प्रधान संपादक की कलम से
भारत ने इस सवाल का सामना कभी गंभीरता से नहीं किया क्योंकि दशकों तक किसी भी तरह की डिग्री महत्वाकांक्षी तबकों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता, ऊंची सामाजिक हैसियत की चाबी और एक दहलीज पार करने का सबूत थी

7 अक्तूबर, 2026 का आवरण
कहीं नौकरी है मगर योग्य उम्मीदवार नहीं. कोई डिग्री लेकर बेरोजगार बैठा है या ऐसी नौकरी कर रहा है जिसका पढ़ाई से मेल नहीं. इसे लाखों से गुणा करें तो भारत के सामने खड़ी पहेली का आकार समझ आता है.
आबादी में कॉलेज में पढ़े युवाओं की हिस्सेदारी पहले से कहीं ज्यादा है: 20-29 साल के 6.3 करोड़ युवा. फिर भी उनमें बेरोजगारी 23 फीसद है. यह बढ़ती खाई हमारी कॉलेज शिक्षा की एक खासियत से निकलती है: पढ़ाई का जोर किसी खास क्षेत्र में काम आने वाली योग्यता के बजाए सामान्य डिग्रियां देने पर है.
3.4 करोड़ अंडरग्रेजुएट छात्रों में दो करोड़ से ज्यादा बीए, बीएससी या बीकॉम जैसी सामान्य डिग्री कर रहे हैं. इनमें आधे बीए में हैं. नतीजा: केवल 8.25 फीसद ग्रेजुएट अपनी पढ़ाई से जुड़ा काम करते हैं. हमारे केस स्टडी के उस युवा दर्जी को लें जो ग्रेजुएट है, लेकिन गुजारे के लिए पिता के पेशे में लौट आया.
वह शिक्षा की उस विशाल पाइपलाइन के एक छोर पर है जो उसके और उसके जैसे लाखों युवाओं को कहीं नहीं पहुंचाती. हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, पर उसकी जरूरत के लोग तैयार नहीं करते: 82 फीसद भारतीय नियोक्ताओं को हुनरमंद लोग नहीं मिलते.
हाल में केवल 42.6 फीसद ग्रेजुएट नौकरी के काबिल पाए गए. यह व्यवस्था जो तैयार कर रही है, उसका आधे से ज्यादा हिस्सा सबके लिए बेकार है. यह नया नहीं बल्कि दशकों पुरानी नाकामी है, जो दाखिलों की बढ़ती संख्या पर हमारी पीठ थपथपाने के बीच चुपचाप गहराती गई.
इसकी एक गायब कड़ी खास तौर पर गौर करने लायक है. भारत में 15-59 साल के केवल 4.1 फीसद लोगों को कभी औपचारिक हुनर प्रशिक्षण मिला है. 2021 में इस मद को शिक्षा बजट का करीब 3 फीसद मिला. जर्मनी, सिंगापुर और कनाडा 10-13 फीसद खर्च करते हैं. 2022 तक 80 लाख से ज्यादा जापानियों के पास राष्ट्रीय कौशल प्रमाणपत्र था, जो उन्हें वेल्डिंग और बढ़ईगीरी से लेकर आइटी और वित्त तक 132 अलग-अलग कामों के योग्य बनाता था. भारत इस मोर्चे पर बुरी तरह पिछड़ा है.
औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आइटीआइ) का नेटवर्क 2005 से चार गुना होकर 14,789 केंद्रों और 25.4 लाख सीटों तक पहुंच चुका है. फिर भी केवल 48.2 फीसद सीटें भरती हैं. शिक्षक भी आधे से कम हैं और नौकरी पाने वाले छात्र भी. इसमें हैरानी नहीं क्योंकि 70 फीसद से अधिक निजी आइटीआइ के कोर्स नई औद्योगिक जरूरतों से बहुत पीछे हैं. हमारी नेशनल एप्रेंटिसशिप प्रमोशन स्कीम असर नहीं दिखा सकी जबकि जर्मनी के कामगारों में 2.7 फीसद प्रशिक्षु हैं.
इन निराशाजनक आंकड़ों के पीछे एक असहज सामाजिक सच है. सफेदपोश नौकरियों को ऊंचा और हाथ के काम को नीचा मानने वाली भारतीय सोच सीधे जाति से जुड़े पुराने कलंक से आती है. यह संयोग नहीं कि 77.4 फीसद आइटीआइ छात्र वंचित जातियों से आते हैं.
उनमें से कई के लिए यह आकांक्षा नहीं बल्कि मजबूरी में अपनाया विकल्प है—अपनी सामाजिक जगह से बाहर निकलने का रास्ता नहीं, उसी में वापसी. जब तक हम ईमानदारी से इसका सामना नहीं करेंगे, कोई संस्थागत सुधार वह सांस्कृतिक बदलाव नहीं ला पाएगा जिसकी व्यावसायिक प्रशिक्षण को जरूरत है.
उद्योग भी यह कमी पूरी करने आगे नहीं आता. केवल 7.7 फीसद भारतीय कंपनियां औपचारिक प्रशिक्षण देती हैं. टीमलीज के सह-संस्थापक मनीष सभरवाल के शब्दों में, उन्हें “अपने कर्मचारी खुद तैयार करने” के लिए बहुत कम वित्तीय प्रोत्साहन मिलता है.
वे इसे ऐसे निवेश की तरह देखते हैं जिसका रिटर्न सचमुच ‘भाग जाता’ हैः कर्मचारी प्रशिक्षण लेकर कंपनी छोड़ देते हैं. इसलिए उद्योग कमी दूर करने के बजाए हुनरमंद लोगों की कमी की शिकायत करता है. अंबाला का मेडिकल उपकरण उद्योग इसलिए खत्म हो गया क्योंकि क्षेत्र ने उसे चलाने वाले लोग तैयार करना बंद कर दिया.
प्रशिक्षण व्यवस्था न होने पर उत्पादन की निर्भरता की यही कीमत चुकानी पड़ती है. मांग के मुकाबले आपूर्ति की नाकामी और भयावह दिखती है. अनुमान है कि 2031 तक भारत में हुनरमंद कामगारों, निर्माण और बुनियादी ढांचे में 31 लाख, नर्सिंग और संबंधित क्षेत्रों में छह लाख तथा पर्यटन और होटल कारोबार में 9.46 लाख लोगों की कमी होगी.
इस सबके केंद्र में सामान्य डिग्री का सवाल है. 2026 में बीए की डिग्री आखिर आपको किस काम के योग्य बनाती है? भारत ने इस सवाल का सामना कभी गंभीरता से नहीं किया क्योंकि दशकों तक किसी भी तरह की डिग्री महत्वाकांक्षी तबकों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता, ऊंची सामाजिक हैसियत की चाबी और एक दहलीज पार करने का सबूत थी.
इस प्रतीक का ऐतिहासिक महत्व समझ में आता है, लेकिन अब वह उस हकीकत से कट गया है जिसकी ओर कभी इशारा करता था. दो हुनर-आधारित डिप्लोमा वाली एक ग्रेजुएट आज लखनऊ में चाय बनाती है. यह रूपक नहीं बल्कि इस हफ्ते की हमारी कवर स्टोरी का एक केस स्टडी है.
सीनियर एसोसिएट एडिटर सोनल खेत्रपाल ने लक्षणों से लेकर कारणों और समाधानों तक इस समस्या की पूरी पड़ताल की है. सुधारा गया और पर्याप्त साधनों वाला आइटीआइ नेटवर्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी फ्यूल इंजेक्शन पंप बन सकता हैः ऐसे कोर्सों के साथ जो मौजूदा औद्योगिक जरूरतों, बेहद स्थानीय मांग और तेजी से बढ़ती सेवा अर्थव्यवस्था समेत उभरते क्षेत्रों के अनुरूप हों.
भारत ने बहुत लंबे समय तक सफेदपोश नौकरी का गुणगान और हुनरमंद हाथों को कमतर माना है. मगर हर विकसित अर्थव्यवस्था ज्ञान और कारीगरी, दोनों से बनती है. हमारी परंपरा भी इसे मानती थी. भारतीय पुराणों में दिव्य वास्तुकार विश्वकर्मा ने ब्रह्मांड की रचना डिग्री से नहीं, हुनर से की थी.
ज्यादा ग्रेजुएट बनाने से भारत को जनसांख्यिकीय लाभ नहीं मिलेगा. वह ऐसे ज्यादा लोग तैयार करने से मिलेगा जो निर्माण, मरम्मत, डिजाइन, इलाज, सृजन और समस्याओं का समाधान करना जानते हों. तेजी से आधुनिक होते देश को अब इसी शिक्षा क्रांति की जरूरत है.