नक्सलियों को निबटा दिया, अब क्या करें?
जैसे-जैसे माओवादी उग्रवाद सिमट रहा है, तेलंगाना अपनी सबसे खास ग्रेहाउंड्स फोर्स के जवानों को यातायात प्रबंधन और साइबर क्राइम जैसी पुलिसिंग की नई भूमिकाओं में तैनात कर रहा. लेकिन आंध्र प्रदेश इस मामले में फूंक-फूंककर कदम रखने का रवैया अपनाया

उग्रवाद से निबटने वाले पुलिस अभियानों में ग्रेहाउंड्स ने खड़ी की मिसाल
हाउंड्स फोर्स का गठन ऐसी जंग के लिए हुआ था, जिसकी सूरत अब पूरी तरह बदल चुकी है. तीस साल से भी ज्यादा समय तक अविभाजित आंध्र प्रदेश और फिर तेलंगाना में भी सक्रिय रहे इस जांबाज पुलिस बल ने मध्य भारत के सबसे दुर्गम जंगलों से माओवादी छापामारों को खदेड़ा.
1980 के दशक के उत्तरार्ध में जब वामपंथी उग्रवाद चरम पर था, ऐसे समय में ग्रेहाउंड्स की नींव रखी गई थी. धीरे-धीरे यह बल देश की सबसे खास उग्रवाद-विरोधी इकाइयों में से एक बन गया, जिसे जंगलों में जंग लड़ने, सटीक खुफिया जानकारियां जुटाने और अपनी अचूक रणनीति के लिए जाना गया. लेकिन आज इतिहास एक नई हकीकत से रूबरू है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश को नक्सलमुक्त घोषित कर दिया है और तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के पुलिस प्रमुखों का भी मानना है कि उनके राज्यों में सशस्त्र माओवादियों की मौजूदगी लगभग खत्म हो चुकी है. अब दोनों सरकारों के सामने एक नया सवाल खड़ा है कि जिस विशेष बल को उग्रवाद से निबटने के लिए बनाया गया था, उग्रवाद थमने के बाद उस फोर्स का आखिर अब क्या किया जाए?
माओवाद के खात्मे के लिए केंद्र सरकार की ओर से घोषित 31 मार्च की समयसीमा से पहले ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने ग्रेहाउंड्स का दायरा घटाने की वकालत की थी. उनका सुझाव था कि इन जवानों को पुलिस की दूसरी शाखाओं में भेजा जाए.
नौ मार्च 2026 को तेलंगाना पुलिस रिट्रीट में उन्होंने कहा था, “जब मकसद पूरा हो गया, तो इतने प्रशिक्षित जवानों को वहां तैनात रखने का क्या फायदा?” यह बयान उन्होंने हैदराबाद में अपने सामने 130 माओवादियों के आत्मसमर्पण के ठीक दो दिन बाद दिया था.
तेलंगाना पुलिस विभाग ने इस पर तेजी से अमल किया. करीब 1,250 ग्रेहाउंड्स जवानों में से आधे को स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच (एसआइबी) और आतंकवाद-निरोधी इकाई ऑक्टोपस समेत पुलिस की आठ अलग-अलग शाखाओं में तैनात किया जा रहा है.
इसके उलट, आंध्र प्रदेश फूंक-फूंककर कदम रख रहा है. वह बल को छोटा करने में जल्दबाजी नहीं करना चाहता क्योंकि इतिहास गवाह है कि कैसे कुचल दिए जाने के बाद भी उग्रवाद अचानक फिर से सिर उठा लेता है.
पुलिस बल बेमिसाल
ग्रेहाउंड्स की शुरुआत 1980 के दशक के उत्तरार्ध में हुई, जब अविभाजित आंध्र प्रदेश में वामपंथी उग्रवाद या नक्सली हिंसा तेजी से बढ़ रही थी. 1989 में मुख्यमंत्री एन.टी. रामराव के कार्यकाल में आइपीएस अधिकारी के.एस. व्यास ने इसे इसका मौजूदा रूप दिया.
जनवरी 1993 में हैदराबाद में पीपुल्स वार ग्रुप ने गोली मारकर व्यास की हत्या कर दी. सिलसिला यहीं नहीं थमा था-अब तक 60 से ज्यादा ग्रेहाउंड्स जवान बलिदान हो चुके हैं.
सबसे दर्दनाक घटना 29 जून 2008 को हुई, जब आंध्र प्रदेश-ओडिशा सीमा पर बालिमेला जलाशय में नाव से जा रहे जवानों पर माओवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया. इस हमले में 32 कमांडो और छह दूसरे पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे.
बहरहाल, ग्रेहाउंड्स के अभियानों, एसआइबी की सटीक खुफिया जानकारी और मुस्तैद पुलिस व्यवस्था के साथ-साथ सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने मिलकर 2017 तक आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से उग्रवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया. हालांकि, पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में माओवादियों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा.
वहीं, दूसरे राज्यों ने इससे प्रेरणा लेकर अपनी इकाइयां बनाईं. मसलन छत्तीसगढ़ का डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी), महाराष्ट्र की सी-60, ओडिशा का स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) और सीआरपीएफ की कोबरा इकाई.
लेकिन ग्रेहाउंड्स जैसी कामयाबी बहुत कम को ही मिली. इसकी बड़ी वजह इसका नेतृत्व था; ग्रेहाउंड्स की कमान हमेशा आइजी रैंक या उससे ऊपर के स्तर के आइपीएस अफसर के हाथ में रही.
छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में सेवाएं दे चुके डीआइजी इंदिरा कल्याण इलेसेला कहते हैं, “ग्रेहाउंड्स जवान जंग लड़ने में माहिर कमांडो हैं, लेकिन उनकी बेमिसाल सफलता के पीछे खुफिया इकाई एसआइबी का भी बड़ा हाथ रहा है. दोनों के बीच जुगलबंदी और सटीक कार्रवाई की तुलना इस्राएल की मोसाद से की जा सकती है.”
इन कमांडो की साख सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि उनके जुझारूपन से बनी थी. वे तीन से पांच दिनों तक जंगलों में तलाशी अभियान चला सकते थे—कई बार राशन खत्म होने पर चिक्की खाकर गुजारा करते थे. वे 25 किलो तक के हथियार और उपकरण लादकर ऐसे घने जंगलों में बढ़ते थे जहां बारूदी सुरंगों और घात लगाकर हमला किए जाने का खतरा हर पल बना रहता था.
आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे एक राज्य के आइपीएस अधिकारी बताते हैं, “वे आते हैं, हमारे जवानों के साथ मिलकर साझा ऑपरेशन चलाते हैं और फिर उतनी ही खामोशी से लौट जाते हैं, सारा श्रेय स्थानीय राज्य पुलिस को दे देते हैं.”
जंग से निकलकर अब पुलिस तंत्र में
अब इन चुनिंदा कमांडो को अपने कौशल का इस्तेमाल उन समस्याओं से निबटने में करने को कहा जा रहा है, जो जंगल की मुठभेड़ों से बिल्कुल अलग हैं. तेलंगाना के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) सी.वी. आनंद बताते हैं कि करीब 1,250 ग्रेहाउंड्स जवानों में से यही कोई 575 को जरूरत के हिसाब से नई जिम्मेदारियां दी जा रही हैं.
फिलहाल, सबसे बड़ी टुकड़ी यानी लगभग 225 जवानों को यातायात प्रबंधन और सड़क सुरक्षा विभाग में भेजा जा रहा है. इसके अलावा, 80 जवानों को खाद्य मिलावट और औषधि नियंत्रण, 79 को सतर्कता और एनफोर्समेंट में भेजा जा रहा है. बाकी को नागरिक आपूर्ति, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी), सीआइडी और साइबर सुरक्षा ब्यूरो में भेजा जा रहा है.
बदलाव इस बात का संकेत है कि पुलिस के सामने चुनौतियां अब बदल चुकी हैं. डीजीपी आनंद इंडिया को बताते हैं, “1980 से 2000 के दशक में उग्रवाद और आतंकवाद जैसी चुनौतियां थीं. आज पुलिस को ड्रग तस्करी, साइबर क्राइम, ऑनलाइन सट्टेबाजी, निवेश धोखाधड़ी, यातायात प्रबंधन और खाद्य सामग्री में मिलावट जैसी समस्याओं से निपटना पड़ रहा है.”
टेक्नोलॉजी भी इस बदलाव का अहम हिस्सा है. करीब 25 ग्रेहाउंड्स कमांडो को तेलंगाना पुलिस की टेक्नोलॉजी और एआइ विंग टी-स्पार्क में भेजा गया है, जो सीधे पुलिस महानिदेशक कार्यालय के अधीन काम करती है. इसका मकसद स्मार्ट पुलिसिंग और डिजिटल बदलाव लाना है, ताकि जांच ज्यादा सटीक तरीके से की जा सके और त्वरित फैसले लिए जा सकें.
साख और मकसद
इस फैसले की आलोचना भी हो रही है, खासकर जवानों को ट्रैफिक ड्यूटी में लगाने को लेकर. तेलंगाना भाजपा के मुख्य प्रवक्ता एन.वी. सुभाष कहते हैं, “चूंकि माओवादी खतरा अब खत्म हो चुका है, इसलिए ग्रेहाउंड्स के पुनर्गठन की जरूरत तो है लेकिन उन्हें चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस की तरह खड़ा करना फोर्स के कुछ दशकों के अनुभव और उनके बलिदान का अनादर करने जैसा है.”
ग्रेहाउंड्स में असॉल्ट कमांडर रह चुके एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी भी इस चिंता से सहमत हैं. उनका मानना है कि इस तरह की सामान्य ड्यूटी से उन जवानों का हौसला टूट सकता है जिन्हें जनता और उनके साथी हमेशा बहुत सम्मान की नजर से देखते आए हैं.
फोर्स में उनकी प्रतिष्ठा का अंदाजा उन्हें मिलने वाली सुविधाओं से भी लगाया जा सकता है. कमांडोज को उनके मूल वेतन पर 60% अतिरिक्त भत्ता मिलता रहा है. उनके परिवारों को रहने के लिए क्वार्टर, बच्चों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं. ड्यूटी के दौरान शहीद होने पर परिवार को एक करोड़ रुपए का मुआवजा, परिजन को सरकारी नौकरी और 200 वर्ग गज का भूखंड दिया जाता है.
हालांकि, डीजीपी आनंद कहते हैं कि पुनर्गठन बिना सोचे-समझे नहीं किया गया है. जवानों की योग्यता और पृष्ठभूमि को परखने तथा साक्षात्कार के बाद ही उन्हें नई जिम्मेदारियां दी गई हैं. वे कहते हैं, “इसका उद्देश्य उपलब्ध पुलिस बल का उन क्षेत्रों में सबसे सही इस्तेमाल करना है जो सीधे आम लोगों की जिंदगी और सुरक्षा से जुड़े हैं.”
जवानों को नए विभागों के अनुरूप तैयार करने के लिए तेलंगाना पुलिस अकादमी में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया गया. हैदराबाद में कुछ जवानों को नए काम का अभ्यास कराने के वास्ते कुछ समय के लिए सड़कों के चौराहों पर भी तैनात किया गया. बदलाव के लिए मानसिक रूप से तैयार करने को उनकी काउंसिलिंग भी कराई गई.
ग्रेहाउंड्स और ऑक्टोपस के डीजीपी (ऑपरेशन्स) डॉ. अनिल कुमार इस पर जोर देते हैं कि जवानों को दूसरी जगह भेजने का मतलब यह कतई नहीं कि फोर्स के मूल मकसद को भुला दिया गया है. 650 से ज्यादा जवान अब भी माओवाद-विरोधी फोर्स में तैनात रहेंगे.
वे कहते हैं, “हम माओवाद के खिलाफ सतर्कता कम नहीं कर रहे.” ग्रेहाउंड्स और ऑक्टोपस दोनों फोर्स के पास जमीनी अभियानों, रखरखाव और ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त संख्या बनी रहेगी और हर कुछ महीनों में इसकी समीक्षा की जाएगी.
कुछ कमांडोज के लिए यह बदलाव फोर्स में दशकों बिताने के बाद आ रहा है. 54 साल के अब्दुल रहमान 1997 में ग्रेहाउंड्स का हिस्सा बने थे, जब नक्सलवाद चरम पर था. उन्होंने लगभग पूरी नौकरी इसी यूनिट में बिताई और इस समय हैदराबाद के पास ग्रेहाउंड्स बेस पर तैनात हैं.
फोर्स में 20 वर्ष बिता चुके उनके साथी बाबू सिंह कहते हैं कि ग्रेहाउंड होने पर गर्व का मतलब यह नहीं कि वे नई जगह जाने का विरोध करेंगे. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, “हम किसी भावुकता से नहीं बंधे हैं जो मकसद पूरा होने के बाद भी यहीं रहने पर अड़े रहें. हमारे कुछ साथी दूसरी जगह तैनात हो चुके हैं, हम यहां हैं. कल अगर अधिकारी तय करेंगे कि हमारी जरूरत कहीं और है, तो हम उसी निष्ठा के साथ वहां पर वही सेवा देंगे जो हमने यहां सीखी है.”
आंध्र प्रदेश का सतर्क रुख़
दूसरी तरफ, आंध्र प्रदेश सतर्कता भरा रुख अपना रहा है. ग्रेहाउंड्स का लंबा अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी का कहना है कि राज्य में अभी ग्रेहाउंड्स, एसआइबी या ऑक्टोपस को छोटा करने की कोई तात्कालिक योजना नहीं है. वे कहते हैं, “हां, माओवादी गतिविधियां अब न के बराबर हैं लेकिन इन बेहतरीन लड़ाकू इकाइयों को समेटना या छोटा करना अभी जल्दबाजी होगा.”
उन्होंने 1990 के दशक के उस दौर की याद दिलाई जब पीपुल्स वार ग्रुप सिमटकर सिर्फ एक सशस्त्र दलम रह गया था. तब एकबारगी लगा था कि उग्रवाद खत्म होने के कगार पर है. लेकिन भूमिगत हो चुके उग्रवादियों ने फिर एकजुट होकर नए लोगों की भर्ती शुरू कर दी.
अधिकारी कहते हैं, “बाद में उनका प्रभाव नेपाल के पशुपतिनाथ से लेकर तिरुपति तक फैल गया. इसलिए हम पूरी तरह बेफिक्र नहीं हो सकते.” आंध्र प्रदेश में लगभग 1,200 ग्रेहाउंड्स कमांडो अब भी सक्रिय ड्यूटी पर हैं, जिन्हें 300 एसआइबी कर्मियों का सहयोग प्राप्त है जबकि ऑक्टोपस के पास करीब 480 कमांडो हैं.
इसके साथ, पुराने संघर्ष से जुड़े रहे बुनियादी ढांचों को अब नया रूप देने की तैयारी चल रही है. तेलंगाना सरकार करेगुट्टलू की पथरीली पहाड़ियों को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है.
यह राज्य में माओवादियों का आखिरी गढ़ था जिस पर इस वर्ष के शुरू में सुरक्षा बलों ने कब्जा जमा लिया था. डीजीपी आनंद ने स्वतंत्रता दिवस से पहले मुलुगु जिले में छत्तीसगढ़ सीमा के पास स्थित इस इलाके का दौरा किया था और वहां तिरंगा भी फहराया.
आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू सरकार विशाखापट्टनम के पास पहाड़ी पर स्थित ग्रेहाउंड्स के ट्रेनिंग बेस को होटलों के साथ एक बड़े कन्वेंशनल सेंटर या आइटी पार्क के रूप में विकसित करने पर विचार कर रही है. एक वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी का कहना है कि फोर्स के लिए एक नया बेस और ट्रेनिंग सेंटर पड़ोसी जिले विजयनगरम में बनाया जा सकता है.
साफ है कि ग्रेहाउंड्स का अगला अध्याय किसी एक ढर्रे पर नहीं चलेगा. सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि उस अनुशासन, हुनर और अनुभवों को कैसे सहेजकर रखा जाए जिसने इस फोर्स को इतना ताकतवर बनाया और साथ ही, उनके इस विशेष कौशल का इस्तेमाल जमीनी स्तर पर पेश आ रही नई चुनौतियों से निबटने में कैसे किया जाए.