सिक्का चलाने की लड़ाई

देश के 158 साल पुराने विशालकाय कॉर्पोरेट समूह में टाटा संस की लीडरशिप को लेकर हुए टकराव से गवर्नेंस के साथ इसके भविष्य पर बड़े सवाल खड़े हुए

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टाटा सन्स की लीडरशिप को लेकर बढ़ रहा तनाव

सत्रह सितंबर की सुबह करीब 10 बजे का वक्त था. दक्षिण मुंबई के सौ साल पुराने और मशहूर बॉम्बे हाउस के बाहर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. 180 अरब डॉलर (17.2 लाख करोड़ रुपए) के टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के बोर्ड की अहम बैठक होने वाली थी.

कंपनी के छह सदस्यों वाले बोर्ड में चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, उद्योगपति वेणु श्रीनिवासन, हिंदुस्तान यूनिलीवर के पूर्व चेयरमैन हरीश मनवानी, निवेश विशेषज्ञ अनीता एम. जॉर्ज और टाटा समूह के मुख्य वित्त अधिकारी सौरभ अग्रवाल शामिल थे.

बोर्ड के सामने दो अहम मुद्दे थे. पहला टाटा संस के नेतृत्व से जुड़ा था क्योंकि चंद्रा ने 12 अगस्त को ऐलान कर दिया था कि फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद वे तीसरा कार्यकाल नहीं मांगेंगे. दूसरा मुद्दा निजी कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के प्रस्ताव से जुड़ा था.

इससे कुछ ही दिन पहले 11 सितंबर को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) का दर्जा छोड़ने की टाटा संस की अर्जी खारिज कर दी थी. टाटा संस अपर-लेयर एनबीएफसी और खास तौर पर कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (सीआइसी) की श्रेणी में आती है क्योंकि वह समूह की प्रमुख होल्डिंग और निवेश कंपनी है, जो पूंजी आवंटन के साथ विभिन्न टाटा कंपनियों में शेयर रखती है.

अपर लेयर में एक लाख करोड़ रुपए या अधिक की संपत्ति वाली एनबीएफसी आती हैं जबकि टाटा संस की अपनी संपत्ति 1.75 लाख करोड़ रुपए थी. कंपनी ने 20,300 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज चुकाकर अपना रजिस्ट्रेशन खत्म कराने का दावा किया लेिकन आरबीआइ ने अर्जी ठुकरा दी.

दिलचस्प यह है कि आरबीआइ ने लिस्टिंग पर जोर नहीं दिया, फिर भी कई लोगों ने इसे तय माना. कारोबारी जानकारों का कहना था कि इससे ऑटोमोबाइल, डिफेंस, सॉफ्टवेयर, केमिकल, स्टील, रिटेल, वित्तीय सेवाओं और होटल कारोबार तक फैले 158 साल पुराने समूह में जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी.

जब 68 वर्षीय नोएल तीन अहम दस्तावेजों वाला फोल्डर लेकर इमारत में दाखिल हुए तो कैमरे चमकने लगे. इन्हीं दस्तावेजों ने बाद में उन्हें छह बोर्ड सदस्यों के बीच अकेली विरोधी आवाज बना दिया. पहला नोट टाटा संस की लिस्टिंग पर ट्रस्ट्स के रुख और कंपनी के गैर-सूचीबद्ध बने रहने के फायदे पर था.

दूसरा इस बारे में था कि चंद्रा को तीसरा कार्यकाल क्यों नहीं मिलना चाहिए. तीसरा दस्तावेज पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी.वाइ. चंद्रचूड़ की लंबी कानूनी राय थी. इसमें टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) के मुताबिक, किसी भी बोर्ड प्रस्ताव की मंजूरी के लिए ट्रस्ट्स के दोनों मनोनीत निदेशकों—नोएल और श्रीनिवासन—के ‘सहमति वाले वोट’ को जरूरी बताया गया था.

यही वोट दोनों पक्षों के बीच विवाद की जड़ बन गया. अब वे भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे कड़वी कानूनी लड़ाइयों में से एक की तैयारी कर रहे हैं.

टाटा समूह के लिए अंदरूनी उथल-पुथल नई नहीं है. टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री के साथ पांच साल की कानूनी लड़ाई हाल का मामला है, लेकिन 1991 में रतन टाटा के चेयरमैन बनने के बाद भी प्रमोटरों और पेशेवर प्रबंधकों में बड़ा टकराव हुआ था.

बोर्डरूम में घमासान
सत्रह सितंबर की बोर्ड बैठक में घटनाक्रम ने नाटकीय मोड़ ले लिया. जब चंद्रा की दोबारा नियुक्ति का मुद्दा आया तो वे बैठक से अलग हो गए. चार सदस्यों—श्रीनिवासन, जॉर्ज, मनवानी और अग्रवाल—ने नियुक्ति के पक्ष में वोट दिया जबकि नोएल ने विरोध किया.

इसके बाद नोएल ने कहा कि टाटा संस बोर्ड के किसी भी प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए टाटा ट्रस्ट्स के मनोनीत निदेशकों का ‘सहमति वाला वोट’ जरूरी है. इस मौके पर टाटा संस की नॉमिनेशन ऐंड रेम्यूनरेशन कमेटी के चेयरमैन मनवानी ने समझाया कि आरबीआइ के निर्देश के मुताबिक टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने के लिए चंद्रा ही सबसे सही व्यक्ति क्यों हैं.

वकील सुदीप्त सरकार की कानूनी सलाह से अपनी दलील को मजबूत करते हुए मनवानी ने उस मुद्दे का भी सहारा लिया, जिस पर तभी से खासी बहस और विवाद है. दो ट्रस्टियों श्रीनिवासन और नोएल के बीच ‘बंटे हुए वोट’ की स्थिति तोड़ने के लिए उन्होंने अपने ‘निर्णायक वोट’ का इस्तेमाल किया.

नोएल की तैयारी से जाहिर था कि उन्होंने पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि प्रस्तावों पर श्रीनिवासन दूसरे खेमे का साथ दे सकते हैं. चेन्नै की टीवीएस मोटर के चेयरमैन एमेरिटस श्रीनिवासन को रतन टाटा अगस्त 2016 में टाटा संस के बोर्ड में लाए थे. इसके दो महीने बाद तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को पद से हटा दिया गया था. श्रीनिवासन टाटा संस बोर्ड में सबसे लंबे समय से बने हुए सदस्य भी हैं.

अपना विरोध दर्ज कराने के बाद नोएल ने तीनों दस्तावेज बैठक में रखे और उन्हें कार्यवाही के विवरण में शामिल करने को कहा. उन्होंने दो और मांगें भी रखीं. दोनों पक्षों को अलग-अलग कानूनी राय मिली थी, इसलिए वे तीसरी राय चाहते थे.

उन्होंने यह भी कहा कि टाटा संस की सालाना आम बैठक में शेयरधारक चंद्रा की नियुक्ति पर मुहर लगाएं. सालाना आम बैठक तब से लंबित थी, जब मुंबई के चैरिटी कमिशनर ने प्रमुख टाटा ट्रस्टों में से एक सर रतन टाटा ट्रस्ट (एसआरटीटी) को कोई बैठक करने से रोक दिया था.

यह आदेश उस जांच के बीच आया था जिसमें देखा जा रहा था कि उसके आजीवन ट्रस्टियों की संख्या महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स ऐक्ट की धारा 30ए(2) में तय 25 फीसद की कानूनी सीमा का उल्लंघन तो नहीं करती. फिलहाल पांच सदस्यों वाले उसके बोर्ड में तीन आजीवन सदस्य हैं. खबरों के मुताबिक, टाटा संस बोर्ड ने नोएल की दोनों मांगें मान लीं.

नोएल इस धारणा के साथ बैठक से निकले कि दोनों मुद्दों पर फैसला फिलहाल लंबित रहेगा. लेकिन उसी दिन बाद में उन्हें पता चला कि टाटा संस बोर्ड ने दोनों अहम मुद्दों पर उनकी आपत्ति दरकिनार कर दी है. बोर्ड ने जल्द ही मीडिया रिलीज जारी करके चंद्रा की दोबारा नियुक्ति का ऐलान कर दिया.

नोएल आगबबूला हो उठे. इसके बाद उन्होंने और टाटा ट्रस्ट्स ने एक के बाद एक कई प्रेस रिलीज जारी कीं. टाटा ट्रस्ट्स ने चंद्रा पर बोर्ड के फैसले को ‘कानूनी तौर पर शून्य’ बताया. उसका कहना था कि खुद को दोबारा नियुक्ति के लिए पेश न करने का चंद्रा का फैसला पहले ही स्वीकार किया जा चुका था और वह ‘अंतिम रूप ले चुका था’.

नोएल ने कहा कि ‘पन्ना पलट चुका है’ और ‘अब आगे बढ़ने का वक्त है’. उन्होंने बैठक में रखे वे दस्तावेज भी सार्वजनिक कर दिए जिनमें बताया गया था कि टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध क्यों नहीं होना चाहिए.

टाटा का अनोखा ढांचा
टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल ने कहा, “टाटा संस आम मायनों में कोई होल्डिंग कंपनी नहीं है.” इसकी करीब 66 फीसद इक्विटी टाटा ट्रस्ट्स के पास है. परिचालन कंपनियों से मिलने वाला लाभांश ट्रस्ट्स के जरिए जनकल्याण के कामों में जाता है.

“टाटा ट्रस्ट्स इस बोर्ड में जिन हितों की नुमाइंदगी करता है, वे उन लाखों लोगों के जनहित से जुड़े हैं जिन्हें इस कंपनी के लाभांश से चलने वाले परोपकारी कामों का फायदा मिलता है. कारोबारी उद्यम और परोपकार एक-दूसरे के साथ खड़ी दो अलग चीजें नहीं हैं. वे एक ही ढांचे के दो छोर हैं.”

नोएल ने उस मुद्दे की जड़ पर चोट की थी जो वर्षों से टाटा समूह का पीछा करता आया है: कोई परोपकारी ट्रस्ट इतने विशाल कारोबारी साम्राज्य के कामकाज को कैसे नियंत्रित करता है, जिसमें 26 सूचीबद्ध और 17 गैर-सूचीबद्ध कंपनियां शामिल हैं, कुल आमदनी 17.2 लाख करोड़ रुपए, बाजार पूंजीकरण करीब 22.7 लाख करोड़ रुपए और कर्मचारियों की संख्या 11.6 लाख है.

समूह की ज्यादातर कंपनियों में टाटा संस की बहुमत हिस्सेदारी है जबकि कुछ कंपनियों की टाटा संस में भी क्रॉस-होल्डिंग है. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक, खुद टाटा संस की कीमत करीब 9 लाख करोड़ रुपए से 12.5 लाख करोड़ रुपए के बीच है.

इससे समूह की कंपनियों के पास मौजूद टाटा संस के शेयरों का मूल्य अधिकतम 1.6 लाख करोड़ रुपए बैठता है. टाटा ट्रस्ट्स की 66 फीसद हिस्सेदारी की कीमत अधिकतम 8.3 लाख करोड़ रुपए है जबकि साइरस मिस्त्री के भाई शापूरजी मिस्त्री की अगुआई वाले शापूरजी पालोनजी (एसपी) ग्रुप के पास 18.4 फीसद हिस्सेदारी है, जिसकी कीमत अधिकतम 2.3 लाख करोड़ रुपए है.

प्रमोटर परिवारों की बहुमत हिस्सेदारी वाली दूसरी कंपनियों के उलट, टाटा ट्रस्ट्स बोर्ड में अपने मनोनीत प्रतिनिधियों के जरिए टाटा संस के फैसलों पर नियंत्रण रखता है. टाटा ट्रस्ट्स में आठ संस्थाएं शामिल हैं. इनमें सबसे बड़ी सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट हैं, जिनकी टाटा संस में क्रमशः करीब 28 फीसद और 24 फीसद हिस्सेदारी है.

टाटा की परिचालन कंपनियां अपने मुनाफे का एक हिस्सा लाभांश के तौर पर टाटा संस को देती हैं. टाटा संस उस रकम का 66 फीसद हिस्सा परोपकारी कामों के लिए टाटा ट्रस्ट्स को देती है. नोएल और श्रीनिवासन के अलावा सर रतन टाटा ट्रस्ट में जिमी एन. टाटा (रतन टाटा के छोटे भाई), कारोबारी जहांगीर एच.सी. जहांगीर और वकील डेरियस खंबाटा ट्रस्टी हैं.

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट में पहले बताए गए दोनों लोगों के अलावा पूर्व नौकरशाह विजय सिंह, खंबाटा, नोएल के बेटे नेविल एन. टाटा और टाइटन के पूर्व एमडी भास्कर भट्ट ट्रस्टी हैं.

नोएल के मुताबिक, टाटा संस का मुख्य काम टाटा समूह की कंपनियों में निवेश करना और उन्हें सहारा देना है. उनका तर्क है कि टाटा संस के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने पर बहुमत शेयरधारक के तौर पर टाटा ट्रस्ट्स के अधिकार गंभीर रूप से कमजोर हो जाएंगे.

सूचीबद्ध टाटा संस को संस्थागत और विदेशी शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा, जिनकी जायज दिलचस्पी वित्तीय रिटर्न में होगी. वे कहते हैं, “इसमें संदेह है कि ऐसे शेयरधारक संकट में फंसी समूह की किसी कंपनी को बचाने के लिए पूंजी लगाने या ऐसी नई परियोजना में पैसा देने की मंजूरी देंगे, जिससे 15 साल बाद रिटर्न मिलना हो. यह उनकी आलोचना नहीं है. यह उनके दायित्व का बयान है, जो हमारे दायित्व से अलग है.”

अब इसी बुनियादी ढांचे को चुनौती मिल रही है. टाटा ट्रस्ट्स के खिलाफ जाने का श्रीनिवासन का फैसला उन मतभेदों की ओर इशारा करता है जो कुछ समय से ट्रस्टों के भीतर पक रहे थे. ये मतभेद पिछले साल सार्वजनिक हो गए, जब टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने सिटीबैंक के पूर्व सीईओ प्रमित झावेरी, जहांगीर और खंबाटा के साथ मिलकर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में श्रीनिवासन और सिंह की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया.

आखिरकार केंद्र सरकार को इस मामले में दखल देना पड़ा. गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने नोएल, चंद्रशेखरन और कुछ अन्य ट्रस्टियों को बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया. कुछ दिन बाद मेहली ने प्रमुख टाटा ट्रस्टों के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया.

नोएल को उम्मीद है कि सालाना आम बैठक में टाटा संस बोर्ड के फैसले पलट दिए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एच.पी. रानीना कहते हैं, “जहां तक टाटा ट्रस्ट्स का सवाल है, अगर चंद्रा अपना रुख नहीं बदलते और अगस्त के अपने फैसले पर कायम नहीं रहते कि वे फरवरी 2027 के बाद चेयरमैन नहीं बने रहेंगे, तो यह मामला अदालत में जाएगा. और अगर ऐसा हुआ तो टाटा ट्रस्ट्स की जीत होगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट खुद इस मुद्दे पर पहले फैसला दे चुका है.”

साइरस मिस्त्री के साथ कानूनी लड़ाई में फंसने पर टाटा संस ने पद से हटाए गए चेयरमैन के खिलाफ अपना मुकदमा मजबूत करने के लिए आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (एओए) की अहमियत का हवाला दिया था.

रानीना कहते हैं, “टाटा ट्रस्ट्स पीछे नहीं हटने वाला. कानून उसके पक्ष में है. टाटा संस के आर्टिकल्स साफ कहते हैं कि सीईओ की नियुक्ति या किसी दूसरे बदलाव के लिए सर रतन टाटा ट्रस्ट और सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के दोनों मनोनीत निदेशकों की सहमति जरूरी है.”

टाटा संस की लिस्टिंग पर रानीना कहते हैं कि टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड को पहले सार्वजनिक कंपनी में बदलना होगा. केवल सार्वजनिक कंपनी ही शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो सकती है. इसके लिए एओए बदलना पड़ेगा और उसमें बदलाव के लिए शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी है.

सालाना आम बैठक में केवल शेयरधारक वोट दे सकते हैं, निदेशक नहीं, जब तक कि वे खुद शेयरधारक न हों. वोटिंग में बहुमत हिस्सेदारी की वजह से टाटा ट्रस्ट्स का पलड़ा भारी है. रानीना इस पर भी सवाल उठाते हैं कि क्या आरबीआइ ऐसा निर्देश दे सकता है.

उनके मुताबिक, केंद्रीय बैंक केवल नियामक है, लेकिन इस मामले में वह मालिकाना ढांचे में बदलाव करने को कह रहा है. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को तय करना होगा कि आरबीआइ ने अपनी सीमा में रहकर काम किया या नहीं.

कई लोगों का मानना है कि नोएल ने सही सवाल उठाए हैं. इनमें यह भी शामिल है कि समूह के कुछ प्रमुख कारोबारों के मामले में चेयरमैन की जवाबदेही ज्यादा हो और उनके फैसले खुली जांच के दायरे में आएं. नोएल एअर इंडिया में हो रहे घाटे और डिजिटल कारोबार में किए गए भारी निवेश से चिंतित थे, जिनसे अब तक रिटर्न नहीं मिला है.

2022 में फिर टाटा समूह का हिस्सा बनी एअर इंडिया का शुद्ध घाटा वित्त वर्ष 2025-26 में दोगुना होकर 22,238 करोड़ रुपए पहुंच गया. बड़े निवेश के बावजूद टाटा न्यू अब तक प्रमुख सुपर-ऐप के तौर पर अपनी जगह नहीं बना पाया है जबकि समूह का सेमीकंडक्टर कारोबार लंबी अवधि में नतीजे देने वाला दांव बना हुआ है.

जंग का बिगुल
साइरस मिस्त्री के खिलाफ 2016 की कानूनी लड़ाई में टाटा संस की पैरवी कर चुके सिंघवी कहते हैं कि टाटा ट्रस्ट्स के एओए की अहमियत कायम रहनी चाहिए. उन्होंने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा, “टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की 66 फीसद हिस्सेदारी से कोई इनकार नहीं कर सकता. जिस संस्था के बोर्ड में सदस्य बैठे हैं, उसके मालिकों को बाहर रखकर किसी बेलगाम बोर्ड को कॉर्पोरेट गवर्नेंस उलटने की इजाजत नहीं दी जा सकती.” 

दूसरी ओर हरीश साल्वे ने चंद्रा के पक्ष में श्रीनिवासन के वोट को सही ठहराया. उन्होंने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, “सहायक कंपनी के निदेशक भले ही होल्डिंग कंपनी सीधे मनोनीत करे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक जिस कंपनी में उन्हें नियुक्त किया गया है, उसके प्रति उनकी भरोसे की जिम्मेदारी होती है. वे कठपुतली नहीं हैं.”

हाल के घटनाक्रम ने भारत के सबसे विविध कारोबारी समूहों में से एक और शायद विदेश में देश के सबसे सम्मानित ब्रांड की बुनियाद हिला दी है. बड़े मुद्दों का हल जरूरी है, लेकिन लंबी कानूनी लड़ाई से बचना चाहिए क्योंकि इससे पीढ़ियों में बनी टाटा समूह की साख कमजोर हो सकती है.

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