वैश्विक एआइ मंच की सुरक्षा
एआइ सुरक्षा वैश्विक साइबर सुरक्षा का अगला बड़ा मोर्चा है और भारत इसके लिए ‘भरोसे की परत’ तैयार करने की मजबूत स्थिति में है. एआइ की लगातार जांच और भरोसे की व्यवस्था अपनाना इसके लिए अहम होगा

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/एआइ
राजेश नाम्बियार
टेक्नोलॉजी का हर दौर एक ऐसा मुकाम लाता है, जब इन्फ्रास्ट्रक्चर और भरोसा भी साथ-साथ तैयार करना पड़ता है. एआइ अब जब बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवा, सरकार और रक्षा क्षेत्र में अपनी जगह बना रहा है, ऐसे में सुरक्षा को केवल पारंपरिक साइबर सुरक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता.
संगठनों-संस्थाओं को अब पुराने नेटवर्क, ऐप्लिकेशन और एंडपॉइंट के साथ फाउंडेशन मॉडल, निजी डेटा, खास एआइ ऐप्लिकेशन और तेजी से बढ़ रहे स्वायत्त एजेंटों की भी सुरक्षा करनी होगी. ये एजेंट निर्देशों को समझ सकते हैं, सिस्टम तक पहुंच बना सकते हैं और असल दुनिया में कार्रवाई भी कर सकते हैं.
भारत के लिए यह बड़ा मौका है, लेकिन तभी जब हम भरोसेमंद एआइ को बाकायदा खड़े किए जाने वाले उद्योग के रूप में देखें. इसकी जरूरत साफ है. डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (डीएससीआइ) के साइबर सिक्योरिटी आउटलुक 2026 के मुताबिक, 80 फीसद मुख्य सूचना सुरक्षा अधिकारी (सीआइएसओ) एआइ-संचालित साइबर हमलों को सबसे बड़ी चिंता मानते हैं. यह आंकड़ा साल भर में 19 फीसद अंक बढ़ा है.
वहीं, 62 फीसद एआइ के जरिए होने वाली सोशल इंजीनियरिंग को गंभीर खतरा बताते हैं. करीब 80 फीसद संगठनों ने एआइ एजेंटों का जोखिम भरा व्यवहार देखा है, जिसमें डेटा का गलत तरीके से सामने आना और बिना इजाजत सिस्टम तक पहुंच शामिल है.
सुरक्षा का दायरा भी बदल रहा है. मशीन और एआइ एजेंट जैसी गैर-मानवीय पहचानें अब मानवीय पहचानों से 144 गुना ज्यादा हैं, जिनमें एक साल में 56 फीसद की बढ़ोतरी हुई है. हर 20 में से एक मशीनी पहचान के पास पूरे प्रशासनिक अधिकार हैं.
भारत इससे अछूता नहीं. बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (बीएफएसआइ) क्षेत्र की साइबर सुरक्षा पर बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) के एक अध्ययन के मुताबिक, भारतीय संस्थानों पर साइबर हमलों की तीव्रता वैश्विक औसत से 1.6 गुना ज्यादा है. साइबर घटनाओं की संख्या 2021 के 14 लाख से बढ़कर 2025 में 29 लाख हो गई.
भारत के लिए यह मौका क्यों
एक साथ तीन चीजें हो रही हैं. पहला है आकार. भारत दुनिया का 20 फीसद डेटा पैदा करता है, पर वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में उसकी हिस्सेदारी महज तीन फीसद है. बीसीजी और माइक्रोसॉफ्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में शुरुआती 1.5 गीगावॉट डेटा सेंटर क्षमता बनाने में करीब दो दशक लगे.
अब हाइपरस्केलर, को-लोकेशन सेवा देने वाली कंपनियों और घरेलू कंपनियों ने 100 अरब डॉलर (9.6 लाख करोड़ रु.) से ज्यादा के निवेश का वादा किया है. इससे 2030 तक क्षमता बढ़कर 6-8 गीगावॉट हो सकती है.
लेकिन क्षमता तैयार करना इस समीकरण का सिर्फ एक हिस्सा है. एआइ के प्रयोगों से निकलकर व्यावहारिक इस्तेमाल की ओर बढ़ने के साथ कंपनियों को संवेदनशील और बेहद अहम कामों के लिए ऐसे बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी जिस पर वे भरोसा कर सकें.
यहीं एआइ संप्रभुता और एआइ सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ने लगती हैं. संप्रभुता का मतलब केवल यह नहीं हो सकता कि कंप्यूटिंग या डेटा देश की सीमाओं के भीतर रहे. इसका मतलब डेटा, मॉडल और बुनियादी ढांचे पर ठोस नियंत्रण के साथ उनकी स्वतंत्र निगरानी और सुरक्षा की क्षमता भी है.
दूसरी चीज है भारत का मौजूदा टेक्नोलॉजी और साइबर सुरक्षा आधार. भारत के पास तेजी से फैलता मजबूत और भरोसेमंद आधार है. देश में साइबर सुरक्षा उत्पाद बनाने वाली 400 से ज्यादा कंपनियां हैं, जिन्होंने 2025 में 4.46 अरब डॉलर (42,968 करोड़ रु.) कमाया. उत्पादों और प्रतिभाओं का यह परिपक्व तंत्र एआइ सुरक्षा की अगली पीढ़ी का आधार बन सकता है.
तीसरी चीज है बड़े पैमाने पर टेक्नोलॉजी लागू करने की भारत की क्षमता. दुनिया भर की कंपनियों को मॉडल की लगातार जांच, एजेंट पहचान प्रबंधन, एआइ रेड-टीमिंग, सुरक्षित तैनाती, सॉफ्टवेयर सप्लाइ चेन की सुरक्षा, कमजोरियों की प्राथमिकता तय करने, एआइ गवर्नेंस और प्रबंधित निगरानी जैसी सेवाओं की जरूरत होगी. यह सेवा के रूप में साइबर सुरक्षा का अगला रूप है.
भारत की बीएफएसआइ कंपनियां साइबर सुरक्षा पर बढ़ा हुआ खर्च एआइ की ओर लगा रही हैं. अगले दो-तीन साल में एआइ एजेंटों के टियर-1 सुरक्षा संचालन केंद्र (एसओसी) का एक-चौथाई से ज्यादा काम संभालने की उम्मीद है. भारत के लिए मौका केवल घरेलू प्रणालियों की रक्षा करने में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर एआइ अपना रही दुनिया के लिए अगली पीढ़ी की साइबर सुरक्षा सेवाएं तैयार करने में भी है.
साइबर सेवा से एआइ भरोसे तक
एआइ का इस्तेमाल करने वाली हर कंपनी को अब नए सवालों के जवाब तलाशने होंगेः क्या मॉडल में हेरफेर किया जा सकता है? क्या उसके जरिए कंपनी का निजी डेटा लीक हो सकता है? कोई एआइ एजेंट किन प्रणालियों तक पहुंच सकता है? किसी एजेंट के असामान्य व्यवहार का पता कैसे लगाया जाए? बुनियादी मॉडल बदलने पर सिस्टम की प्रतिक्रिया क्या होगी?
इन सवालों के जवाब एक बार के ऑडिट से नहीं मिल सकते. एआइ प्रणालियां मॉडल, डेटा, प्रॉम्प्ट, टूल और यूजर के व्यवहार के साथ लगातार बदलती रहती हैं. इसलिए उनकी जांच और भरोसे की प्रक्रिया भी लगातार चलनी चाहिए. दूसरी बात, भारत को एआइ और साइबर सुरक्षा—दोनों में हुनरमंद लोगों की मजबूत कतार तैयार करनी होगी. इन दोनों क्षेत्रों के कौशल तेजी से आपस में जुड़ेंगे.
साइबर सिक्योरिटी प्रोफेशनल्स को मॉडल और मशीन लर्निंग की बेहतर समझ चाहिए होगी, जबकि एआइ इंजीनियरों को पहचान प्रबंधन, सुरक्षित ढांचे, विरोधी हमलों के तौर-तरीकों और गवर्नेंस को समझना होगा. तीसरी बात, हमें साझा परीक्षण व्यवस्था और उद्योग, सरकार, शिक्षा जगत तथा स्टार्टअप के बीच गहरे तालमेल की जरूरत है. एआइ मॉडल को लागू करने से पहले उन्हें असल दुनिया के हालात में भी परखना होगा.
भारत के पास भरोसे की यह परत तैयार कर उसे वैश्विक उद्योग में बदलने का मौका है. लेकिन यह ऐसे तंत्र पर भी निर्भर करेगा जो एआइ की समझ को परख सके, उसे सुरक्षित और नियंत्रित रख सके और असल दुनिया में इस्तेमाल लायक भरोसेमंद बना सके.
लेखक नैसकॉम के अध्यक्ष हैं