अपनी अलग राह

राहुल गांधी ने ऐसे मुद्दे उठाए हैं, जो लोगों के बीच असर पैदा करते हैं, मगर वे अपनी पार्टी को अपने साथ आगे बढ़ाने के लिए लगातार जूझ रहे हैं. उनकी सियासत और कांग्रेस के सुस्त संगठन के बीच बढ़ता फासला ही उनकी सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा

राहुल गांधी दिल्ली के इंदिरा भवन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान, 29 अगस्त

अगस्त की 22 तारीख को पुणे के एआइएसएसएमएस कॉलेज ग्राउंड में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के चौथे संस्करण में हजारों युवा महिलाएं जुटी थीं. यह कांग्रेस का देशव्यापी छात्र संपर्क अभियान है. नियॉन पीली लिनेन शर्ट पहने राहुल ने महिलाओं की इस सभा को पितृसत्ता पर जोरदार हमले का मंच बना दिया.

उन्होंने मनुस्मृति का जिक्र किया, महिला प्रदर्शनकारियों के “अपशब्दों” का इस्तेमाल करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सांस्कृतिक सदमे” को लेकर उन पर निशाना साधा और तालियों से गूंजती भीड़ से कहा, “हमें मिलकर इस पितृसत्ता को खत्म करना है. पितृसत्ता को ध्वस्त कर दो.” 

भाजपा ने तुरंत पलटवार किया. उसे जवाब कहीं दूर नहीं खोजना पड़ा. राहुल की पार्टी ने ही उसे मौका दे दिया. जून में जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का पुनर्गठन हुआ और सिद्धारमैया की जगह डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बने तो उनके नए 33 सदस्यीय मंत्रिमंडल में एक भी महिला को जगह नहीं दी गई. इस महीने की शुरुआत में कर्नाटक कांग्रेस ने 35 जिला अध्यक्षों के नाम का ऐलान किया. उनमें सभी पुरुष थे. 

यह फासला सिर्फ महिला प्रतिनिधित्व के मुद्दे तक सीमित नहीं है. राहुल गांधी और कांग्रेस के बीच सियासी सोच और दिशा का अंतर लगातार बढ़ता दिख रहा है. पिछले दो वर्षों में राहुल ने बार-बार ऐसे मुद्दे उठाए हैं, जिनका आम वोटरों से सीधा जुड़ाव नजर आता है. साथ ही,

भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के खिलाफ उनका रुख लगातार आक्रामक होता गया है. अग्निवीर और पेपर लीक से लेकर मणिपुर हिंसा, किसानों के लिए एमएसपी, बेरोजगारी, जातिगत जनगणना, राजनेताओं और पूंजीपतियों की मिलीभगत और चीन का खतरा तक वे कई मुद्दे उठा चुके हैं.

अब उनका ताजा आरोप है कि मोदी सरकार 2,000 रुपए से अधिक के यूपीआइ (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) लेनदेन पर शुल्क लगाने के लिए अमेरिकी टेक दिग्गजों के दबाव के आगे झुक रही है. 

फिर भी, सियासी बहस की दिशा तय करने की राहुल गांधी की क्षमता कांग्रेस को उसी हिसाब से चुनावी लाभ दिलाने में बार-बार नाकाम रही. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कुल 1,686 सीटों में से 924 पर चुनाव लड़ी और सिर्फ 171 सीटें जीत सकी.

उसकी जीत की दर करीब 18.5 फीसद रही. जम्मू-कश्मीर और झारखंड में वह विजयी गठबंधनों का हिस्सा रही और केरल में उसने जीत दर्ज की. मगर हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और असम में उसे हार मिली. पश्चिम बंगाल में उसे सिर्फ दो सीटें मिलीं और पुद्दुचेरी में सिर्फ एक.

थोड़ी कामयाबी, थोड़ी चूक 

कई मौकों पर मुद्दा हाथ से निकल जाने के बाद भी राहुल और कांग्रेस उस पर कुछ हद तक सियासी बढ़त हासिल करने में सफल रहे हैं. जुलाई में दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के बाद, कांग्रेस नेताओं को महसूस हुआ कि युवाओं का आक्रोश पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर केंद्रित है और गृह मंत्री अमित शाह उससे काफी हद तक बच गए.

इस बीच, अगस्त के मध्य में राहुल गांधी की टीम को खबर मिली कि 20 जुलाई को पुलिस कार्रवाई के दौरान पेलेट गन से घायल साहिल लोचव नामक एक युवा एम्स में इलाज करा रहा है. राहुल ने तुरंत अपने सहयोगियों से उससे संपर्क करने को कहा. अस्पताल में पुलिस की मौजूदगी के बावजूद लोचव को वहां से 10 जनपथ लाया गया.

जल्द एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई, जहां उस युवा—जिसने एक आंख की रोशनी खो दी थी—के जख्म को कांग्रेस नेता ने अमित शाह पर निशाना साधने और उनका इस्तीफा मांगने का हथियार बनाया. बाद में, राहुल ने संसद मार्ग थाने पर धरना दिया जब तक कि पुलिस “अज्ञात लोगों” के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने पर सहमत नहीं हुई. 

इससे कुछ हफ्ते पहले राहुल ने ऐसा ही सियासी मौका भुनाया जब उन्होंने पेपर लीक मामले के विरोध में पीएम आवास तक मार्च निकालने का प्रस्ताव रखा. शुरुआत में इसकी जानकारी सिर्फ उनकी बहन प्रियंका गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल को थी. कांग्रेस के बाकी नेताओं को मल्लिकार्जुन खड़गे के घर पर उनका जन्मदिन मनाने के बहाने बुलाया गया और फिर उन्हें कहा गया कि असली गंतव्य तो एक किलोमीटर दूर है. 

दरअसल, युवाओं और शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं पर राहुल ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आने के काफी पहले ध्यान देना शुरू कर दिया था. वह वर्षों से परीक्षा लीक, भर्तियों में देरी और शिक्षित युवाओं के लिए घटते अवसरों के मुद्दे उठाते रहे हैं. उनका ‘छात्रों की गूंज’ अभियान कोटा में 17 जून को यानी सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके के 20 जून को जंतर मंतर पर आंदोलन शुरू करने से तीन दिन पहले शुरू हुआ था. 

मगर, सीजेपी के उभार ने साफ कर दिया कि किसी समस्या को पहचानना एक बात है और उस पर सियासी हक जमाना दूसरी. अगस्त 2026 का इंडिया टुडे देश का मिज़ाज सर्वे इस विरोधाभास को और स्पष्ट करता है. जनवरी से अगस्त के बीच बतौर पसंदीदा प्रधानमंत्री मोदी का स्कोर करीब छह फीसद गिरकर 48.7 फीसद पर आ गया.

मगर इसका लाभ राहुल की रेटिंग में नहीं दिखा जो 26.6 फीसद से 27.1 फीसद पर ही पहुंची. दोनों के बीच का अंतर इसलिए कम हुआ क्योंकि मोदी का समर्थन घटा, न कि इसलिए कि राहुल ने नए समर्थक जुटाए.

युवाओं के बीच यह अंतर और चौंकाने वाला है जबकि राहुल लगातार युवाओं से जुड़ने की कोशिश करते रहे हैं. जेन ज़ी उत्तरदाताओं में मोदी का समर्थन घटकर 43.9 फीसद रह गया, मगर राहुल 27.4 फीसद पर ही बने रहे, जो कि उनके बाकी कुल आंकड़े के समान ही है. 

ये आंकड़े अहम हैं क्योंकि राहुल वर्षों से इस वर्ग को साधने की कोशिश में जुटे हैं. 2007 में यूथ कांग्रेस का प्रभार संभालने के साथ युवाओं से उनका सीधा जुड़ाव शुरू हुआ. फिर, उनकी राजनीति कई पड़ावों से गुजरी. यूपीए दौर के बागी राजकुमार से लेकर मंदिर दर्शन, ‘उदार हिंदुत्व’, और 2017 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ विफल ‘यूपी के लड़के’ का प्रयोग तक. 

यही बात राहुल के बदले तेवरों और उनकी मौजूदा दुविधा, दोनों को दर्शाती है. सार्वजनिक जीवन में दो दशकों से अधिक समय बिताने के बाद, अब वे राजनीति में अधिक सहज दिखते हैं और अपने करियर के किसी भी मोड़ की तुलना में राष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावशाली लगते हैं. कभी वंशवादी नेता के तौर पर देखे जाने वाले राहुल अब एक दशक में लोकसभा के पहले आधिकारिक नेता प्रतिपक्ष हैं.

राहुल ने कांग्रेस को उसकी पुरानी मध्यमार्गी राजनीति से बाहर लाकर सामाजिक न्याय और आर्थिक अधिकारों के मुद्दे पर मध्य-वाम झुकाव की ओर मजबूती से खड़ा कर दिया है. अब वे सिर्फ चुनाव प्रबंधक नहीं, बल्कि पार्टी के मुख्य विचारक बन चुके हैं.

फिर भी, वे अक्सर ऐसे अकेले योद्धा लगते हैं, जिनके सियासी तर्क को बाकी विपक्ष, और यहां तक कि उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी भी अंतिम मुकाम तक ले जाने में नाकाम रहती है.

गूंज का असर 

पार्टी महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला को लगता है कि यह वक्त एकदम मुफीद है. उनका कहना है कि 2014 के बाद जिस सियासी धरातल पर भाजपा मजबूत हुई थी, वह दरक रहा है. उनका तर्क है कि धार्मिक-जातिगत ध्रुवीकरण का मुकाबला बेरोजगारी, घटते अवसरों और भविष्य की चिंताओं से अब हो रहा है.

वे कहते हैं, “राहुल ने इस स्थिति को पहले भांप लिया था और वे लगातार यही कह रहे हैं. लोग अब उनकी नीयत में ईमानदारी देखते हैं और उन बातों को सुनते हैं जो उनके जीवन से सीधे जुड़ी हैं. सो, आज उनकी बात असर कर रही है.” 

राहुल के सियासी उभार को स्वीकारने वाले अधिकांश जानकार एक शर्त भी जोड़ते हैं. वे मानते हैं कि राहुल अब मुद्दों पर अधिक तीखे हैं और संवाद में अधिक प्रभावी हैं, मगर उनका सियासी प्रदर्शन अब भी निरंतरता की कमी से जूझ रहा है.

वे कोई मुद्दा पकड़ सकते हैं, कुछ वक्त चर्चा पर हावी हो सकते हैं, मगर फिर अभियान की गति सुस्त हो जाती है. चुनाव आयोग और वोट चोरी पर उनके हमले इसे दर्शाते हैं. जोरदार ढंग से सियासी मुद्दा बनाने के बाद वे अचानक घरेलू राजनीति से दूर हो जाते हैं. 

राजनैतिक विश्लेषक राहुल वर्मा भी यही कमियां देखते हैं. उनके मुताबिक, राहुल गांधी को संगठन एवं चुनावी राजनीति की नियमित कार्यप्रणाली में गहराई से उतरना होगा. वे कहते हैं, “सिर्फ सही रुख अपनाना या सोशल मीडिया पर ध्यान खींचना काफी नहीं. मतदाता निर्णय लेने की क्षमता, मजबूत सियासी स्थिति और लगातार जुड़ाव के आधार पर भी परखते हैं.” 2025 में बिहार इसकी सबसे स्पष्ट मिसाल है.

मतदाता सूचियों के विवादित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) और वोट चोरी के आरोपों के इर्दगिर्द केंद्रित रही राहुल की 16 दिवसीय वोटर अधिकार यात्रा 25 जिलों से गुजरी जिसमें भारी भीड़ जुटी. पर, कांग्रेस जिन 61 सीटों पर लड़ी उनमें से छह ही जीत सकी.

धीरे-धीरे चढ़ता रंग 

मगर कांग्रेस के कुछ नेताओं का तर्क है कि यह मुद्दों पर आधारित राजनीति धीरे-धीरे रंग ला रही है. वे सितंबर में राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों की मिसाल देते हैं, जहां खड़गे के दौरे के बाद उत्तराखंड के हल्द्वानी में आयोजन स्थल के कथित “शुद्धिकरण” के मुद्दे को सामाजिक न्याय से जोड़ा गया.

 कांग्रेस ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 542 वार्डों में जीत हासिल की जबकि भाजपा को 350 सीटें मिलीं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने इन नतीजों का श्रेय इस घटना से दलित समुदाय में उपजे गुस्से को दिया. 

मगर राहुल के सामने इससे कहीं बड़ी परीक्षा आने वाली है. जून 2029 तक 20 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें कुल 2,437 सीटें हैं. कांग्रेस अभी इनमें से तीन राज्यों—कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना—में सत्ता में है.

इन सभी राज्यों में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 2,252 सीटों पर चुनाव लड़ा और सिर्फ 506 सीटें जीती थीं. उसकी जीत की दर करीब 22 फीसद रही. आने वाले विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन बताएगा कि राजस्थान के निकाय चुनाव का नतीजा किसी व्यापक रुझान का आगाज था या महज एक अपवाद. 

सुरजेवाला का तर्क है कि कांग्रेस बेहद जटिल संगठन है जिसमें भिन्न-भिन्न वैचारिक धाराएं हैं और निहित हित भी जुड़े हैं, जो हमेशा राहुल के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलते. फिर भी, उनका दावा है कि पार्टी कार्यकर्ता राहुल से तेजी से जुड़ रहे हैं.

वे इसके लिए प्रयागराज और कोटा में युवाओं के कार्यक्रमों में जुटी भीड़ का हवाला देते हैं. उनके अनुसार, “कांग्रेस हाथी की तरह है, शेर की तरह नहीं. यह धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देती है, मगर जब चलना शुरू करती है तो पूरी ताकत से आगे बढ़ती है. तब बड़े-बड़े शिकारी जानवर भी इसका रास्ता छोड़ देते हैं.”

आंतरिक कलह 

दरअसल, कांग्रेस का संदेश लोगों तक न पहुंच पाने की एक बड़ी वजह यह भी है कि पार्टी-शासित राज्य अलग ही सियासी दुनिया में सिमटे रहते हैं. वे अपनी सरकारों और नेताओं की आपसी खींचतान और स्थानीय समीकरणों में बाहर नहीं आ पाते.

राहुल किसी मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई छेड़ना चाहते हैं तो अक्सर पार्टी की आंतरिक गुटबाजी सुर्खियां बन जाती है. कर्नाटक में सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी की जंग तीन साल चली, जिसे अंततः मई 2026 में हाइकमान ने सुलझाया. 2026 के एकमात्र बड़े विधानसभा चुनाव वाले राज्य केरल में वी.डी. सतीशन एवं के.सी. वेणुगोपाल के बीच 10 दिनों तक गतिरोध रहा.

अंततः कैबिनेट में दोनों गुटों को बराबर हिस्सेदारी दी गई. पंजाब में प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और प्रचार समिति के अध्यक्ष चरणजीत सिंह चन्नी के गुट अगस्त में बैठकों में भिड़ गए, जिससे ‘हर बूथ कांग्रेस मजबूत’ अभियान पर ही संकट मंडराने लगा. 

ये विरोधाभास पार्टी की साख पर सवाल खड़े करते हैं. राहुल की राजनीति तब तक केवल बयानबाजी ही लगेगी जब तक कि कांग्रेस की राज्य सरकारें उसे धरातल पर उतारकर न दिखाएं.

कांग्रेस ने 2022 में वादा किया था कि युवाओं, महिलाओं, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों को अधिक प्रतिनिधित्व देगी, मगर जमीन पर इसका असर दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा. 

पार्टी में राहुल समर्थकों का कहना है कि योग्य प्रबंधकों की कमी है. उनके एक करीबी सहयोगी कहते हैं, “हमारे पास चुनाव प्रबंधन के लिए पर्याप्त लोग नहीं और पार्टी पेशेवरों को जोड़ने में हिचकिचाती है.” अब स्थिति बदलने के संकेत मिल रहे हैं.

सितंबर में खुद राहुल, प्रियंका और वेणुगोपाल ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी) के सचिव पदों के लिए करीब 130 संभावित उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया ताकि मौजूदा सचिवों में से लगभग आधे को बदला जा सके. यह बदलाव संगठन को नए सिरे से गढ़ने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है.

दिसंबर 2024 के बेलगावी सत्र के बाद शुरू किए गए संगठन सृजन अभियान ने जिला अध्यक्षों के चयन का तरीका बदल दिया है. अब व्यापक विचार-विमर्श के साथ-साथ युवाओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों को जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है. लगभग 700 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति हो चुकी है और 200 से 250 अन्य नियुक्तियां प्रस्तावित हैं. इनकी औसत उम्र 45 से 50 वर्ष के बीच है.

सहमति का अभाव 

यही समस्या विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के साथ भी है. राहुल के अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव (राजद), एम.के. स्टालिन (द्रमुक), उद्धव ठाकरे (शिवसेना-यूबीटी) और शरद पवार (एनसीपी-एसपी) से निजी संबंध अच्छे हैं. मगर निजी संबंध पार्टियों में स्थायी तालमेल की जगह नहीं ले सकते.

जून में इंडिया ब्लॉक की बैठक में यह बात सामने आई कि द्रमुक के साथ कांग्रेस के बर्ताव, वामपंथियों के खिलाफ मोर्चा और राष्ट्रीय सहमति को उसकी राज्य इकाइयों की ओर से कमजोर करने की वजह से नाराजगी है. माकपा नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने यहां तक आरोप लगाया कि राहुल अपने रुख से अनजाने में ही सही मगर भाजपा की मदद कर रहे हैं. 

तमिलनाडु का केस सबसे दिलचस्प है. सिर्फ पांच सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने पुराने सहयोगी द्रमुक का साथ छोड़कर विजय की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेत्री कलगम) से हाथ मिला लिया. कुछ ही महीनों बाद दोनों नए सहयोगी देश के नेतृत्व की दौड़ में आमने-सामने आ गए.

कांग्रेस नेता 2029 के लिए राहुल गांधी का नाम आगे बढ़ा रहे थे जबकि टीवीके समर्थक विजय को दावेदार बता रहे हैं. माकपा महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा, “राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने की कांग्रेस नेताओं की कोशिश जल्दबाजी भरी है.” 

राहुल के सियासी करियर के लंबे वक्त में मतदाता तय नहीं कर पाए थे कि वे किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह सवाल काफी हद तक सुलझ गया है क्योंकि उनकी वैचारिक भाषा अब स्पष्ट है. मगर क्या वे समर्थकों को वोटरों में, किसी राज्य की जीत को राष्ट्रीय मॉडल में, एवं निजी केमिस्ट्री को टिकाऊ गठबंधन में बदल पाएंगे?

जब तक वह ऐसा नहीं कर पाते, राहुल मोदी और भाजपा को चुनौती देने वाले विपक्ष के सबसे बड़े नेता तो बने रहेंगे, मगर उनके पास वह मजबूत सियासी संगठन नहीं होगा जिसकी किसी बड़े चेहरे को सख्त जरूरत होती है.

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