पैदल वालों का हक सबसे पहले
19 जून को एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से निर्धारित फुटपाथों पर चलने का हक संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में निहित है, जो स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का आधार हैं

सांकेतिक फोटो
जरा सोचकर देखिए! पैदल चलने के लिए भी आपको संविधान की शरण लेनी पड़े तो कैसा लगेगा. भारत कुछ ऐसी ही स्थिति में है. 19 जून को एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से निर्धारित फुटपाथों पर चलने का हक संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 में निहित है, जो स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का आधार हैं.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पैदल चलने वालों के अधिकार ‘प्राथमिक’ हैं और मोटर आवागमन पर उन्हें वरीयता दी जानी चाहिए. यह फैसला 2014 में आंध्र प्रदेश के रायदुर्ग में पांच वर्षीय मनियार साहेब की सड़क दुर्घटना में मौत के मामले से जुड़ा था. मामला मुआवजा विवाद से शुरू हुआ, जो आगे मौलिक अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल में बदल गया.
बीते 15 वर्षों में कई शहरों ने पैदल चलने के अनुकूल सड़कों की समस्या पर नए सिरे से सोचा है. 2012 से बेंगलूरू, चेन्नै और पुणे ने शहरी सड़क डिजाइन से जुड़े कार्यक्रमों को पायलट स्तर पर लागू किया. पर ऐसे प्रयास काफी कम हैं. ऐसे में कोर्ट का आदेश सही वक्त पर आया है.
हर स्थानीय प्राधिकरण पर अब सुरक्षित फुटपाथों के निर्माण और रखरखाव की कानूनी रूप से बाध्यकारी जिम्मेदारी है. पहली मिसाल आंध्र प्रदेश ने पेश की, जिसने 8 अगस्त को ‘पैदल यात्री सुरक्षा और सार्वभौमिक सुलभता नीति 2026’ को मंजूरी दी.