मूल बाशिंदों की वापसी
सोलापुर जिले के उजनी डैम के जलग्रहण क्षेत्र में दबंग-विजातीय मछलियों को हटाने के मकसद से वहां के लोगों ने ही शुरू की अनूठी पहल. योजना अब देसी प्रजातियों को प्रश्रय देने की

उजनी में पकड़ी गईं सकरमाउथ
अपनी तरह की पहली समुदाय की पहल वाली परियोजना में महाराष्ट्र के सोलापुर और पुणे इलाके में उजनी बांध के मछुआरों को अच्छाई और बुराई की लड़ाई से जोड़ा जा रहा है. बात यहां मछलियों की है. उजनी भंडारण क्षमता के मामले में महाराष्ट्र का सबसे बड़ा बांध है.
यहां कभी मछलियों की सोल (चन्ना मारुलियस), गुगली (पेचीप्टेरस प्रजाति) और ताम्ब्र्या सरीखी स्थानीय प्रजातियों का बोलबाला था. अब यहां सकरमाउथ, तिलापिया और थाई मांगुर (क्लैरियस गैरीपिनस) सरीखी बाहरी आक्रामक प्रजातियों का दबदबा है.
पुणे, सोलापुर और अहिल्यानगर जिलों में उजनी और उसके व्यापक ईकोसिस्टम पर निर्भर 1,50,000 किसानों के लिए इसका मतलब यह है कि उन्हें वह अच्छी कीमत नहीं मिल पाती जो पुणे के भिगवान सरीखे मीठे पानी की मछलियों के थोक बाजारों में देशज मछलियों की मिलती है. मसलन, मराल 500-600 रुपए किलो बिकती है जबकि तिलापिया 30 से 100 रुपए किलो में ही मिल जाती हैं.
भिगवान के थोक मछली विक्रेता मौली नागरे बताते हैं कि स्वाद और जाने-माने औषधीय गुणों के कारण अहेर (बाम/ईल) के दाम 2,000-2,500 रुपए किलो तक मिल सकते हैं.
मछुआरे राहुल भोई कहते हैं, “मछली की स्थानीय किस्में इतनी दुर्लभ हो गई हैं कि जब कोई अच्छी मछली पकड़ में आती है तो उसे खरीदने की होड़ मच जाती है.” हर साल उजनी में पकड़ी गई करीब 3,500 टन मछलियां सोलापुर और पुणे के बाजारों में बेची जाती हैं.
बंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) में असिस्टेंट डायरेक्टर उन्मेष कटवटे का कहना है कि तिलापिया, सकरमाउथ और मांगुर ने मिलकर स्थानीय देशज प्रजातियों को खदेड़ दिया है और अब उजनी जलाशय में करीब 97 फीसद यही मछलियां होती हैं.
ये विदेशी प्रजातियां न केवल बहुत तेजी से और बहुत ज्यादा प्रजनन करती हैं बल्कि अत्यंत विनाशकारी भी हैं. मूलतः दक्षिण अमेरिका के अमेजन की सकरमाउथ एक्वैरियम की मछली है जो मीठे पानी के जलाशयों में और अंततः उजनी आ पहुंची. स्थानीय हल्कों में इसे ‘हेलिकॉप्टर मछली’ या येडा मासा (पागल मछली) कहा जाता है.
यह स्थानीय मछलियों के अंडों पर पलती है और लगातार बिल खोदकर नदी के किनारों को भी खोखला कर देती है. वहीं दूसरी तरफ तिलापिया की 1990 के दशक में व्यावसायिक केज फार्मिंग (मछली पालन की पिंजरा तकनीक) की जाती थी और वहां से निकलकर यह खुले जलाशयों में आ गई. इसे ‘जलेबी’ मछली भी कहा जाता है और इसके दो अलग-अलग मूलस्थान रहे हैं—नील नदी और मोजांबीक.
थाई मांगुर को अफ्रीकन कैटफिश भी कहा जाता है. यह उजनी में देशज मछलियों के अलावा प्रवासी पक्षियों तक को शिकार बनाती है. 2019 में केंद्र सरकार की पाबंदी के बावजूद नदियों के किनारे अवैध ब्रीडिंग फार्म फैल गए हैं, क्योंकि इसे पालना आसान है और बाजार तैयार मिलता है.
पर अब हालात बदल सकते हैं. बीएनएचएस की अगुआई में उजनी तरभूमि पारिस्थितिकी बहाली और मछलीपालन विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है. यह दक्षिण एशिया में इस तरह का पहला कार्यक्रम है, जिसके जरिए उजनी में सकरमाउथ सरीखी हमलावर प्रजातियों को हटाकर देशज मछलियों के बीज पानी में फिर छोड़े जा रहे हैं. बीएनएचएस इस बांध को रामसर स्थल घोषित करवाने के लिए भी काम कर रहा है. वहीं प्रशासन थाई मांगुर के अवैध पालन के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहा है.
देशज प्रजातियों की वापसी
उजनी परियोजना का मकसद स्थानीय मछुआरों को बाहरी हमलावर मछलियों की प्रजातियों को हटाने के लिए प्रोत्साहन लाभ देना है. उन्हें सकरमाउथ मछलियां भिगवान के बताए गए संग्रह केंद्र को देने पर बाजार मूल्य (जो करीब 38 रुपए प्रति किलो है) से दो रुपए प्रति किलो ज्यादा दिए जाते हैं.
अप्रैल में परियोजना की शुरुआत के बाद से करीब 38 टन कांटेदार मछलियां इकट्ठा करके मछलियों का चारा, मछली का तेल और तरल खाद बनाने वाले महाराष्ट्र के उद्योगों को बेची जा चुकी हैं. कार्यक्रम का उद्देश्य 2027-28 के अंत तक सकरमाउथ मछलियों को समूल खत्म करना है. सकरमाउथ भीमाशंकर की ऊपरी धारा में, जहां से वही भीमा नदी निकलती है जिस पर उजनी बांध बना है, और कृष्णा नदी के तल में पाई गई हैं.
जहां तक तिलापिया की बात है, मछलीपालन विभाग के रीजनल डिप्टी कमिशनर विजय शिखरे का कहना है कि “(पुणे के इलाके में) शायद ही कोई जलाशय हो जिसमें यह न हो”. बांध से जुड़े मीठे पानी के जलाशयों में इसके फैलने की वजह से नुकता (नुकता नुकता) सरीखी स्थानीय मछलियों की संख्या इस कदर छीजती गई कि अब वे पुणे के वीर बांध और सोलापुर के निचले इलाकों सरीखी कुछ जगहों तक सिमटकर रह गई हैं.
उजनी परियोजना में मछलियों की हमलावर प्रजातियों को खत्म करने के साथ देशज मछलियों और पौधों को वापस लाया जाएगा. जनवरी 2027 तक डेक्कन महाशीर, रोहू और कतला सरीखी मूलतः यहीं की प्रजातियों के करीब 42 लाख बीज छोड़े जाएंगे. साथ ही बोआरी, कोलशी और खावल्या सरीखी देशज और संकटग्रस्ट प्रजातियों को पानी में छोड़ा जाएगा.
2027 में मछलियों के करीब 6-7 करोड़ अंडे फिर से लाए जाएंगे. मछुआरे कार्यकर्ता और भिगवान की अंबिका मछलीपालन सहकारी सोसाइटी के प्रमुख भारत मल्लाव का कहना है कि स्थानीय नस्लें खाने-पीने के लिए भी ज्यादा सेहतमंद होंगी क्योंकि उनकी खानपान की आदतों की बदौलत उनके शरीर में भारी धातुओं का जमाव कम होगा.
बीएनएचएस तिलापिया और सकरमाउथ की आबादी पर नियंत्रण में मदद के लिए ऊदबिलाव को भी फिर लाने पर काम कर रहा है, जिनका कभी इस नदी क्षेत्र में दबदबा हुआ करता था. पारिस्थितिकी-तंत्र प्रबंधन में सुधार लाने के लिए किनारों पर वालिसनेरिया, देशज लिली, स्वीट फ्लैग और वेटिवर समेत करीब 21,000 जलीय पौधे और साथ ही करीब 5,00,000 भारतीय कमल के पौधे लगाए जाएंगे.
मांगुर के गैरकानूनी पालन के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जा रही है. सोलापुर के जिला कलेक्टर कार्तिकेयन एस. के मुताबिक, अभी तक 12 अवैध मांगुर फार्म बंद किए गए हैं और उनका स्टॉक नष्ट किया गया है.
प्रशासन तिहरी रणनीति पर अमल कर रहा है, जिसके बारे में वे कहते हैं, “हम बाहरी हमलावर नस्लों का मौजूदा स्टॉक खत्म कर देंगे, महाशीर सरीखी देशी प्रजातियां फिर से लाएंगे और उनके लिए स्थानीय अर्थव्यवस्था भी बनाएंगे.”
ज्यादा बड़ा जाल बिछाना
प्रशासन मछली पकड़ने के लिए मच्छरदानी यानी बारीक जाली वाले जाल के इस्तेमाल पर भी रोक लगाएगा. इनका इस्तेमाल बॉटम ट्रॉलिंग यानी नदी तल की मछलियों को पकड़ने के लिए, जिसे स्थानीय बोलचाल में ‘वडाप’ कहा जाता है, प्रवासी मछुआरे करते हैं. इनके बारीक जाल की वजह से बहुत छोटी मछलियों और उनके डिम्ब या अंडों के लिए भी बच पाना असंभव हो जाता है.
भारत मल्लाव का कहना है कि इसकी वजह से बांध में देशज मछलियों की संततियां छोड़कर मछलियों की आबादी को स्थिर रखने की सरकार और उनकी अपनी टीम की कोशिशें बेकार हो गई थीं. अब सख्त कार्रवाई के लिए सीसीटीवी, कैमरा ट्रैप, थर्मल कैमरे और अलार्म सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा.
अलबत्ता थोक विक्रेता अंकुश वाघ को अंदेशा है कि तिलापिया को खत्म करने की भी कीमत चुकानी होगी. तिलापिया स्थानीय मछुआरों के लिए जीविका का बेहद अहम स्रोत बन गई है.
मल्लाव कहते हैं, “एक वक्त था जब मछुआरे जाल में फंसी छोटी तिलापिया को वापस पानी में डाल देते थे. अब नहीं डालते. अब उनके पास उन्हें बेचने के सिवा कोई विकल्प नहीं क्योंकि दूसरी मछलियां कम ही मिलती हैं.” फिलहाल तो बीएनएचएस के डायरेक्टर किशोर रीठे को इस पायलट परियोजना में भारी संभावनाएं दिख रही हैं.
यह पूरे भारत में ऐसी ही पहलकदमियों का मॉडल बन सकती है. उनका कहना है कि योजना हर राज्य में कम से कम एक तरभूमि बहाली के लिए दूसरी सरकारों के साथ मिलकर काम करने और देश भर के 400 प्राथमिकता स्थलों तक व्यवस्थित ढंग से पहुंचने की है.