्षा जांच केवल भर्ती पर खत्म नहीं होनी चाहिए. कानूनी दायरे में रहते हुए समय-समय पर फिर जांच होनी चाहिए, जिसमें अचानक वित्तीय लेन-देन, संपत्ति में आए बदलाव या वित्तीय संपर्कों की पड़ताल शामिल हो, जिससे पायलट के किसी दबाव या लालच में फंसे होने का पता लगाया जा सके.”
जांच की सीमाएं
मानसिक स्वास्थ्य जांच के साथ एक समस्या यह है कि पायलट डरते हैं कि अगर वे अपनी मानसिक स्थिति के बारे में बताएंगे तो कहीं उनका करिअर न खत्म हो जाए. जर्मनविंग्स का सह-पायलट भी पहले गंभीर डिप्रेशन का शिकार हुआ था. इलाज के बाद उसे कुछ शर्तों के साथ उड़ान की इजाजत मिली थी लेकिन बाद में उसमें फिर से गंभीर मानसिक लक्षण दिखने लगे.
उस हादसे की जांच ने एविएशन अफसरों, डॉक्टरों, गोपनीयता नियमों और खुद को अनफिट बताने की पायलट की जिम्मेदारी के बीच के तालमेल के अभाव को उजागर किया था.
2024 में 4,494 कमर्शियल पायलटों पर एक यूरोपीय अध्ययन में पाया गया कि 18 फीसद पायलट डिप्रेशन और 23 फीसद पायलट एंग्जायटी के लक्षणों से जूझ रहे थे.
फिर भी, 69 फीसद पायलटों ने कहा कि वे मदद के लिए अपनी एअरलाइन के पास जाने के बजाए साथी पायलटों के सपोर्ट प्रोग्राम की मदद लेना पसंद करेंगे. केवल 36 फीसद ही अपनी कंपनी से मदद मांगने को तैयार थे.
फोर्टिस अस्पताल के मानसिक स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. समीर पारिख कहते हैं, “मानसिक स्वास्थ्य की जांच किसी एक टेस्ट से संभव नहीं. इसके लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जो लगातार क्निलिकल असेसमेंट, गोपनीय रिपोर्टिंग और सहकर्मियों की निगरानी पर आधारित हो.”
इसलिए, समाधान किसी “पायलट की मानसिक स्थिति के टेस्ट” में नहीं, बल्कि बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था बनाने में निहित है. मेडिकल जांच, साइकोलॉजिकल टेस्ट, खुद रिपोर्ट करने, साथी पायलटों के सहयोग, नशीले पदार्थों की निगरानी, खुफिया जानकारी और समय-समय पर बैकग्राउंड फिर से चेक किए जाने आदि की अपनी-अपनी भूमिका है. विशेषज्ञों का कहना है कि ध्यान लगातार मूल्यांकन पर होना चाहिए, न कि भर्ती के समय मिले एक ऐसे सर्टिफिकेट पर जो जिंदगी भर के लिए मान्य हो जाए.
एक मजबूत सुरक्षा तंत्र
फ्लाइदुबई की घटना बताती है कि सुरक्षा केवल जांच तक सीमित नहीं हो सकती. जर्मनविंग्स का मामला पायलट को बाहर कर कॉकपिट लॉक कर लेने का था, जबकि ताजा वाकया एक सह-पायलट के अपने ही साथी पर हमले का है.
कैप्टन रंधावा इसे “पूरी तरह सीआरएम यानी क्रू रिसोर्स मैनेजमेंट की नाकामी” मानते हैं. सीआरएम को इंसानी गलतियों, संवाद की कमी, काम के दबाव और अचानक तबीयत बिगड़ने जैसी स्थितियों से निबटने के लिए बनाया गया है.
लेकिन जब खतरा अंदर का ही कोई व्यक्ति बन जाए, तो स्थिति अलग होती है: उसे प्लेन के सारे सिस्टम की जानकारी होती है, कॉकपिट के नियम पता होते हैं और उसके पास वह सारी एक्सेस होती है जिसे रोकने के लिए सुरक्षा तंत्र बनाया गया है.
भारत के 2026 के नए डीजीसीए नियमों के तहत, अगर कोई यात्री कॉकपिट में घुसने की कोशिश करता है तो उसे सबसे गंभीर यानी लेवल-4 का खतरा माना जाता है लेकिन अगर खतरा कॉकपिट के अंदर के ही किसी व्यक्ति से हो, तो सार्वजनिक रूप से उसके नियमों का खुलासा नहीं किया जाता, क्योंकि सुरक्षा प्रोटोकॉल का लीक होना खुद में एक खतरा बन सकता है.
लिहाजा, सबसे बड़ी जरूरत परस्पर समन्वय की है. एयरलाइंस, नियामकों, सुरक्षा एजेंसियों और कानून प्रवर्तन संस्थाओं को मिलकर ऐसा तंत्र बनाना होगा जिससे किसी भी पायलट से जुड़े गंभीर सुरक्षा खतरे एअरलाइंस और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार भी आसानी से साझा किए जा सकें.
विमानन परामर्श कंपनी सीएपीए इंडिया के सीईओ कपिल कौल कहते हैं, “नियामक, एअरलाइंस और पायलट बिरादरी के बीच एक सक्रिय और सुव्यवस्थित संवाद ढांचा होना चाहिए. आपको भर्ती, ट्रेनिंग, ब्रीफिंग, मेडिकल और साइकोलॉजिकल स्थिति सब कुछ देखना होगा. क्या जोखिम को कम कर सकते हैं? हां, क्या इसे पूरी तरह खत्म कर सकते हैं? यह बहुत मुश्किल है.”
चुनौती यही है कि सतर्कता की ऐसी परतें बनाई जाएं जिससे चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज न किया जा सके और इस तरह जोखिम कम से कम ही हों.
—साथ में सोनाली आचार्जी.

