प्रधान संपादक की कलम से

बीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम सूचियों में मतदाताओं की संख्या 6.08 करोड़ यानी 10 फीसद से ज्यादा घट गई. बहुत-से नाम हटने की वाजिब वजहें हैं, मसलन मौत या लोगों का दूसरी जगह चले जाना

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14 अक्तूबर, 2026 का आवरण

भारतीय चुनाव आयोग कभी चुनाव की योजना बनाने, उसे संपन्न कराने और भारत के लोगों के वोट की हिफाजत करने के मामले में दुनिया के लिए मिसाल था. वह सचमुच सम्मानित संस्था थी, जिसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया जाता था कि दुनिया का सबसे बड़ा और अक्सर बेहद उलझा हुआ लोकतंत्र भी ऐसी निष्पक्षता और सख्ती से स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव करा सकता है, जो कई पुराने लोकतंत्रों को शर्मिंदा कर दे.

जिस सियासी माहौल में चुने हुए प्रतिनिधियों को अक्सर भ्रष्ट या स्वार्थी माना जाता था, वहां चुनाव आयोग एक निष्पक्ष अंपायर की भरोसा दिलाने वाली मौजूदगी था. अब यही साख ऐसे दबाव में है, जिसे विपक्ष का शोर बताकर खारिज नहीं किया जा सकता.

मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) इस विवाद की मुख्य दरार बन गया है. लगातार कानूनी चुनौतियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूरी दी और इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ने दी लेकिन कानूनी मंजूरी और जनता का भरोसा दो अलग बातें हैं.

न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता ने 23 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति पर बोलते हुए इस फर्क को साफ किया. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग का केवल स्वतंत्र होना काफी नहीं है. उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है. यह आयोग के कामकाज की बुनियादी शर्त है.

एसआइआर से जुड़े आंकड़ों ने भी आयोग की मदद नहीं की. 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की शुरुआती मसौदा सूचियों से 13.39 करोड़ नाम बाहर हो गए. यह देश के करीब 100 करोड़ मतदाताओं का 13 फीसद है—लगभग उत्तर प्रदेश की पूरी मतदाता आबादी के बराबर.

बीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अंतिम सूचियों में मतदाताओं की संख्या 6.08 करोड़ यानी 10 फीसद से ज्यादा घट गई. बहुत-से नाम हटने की वाजिब वजहें हैं, मसलन मौत या लोगों का दूसरी जगह चले जाना लेकिन कुल आंकड़ा ऐसा है जिसने लोगों में भारी चिंता पैदा की है और चुनाव आयोग उसका माकूल जवाब नहीं दे पाया.

इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में यह दावा सामने आने के बाद शक और गहरा गया कि तीन चुनाव आयुक्तों (ईसी) में से दो ने 10 महीनों के दौरान इस कवायद के अलग-अलग पहलुओं पर 14 आपत्तियां दर्ज की थीं.

8 अक्तूबर, 2025 का आवरण

चुनाव आयोग ने इस तस्वीर को खारिज करते हुए इन मतभेदों को संस्था के भीतर सामान्य और स्वस्थ बहस बताया और कहा कि सभी अहम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए. अब जनता इसी सर्वसम्मति पर सवाल उठा रही है. साख पर यह संकट छह खास मुद्दों के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जिनकी हमारी आवरण कथा में विस्तार से पड़ताल की गई है.

पहला और सबसे अहम मुद्दा यह है कि एसआइआर ने सबूत देने का बोझ मतदाताओं पर डाल दिया. उनका नाम पिछले गहन पुनरीक्षण, ज्यादातर 2002-03 की सूची से जुड़ना जरूरी था. “अनमैप्ड” होने पर उन्हें दस्तावेजों की बदलती सूची के साथ नए सिरे से आवेदन की मुश्किल प्रक्रिया से गुजरना पड़ा.

मैपिंग होने पर भी भारतीय नामों की अंग्रेजी वर्तनी में फर्क जैसी बढ़ती “तार्किक खामियां” मुश्किल बन सकती थीं. आलोचकों ने इसे अघोषित नागरिकता जांच बताया, जिसमें बाहर हुए लोग बाद में कल्याणकारी योजनाओं की सूचियों से भी हट गए. दूसरा मुद्दा कानून के पालन का है. खास सवाल नए मतदाता के फॉर्म 6 पर है.

उसके ऑनलाइन रूप में पुरानी सूचियों में माता-पिता की जानकारी जैसे सवाल जरूरी संसदीय मंजूरी के बिना जोड़े गए. केवल विपक्ष ने ही इसे “अनधिकृत और गैरकानूनी” नहीं कहा; असहमत चुनाव आयुक्तों ने भी सवाल उठाए. चुनाव आयोग ने इसे नीति नहीं, तकनीकी सहू‌िलयत बताया और फिर एक “गड़बड़ी” मानी. तीसरी गड़बड़ी डिजिटल ढांचे में है.

ईसीआइनेट पोर्टल ने अधिकारों को केंद्र में समेटकर उस अहम व्यवस्था को बदल दिया, जिसमें देशभर के करीब 4,100 कानूनी अधिकार वाले जमीनी अफसरों के पास वीटो था. इस केंद्रीकरण ने कवायद की प्रकृति बदल दी, जिसकी पारदर्शी व्याख्या नहीं हुई.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू तथा विवेक जोशी के बीच कथित मतभेद चौथा अहम मुद्दा है. कानूनन तीनों के अधिकार बराबर हैं; मुख्य चुनाव आयुक्त बराबर वाले सदस्यों में सिर्फ पहला है. इसलिए फैसले के वास्ते सर्वसम्मति या कम-से-कम बहुमत जरूरी है. अगर इस सिद्धांत का लगातार पालन नहीं हुआ तो ऐसे फैसलों की वैधता संदिग्ध है.

पांचवां मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त की चयन प्रक्रिया है. वर्ष 2023 के कानून के बाद चयन समिति में सरकार का पलड़ा भारी है. चुनाव आयोग को हमेशा सियासी झुकाव के शक से ऊपर रहना था. जब उसके नेतृत्व की नियुक्ति का तरीका ही विवादित हो तो इसे कायम रखना ढांचागत रूप से कठिन है.

छठा मुद्दा असमान व्यवहार की गहरी होती धारणा है. मौजूदा नेतृत्व में विपक्ष के पक्षपात वाले आरोप तेज हुए हैं. हर मामले में वे सही हैं या नहीं, यह अलग सवाल है. संस्थागत लिहाज से अहम यह है कि आरोप लगाए और सुने जा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग उनका ठोस जवाब नहीं दे पा रहा.

इस हफ्ते की हमारी आवरण कथा में मैनेजिंग एडिटर कौशिक डेका इन छहों मुद्दों की विस्तार से पड़ताल करते हैं. हर आरोप के साथ चुनाव आयोग का बचाव भी रखा गया है. फैसला, जैसा कि होना चाहिए, आपका है. लेकिन एक नतीजे पर कोई बहस नहीं हो सकती. भारत के सियासी वर्ग को शायद ही कभी जनता का पूरा भरोसा मिला है. चुनाव प्रक्रिया को आम नागरिकों की नजर में सम्मान और वैधता उस संस्था से मिली, जिसके बारे में उनका विश्वास था कि वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करती.

यही विश्वास चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है. इसे बनाने में दशकों लगे, लेकिन यह जितनी तेजी से मिट रहा है, उससे किसी को सहज नहीं होना चाहिए. आयोग का पुराना गौरव लौटाना जरूरी है. इस सवाल पर आखिरी और सबसे अहम अपीलीय सत्ता भारत की जनता है. और वह सब देख रही है.

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