ज्यादा पायलटों के लिए जद्दोजहद

भारत चाहता है कि उसके फ्लाइंग स्कूल तेजी से विस्तार लेते विमानन उद्योग की जरूरत के मुताबिक पायलट तैयार करें. मगर इस क्षेत्र का नियमन-निगरानी करने वाले डीजीसीए की ओर से की जाने वाली नई रैंकिंग पर नाखुश फ्लाइंग अकादमियों ने उठाए सवाल

 Aviation: flying schools
अलीगढ़ की पायोनियर फ्लाइंग एकेडमी में कैडेट को ट्रेनिंग

भारत में पायलट हाल के दिनों में गलत वजहों से सुर्खियों में रहे हैं. ताजा मामला एअर इंडिया के उस पायलट का है, जो अगस्त के शुरू में फुकेत-दिल्ली उड़ान के दौरान रास्ते में ही पैदा हुए गंभीर संकट के बाद ड्रग्स की जांच में पॉजिटिव पाया गया.

अनुमान है कि अगले एक दशक में भारत को 30,000-40,000 नए पायलटों की जरूरत होगी. सरकार यह भी चाहती है कि ये पायलट ‘ट्रेन इन इंडिया, फ्लाइ इन इंडिया’ यानी भारत में ट्रेनिंग लें और यहीं उड़ान भरें.

लिहाजा, पायलट ट्रेनिंग की पूरी व्यवस्था में बड़े बदलाव की कवायद चल रही है. इसके तहत नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने हर मान्यताप्राप्त फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन (एफटीओ) की हर छह महीने में रैंकिंग शुरू की है.

दो दौर हो चुके हैंः पहला अक्तूबर 2025 में और सबसे नया बीते अप्रैल में. इनसे कोई बहुत उत्साहजनक तस्वीर नहीं उभरती. पहले दौर में एक भी ट्रेनिंग संगठन—यहां तक कि सरकार का अपना संस्थान भी—टॉप ग्रेड हासिल नहीं कर सका. इस पर नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू ने कहा, “अब हमें पता चल गया कि हम कहां खड़े हैं.”

दूसरे दौर में हालात में मामूली सुधार हुआ और एक एफटीओ ने ए ग्रेड हासिल किया. इस श्रेणी के लिए 70 से लेकर 85 फीसद अंक जरूरी हैं. कुछ स्कूल रैंकिंग में चढ़े तो कुछ नीचे भी गए. सरकार इसे इस बात का सबूत मानती है कि रैंकिंग ने असर दिखाना शुरू कर दिया है.

नायडू ने इंडिया टुडे को बताया, “एफटीओ रैंकिंग व्यवस्था शुरू करने का मेरा मुख्य मकसद पायलट ट्रेनिंग को ज्यादा पारदर्शी बनाना और युवाओं के लिए उड़ान को ज्यादा आकर्षक करिअर विकल्प के रूप में पेश करना है. इच्छुक कैडेटों और उनके परिवारों से बातचीत के आधार पर ऐसी स्थायी व्यवस्था बनाने का विचार आया जो फैसला लेते समय उन्हें साफ जानकारी और भरोसा दे.”

सरकार यह भी चाहती है कि एफटीओ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनें और ट्रेनिंग के लिए अभी विदेश जा रहे कैडेटों को यहीं रोकें. नायडू कहते हैं, “हम हमेशा विमानन क्षेत्र में भारत की ओर से पैदा की जा रही मांग की बात करते हैं. यह बहुत बड़ा आंकड़ा है. हमने करीब 1,700 विमानों के ऑर्डर दिए हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारा बेड़ा मौजूदा आकार से लगभग दोगुना होने वाला है. इन विमानों को उड़ाने के लिए हुनरमंद और सुरक्षा के प्रति सजग कर्मचारियों की जरूरत होगी. हम भारत के विमानन क्षेत्र के विस्तार को आकार देने के लिए बाहर से कर्मचारी नहीं लाना चाहते. हम उन्हें यहीं भारत में प्रशिक्षित करना चाहते हैं.”

उद्योग ने इस क्षेत्र में पहल का स्वागत किया है. वह अरसे से कहता आया है कि कमर्शियल पायलट तैयार करने के मामले में भारत को आत्मनिर्भर होना चाहिए. फिर भी एफटीओ का एक तबका इस प्रक्रिया से नाखुश है और कवायद की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा.

हुनर की खाई

पिछले एक दशक में विमानन क्षेत्र में आए उछाल के बावजूद भारत में तैयार होने वाले और एअरलाइंस में नौकरी पर रखे जा सकने लायक पायलटों के बीच ‘हुनर की गहरी खाई’ है. दिल्ली-एनसीआर में पायलट ट्रेनिंग और सिमुलेशन सेंटर चलाने वाली फ्रांसीसी कंपनी सिमएरो की भारतीय इकाई सिमएरो इंडिया के महाप्रबंधक खुशबेग जट्टाना बताते हैं, “नया कमर्शियल पायलट लाइसेंस (सीपीएल) धारक किसी हल्के पिस्टन विमान पर अकेले पायलट के तौर पर, ज्यादातर आंखों से देखकर उड़ान भरने और कम व्यस्त हवाई क्षेत्र में काम करने की ट्रेनिंग लेकर आता है.”

वे कहते हैं, “इसीलिए भारतीय एअरलाइंस आम तौर पर पहले से टाइप-रेटेड पायलटों की भर्ती करती हैं. टाइप रेटिंग का मतलब किसी खास किस्म के जहाज को उड़ाने की विशेषज्ञता और उसका लाइसेंस है. यही वजह है कि ऐसे पायलट दुनिया भर से तलाशे जाते हैं. एअरलाइन के नजरिए से यह कारोबारी तौर पर तर्कसंगत फैसला है मगर पायलट तैयार करने की व्यवस्था की ढांचागत नाकामी भी है.”

क्षेत्रीय एअरलाइन फ्लाइ91 के संस्थापक और सीईओ मनोज चाको के लिए पायलटों, एअरक्राफ्ट इंजीनियरों और टेक्निशियनों की ट्रेनिंग में देश की अपनी क्षमता तैयार करना उतना ही जरूरी है जितना हवाई अड्डे और एअरलाइंस बनाना.

वे कहते हैं, “यह भी अहम है कि ट्रेनिंग कौन देता है. इस व्यवस्था के हिस्से छोटे, बिखरे और पारिवारिक ढंग से चलने वाले संस्थानों के हवाले रहे हैं. भारत को अगर विमानन की वैश्विक ताकत बनना है तो ट्रेनिंग को गुणवत्ता, सुरक्षा और बड़े पैमाने पर खड़ा करना होगा. सीखने के आधुनिक तरीकों को बढ़ावा देने वाली नियामक व्यवस्था चाहिए.”

रैंकिंग की परीक्षा

इसमें तो कोई दो राय ही नहीं कि देश में पायलट ट्रेनिंग का एक मानक तय किए जाने की सख्त दरकार है. लेकिन उद्योग की राय पर भरोसा करें तो इस तथाकथित रिपोर्ट कार्ड ने उड़ान भरने से पहले ही खासी नाराजगी पैदा कर दी है. डीजीसीए से मंजूर करीब 41 फ्लाइंग स्कूलों के संगठन एसोसिएशन ऑफ फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशंस (एएफटीओ) ने रैंकिंग व्यवस्था और उसके लिए इस्तेमाल आंकड़ों, दोनों को चुनौती दी है.

उसने ‘नियामक की ओर से उन्हीं संस्थानों की रैंकिंग किए जाने’ की धारणा पर भी सवाल उठाया है, जिनका वह नियमन करता है. उद्योग के पदाधिकारियों के मुताबिक, उन्हें केवल यह सूचना दी गई थी कि रैंकिंग की कवायद शुरू की जा रही है. इस बारे में सार्थक सलाह-मशविरे का उन्हें बहुत कम मौका मिला.

अक्तूबर 2025 में जिन 35 एफटीओ की रैंकिंग हुई, उनमें से किसी को ए+ या ए ग्रेड नहीं मिला. 13 को बी और 22 यानी करीब दो-तिहाई को सी ग्रेड दिया गया. शीर्ष तीन में मध्य प्रदेश में एअरबेस चलाने वाली चाइम्स एविएशन एकेडमी, महाराष्ट्र के शिरपुर में एसवीकेएम'स की एनएमआइएमएस एकेडमी ऑफ एविएशन और पटना का बिहार फ्लाइंग क्लब शामिल थे. नागरिक उड्डयन मंत्रालय का अपना एफटीओ, अमेठी का इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी (इग्रुआ), सी श्रेणी के साथ 25वें स्थान पर रहा.

दूसरे दौर में रैंकिंग में बदलाव आया. राजस्थान के किशनगढ़ की अव्याना एविएशन एकेडमी ए श्रेणी की रेटिंग पाने वाली अब तक की पहली एफटीओ बनी. पहले दौर में शीर्ष तीन में शामिल चाइम्स बी श्रेणी बरकरार रखते हुए 10वें स्थान पर खिसक गई. मंत्रालय के एफटीओ समेत 11 स्कूलों की रेटिंग सी से बी हो गई.

सात मौजूदा एफटीओ बी से फिसलकर सी श्रेणी में आ गए. सरकार इसी तरह की हलचल चाहती है—एक आधार तय हो, कमजोरियों की पहचान हो और स्कूलों पर सुधार का दबाव बने. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, रैंकिंग शुरू होने के बाद ट्रेनिंग के लिए उपलब्ध उड़ान घंटों का इस्तेमाल 32 फीसद से सीधे 50 फीसद पर जा पहुंचा.

आंकड़ों पर सवाल

एफटीओ की रैंकिंग पांच पैमानों पर होती है—छात्रों की सहायता, सुरक्षा, परफॉर्मेंस, संचालन क्षमता और नियमों का पालन. इसमें चार ग्रेड हैं, जिनमें ए+ सबसे ऊंची और सी सबसे निचली है. एफटीओ को असल ऐतराज आंकड़ों की विश्वसनीयता पर है.

हैदराबाद और कलबुर्गी में ट्रेनिंग बेस चलाने वाली एशिया पैसिफिक फ्लाइट ट्रेनिंग एकेडमी के सीईओ डी.पी. हेमंत कहते हैं, “गलत आंकड़ा स्कोर तय करने की प्रक्रिया में कई पैमानों को प्रभावित कर सकता है. मसलन, हमारे कैडेटों की संख्या 180 या उसके आसपास मान ली गई, जबकि असल संख्या करीब 70 है. इससे आंकड़े इतने बिगड़ जाते हैं कि विमान और छात्रों का अनुपात गड़बड़ा जाता है, जिसके 10 अंक हैं. छात्र और इंस्ट्रक्टर का अनुपात भी बिगड़ जाता है, जिसके अलग 10 अंक हैं और इसी तरह बाकी पैमाने भी प्रभावित होते हैं. अगर कुल 80 में से आप 20-30 अंक गंवा देते हैं तो उससे बहुत बड़ा फर्क पड़ता है. इसलिए यह तरीका काम नहीं करेगा.”

एएफटीओ के अध्यक्ष और रेडबर्ड फ्लाइट ट्रेनिंग एकेडमी के प्रमुख हर्ष सिंह इससे भी अजीब नतीजे की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं, “मेरा एफटीओ पिछले साढ़े तीन साल से काम ही नहीं कर रहा. फिर भी मुझे चालू एफटीओ से आगे 24वीं रैंक दे दी गई.”

इस बारे में पूछे जाने पर एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, “यह रैंकिंग उन सभी डीजीसीए-मंजूर एफटीओ पर लागू होती है, जिन्होंने मंजूरी मिलने की तारीख से 28 फरवरी, 2026 तक 18 महीने पूरे कर लिए थे.” देश की सबसे बड़ी एअरलाइन इंडिगो के लिए कैडेट पायलट प्रोग्राम चलाने के बावजूद चाइम्स दोनों दौर में बी ग्रेड से ऊपर नहीं जा सका.

उसके सीईओ वाइ.एन. शर्मा कहते हैं, “अब हम इसे गंभीरता से नहीं लेते. हमारी और दूसरे एफटीओ की कई अपीलों के बावजूद डीजीसीए ने इस व्यवस्था को दुरुस्त करने से इनकार कर दिया. इसलिए रैंकिंग अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है.”

डीजीसीए को एफटीओ से जुड़े आंकड़े इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस फॉर सिविल एविएशन (ई-जीसीए) से मिलते हैं. यह नियामकीय प्रक्रियाओं को ऑटोमेटिक और आसान बनाने के लिए तैयार किया गया सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म है. मगर ऑपरेटरों का कहना है कि कई बार रैंकिंग ऐसे आंकड़ों के आधार पर की गई जो इस प्लेटफॉर्म पर दर्ज जानकारी से मेल नहीं खाते.

शर्मा कहते हैं, “कम-से-कम आपको अपने ही आंकड़े देखने चाहिए. मैं हर साल 60 कैडेट तैयार करता हूं और उसके लिए मेरे पास 2,000 आवेदन आते हैं. इसलिए रैंकिंग चाहे जो कहे, लोग अच्छी और खराब एकेडमी के बीच फर्क समझ सकते हैं.”

हालांकि, डीजीसीए इससे इनकार करता है कि आंकड़ों को लेकर कोई अस्पष्टता है. उसने 28 फरवरी, 2026 तक ई-जीसीए पर मौजूद जानकारी को आधार बनाया, क्योंकि अप्रैल 2026 की रैंकिंग की गणना का समय एक मार्च, 2025 से 28 फरवरी, 2026 तक था.

इस आरोप पर कि एफटीओ के पास अपनी आपत्तियां दर्ज कराने और रैंकिंग की समीक्षा मांगने का कोई औपचारिक तरीका नहीं है, डीजीसीए ने इंडिया टुडे को दिए बयान में कहा कि एफटीओ रैंकिंग का ड्राफ्ट स्कोरकार्ड सभी एफटीओ के साथ साझा किया जाता है और अंतिम रैंकिंग तैयार करते वक्त उनकी राय पर भी गौर किया जाता है.

डीजीसीए का यह भी कहना है कि वह समय-समय पर एफटीओ के साथ बैठकें करता है, जिनमें उनसे टिप्पणियां और सुझाव मांगे जाते हैं. लेकिन हेमंत कहते हैं, “एक नियामक अपने ही संस्थानों की रैंकिंग कर रहा है. दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होता.” रैंकिंग को असरदार बनाना है तो सबसे पहले इस पूरी व्यवस्था को विश्वसनीयता की परीक्षा में पास होना होगा.

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