आकार लेती अमरावती

बढ़ती लागत, निर्माण संबंधी चुनौतियों और जगन मोहन रेड्डी के विरोध के बीच चंद्रबाबू नायडू के सपनों की राजधानी बसाने की 2028 की समयसीमा तेजी से आ रही करीब

एमएलए/एमएलसी क्वार्टर्स से 13 अगस्त को राजधानी की परियोजना का निरीक्षण करते नायडू

कृषि-प्रधान आंध्र प्रदेश में इस साल कम बारिश चिंता का विषय रही है. वेलागपुडी स्थित छह-ब्लॉक वाले अंतरिम सचिवालय परिसर में बैठे समीक्षा बैठकों के आदी मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं कि वे अल नीनो के कारण बने सूखे के हालात से निबटने के लिए किसानों को हरसंभव सहायता दें.

यह दुमंजिला इमारत वही जगह है, जहां 2014 में आंध्र प्रदेश के विभाजन और हैदराबाद के अलग होने के बाद यानी 2016 से राज्य सरकार का कामकाज चल रहा है लेकिन आसपास के किसान यानी उन 29 गांवों और अमरावती राजधानी क्षेत्र की राजस्व जमीनों के लोग अपनी फसलों को लेकर कोई चिंता नहीं कर रहे.

तुल्लूरु गांव के एक किसान संबाशिव राव उप्पुतूरी कहते हैं, “बारिश तो निर्माण कार्य बाधित करती है.” पिछले एक दशक में कृष्णा नदी के किनारे तक फैले इन खेतों में (जिसके दूसरी तरफ विजयवाड़ा है) हर साल 2-3 फसलें तैयार होने के बजाए अब विशाल इमारतें खड़ी हो रही हैं.

संबाशिव गुंटूर के उन 29,966 किसानों में से एक हैं, जिन्होंने 2015-16 में नायडू के अमरावती के भव्य सपने के लिए 34,400 एकड़ भूमि दी थी. नायडू ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान हैदराबाद के तेलंगाना का हिस्सा बनने के बाद इस नई राजधानी की कल्पना की थी. उनका दावा है कि यह “दुनिया का सबसे बड़ा लैंड पूलिंग अभियान था जिसे विश्व बैंक ने एक केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत किया.”

संबाशिव के शब्दों में, “हम चाहते हैं कि यह प्रोजेक्ट जल्द से जल्द पूरा हो.” उन्होंने अपनी एक एकड़ जमीन इस उम्मीद में दी थी कि हजारों अन्य लोगों की तरह उन्हें भी इसके बदले में 250-450 वर्ग गज का विकसित कमर्शियल प्लॉट या 1,000 वर्ग गज का आवासीय प्लॉट मिलेगा.

लैंड पूलिंग योजना में खेती की आय के नुक्सान की भरपाई के लिए एक वार्षिक भत्ते का वादा भी किया गया था. स्थानीय लोगों को यह भी उम्मीद थी कि एक भव्य राजधानी बनने से उच्च आय वाली नौकरियां मिलेंगी, जमीन-जायदाद की कीमतों में उछाल आएगा और बड़े अवसर मिलेंगे. लेकिन इस सपने पर विराम लग गया जब नायडू 2019 का चुनाव हार गए और युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी (वाइएसआरसीपी) के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी मुख्यमंत्री बने. वे एक के बजाए तीन राजधानियां चाहते थे:

अमरावती को विधायी राजधानी, रायलसीमा के कुरनूल को न्यायिक राजधानी और विशाखापत्तनम को प्रशासनिक क्षेत्र बनाना, जिसके लिए जगन ने अपने कैंप-कार्यालय के रूप में 450 करोड़ रुपए का ऋषिकोंडा पैलेस भी बनवाया. ध्यान भटकने का नतीजा यह हुआ कि अमरावती का काम पूरी तरह ठप हो गया. नायडू ने अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट में सिंगापुर की कंपनियों के कंसोर्शियम से लेकर हैदराबाद की प्रमुख इन्फ्रा कंपनी एनसीसी तक को जोड़ा था.

विलंब की वजह से वे सब परियोजना से पीछे हटने लगीं. निर्माण स्थलों पर सन्नाटा छा गया. हर मॉनसून में नींव के ढांचे बारिश के पानी में डूब जाते थे और कई हिस्सों में घनी झाड़ियां उग आईं, यहां तक कि विधायकों और ऑल इंडिया सर्विसेज (एआइएस) अधिकारियों के लगभग पूरे हो चुके आवासीय परिसर भी वीरान हो गए. अपना भविष्य अंधकार में जाते देख न्याय की गुहार लगाते किसानों ने 1,631 दिनों का लंबा विरोध प्रदर्शन भी किया.

जीएडी-एचओडी टावरों का निर्माण कार्य

परियोजना ने पकड़ी रफ्तार

जून 2024 में नायडू फिर सत्ता में आ गए. दो साल बाद अब 216 वर्ग किलोमीटर में फैला यह क्षेत्र निर्माण गतिविधियों से गुलजार है.

एकीकृत सचिवालय परिसर में पांच आइकॉनिक टावर बनाए जा रहे हैं. चार टावर 40-40 मंजिला होंगे, जिनमें विभागाध्यक्षों (एचओडी) के कार्यालय होंगे; पांचवां टावर 50 मंजिल का होगा, जिसमें मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) समेत सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) होगा और इसकी छत पर एक हेलिपैड होगा. इन्हें जीएडी-एचओडी टावर्स कहा जाता है और इनका निर्माण तीन बड़ी कंपनियां कर रही हैं.

एनसीसी सीएमओ-जीएडी टावर बना रही है, शापूरजी पालोनजी को एचओडी-1 और 2 टावर बनाने का जिम्मा मिला है जबकि बाकी एचओडी टावर का निर्माण एलऐंडटी कर रही है. 2016 में हैदराबाद से आनन-फानन में शिफ्ट होने के बाद से सरकारी कार्यालय वर्तमान में विजयवाड़ा और नजदीकी शहरों मंगलगिरी और ताड़ेपल्ली तक फैले हैं. उनमें से कई दफ्तर किराए के भवनों से चल रहे हैं.

राजधानी परियोजना लागू करने वाली सरकारी एजेंसी आंध्र प्रदेश कैपिटल रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (सीआरडीए) के नए और आधुनिक कार्यालय में बैठे इसके आयुक्त विजय राम राजू बताते हैं कि लक्ष्य यह है कि सभी आइकॉनिक इमारतों, विधानसभा, हाइ कोर्ट और जीएडी-एचओडी टावरों का निर्माण कार्य पूरा कर मई 2028 तक उद्घाटन कर कर दिया जाए.

उनका कहना है, “मंत्रियों और न्यायाधीशों के बंगलों समेत आवास और अन्य मुख्य इमारतों जैसे घटक सितंबर 2026 तक, मुख्य बुनियादी ढांचा दिसंबर 2026 तक और लैंड पूलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर अक्तूबर 2027 तक तैयार हो जाएगा.” लैंड पूलिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर का मतलब है, किसानों को दिए जाने वाले 63,410 प्लॉट्स के निर्धारित क्षेत्र में बुनियादी ढांचे का विकास.

अगर 2028 मध्य का लक्ष्य पूरा हो जाता है, या इसमें कुछ महीनों की देरी भी होती है, तब भी नायडू और उनकी तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के पास 2029 के चुनावों से पहले जनता के सामने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को प्रदर्शित करने का पर्याप्त समय होगा.

मुख्यमंत्री लगातार समीक्षा बैठकें कर रहे हैं और सभी को तेजी से काम करने के लिए कह रहे हैं. निर्माण स्थलों का दौरा करने के बाद जब इंडिया टुडे ने नायडू से उनके कक्ष में मुलाकात की तो चार बार के मुख्यमंत्री 76 वर्षीय नायडू फीडबैक लेने के लिए काफी उत्सुक दिखे. हैदराबाद को वैश्विक टेक हब में बदलने वाले नायडू ने कहा, “हां, कुछ जगहों और कुछ पहलुओं में काम की गति को और बेहतर करने की जरूरत है. हम इसे करेंगे.”

फिलहाल, टावरों को आकार और मजबूती देने वाले भारी स्टील के ढांचे पांचवीं मंजिल तक पहुंच चुके हैं. सीआरडीए के एक वरिष्ठ इंजीनियर कहते हैं, “अभी हर नई मंजिल को बनाने में 15-20 दिन का समय लग रहा है. लक्ष्य इसे घटाकर 10 दिन करने का है.”

माविगुन की गूंज

अभी, सिर्फ 2028 की समयसीमा ही नहीं, बल्कि विपक्षी नेता जगन की ओर से प्रस्तावित नए राजधानी क्षेत्र माविगुन की भी खासी चर्चा हो रही है, जिसने नायडू को असहज कर दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री बंदरगाह शहर मछलीपत्तनम को विजयवाड़ा और गुंटूर से जोड़ने वाले एक कैपिटल कॉरिडोर की वकालत कर रहे हैं, जो 110 किलोमीटर के दायरे में है.

उनका कहना है कि इससे अमरावती पर होने वाला “फिजूलखर्च” काफी हद तक कम हो जाएगा. यह जगन के पुराने तीन-राजधानी वाले फॉर्मूले का एक छोटा रूप है, बस इसमें अमरावती शामिल नहीं है. और यह सब उस वक्त हो रहा है जब संसद ने इसी साल अप्रैल में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 में संशोधन पारित करके अमरावती को एकमात्र और स्थायी राजधानी का कानूनी दर्जा दे दिया है.

जगन माविगुन योजना पर अड़े हैं और इसे 2029 के चुनाव के लिए अपने मुख्य एजेंडे का हिस्सा बनाना चाहते हैं. वे जनता को यह दिखाना चाहते हैं कि नायडू सरकार एक नई ग्रीनफील्ड राजधानी बनाने में बहुत ज्यादा पैसा और समय बर्बाद कर रही है, “जिसे राज्य बर्दाश्त नहीं कर सकता.” वाइएसआरसीपी के अनुसार, केवल सचिवालय पर ही 20,497 रुपए प्रति वर्ग फुट का भारी-भरकम खर्च किया जा रहा है.

नायडू पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए जगन ‘माविगुन’ को ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बता रहे हैं, ‘‘क्योंकि इसमें बंदरगाह, राजमार्ग, रेल और हवाई संपर्क मार्ग समेत मजबूत बुनियादी ढांचा पहले से ही उपलब्ध है.” वाइएसआरसीपी नायडू पर अमरावती का क्षेत्रफल बढ़ाने का आरोप भी लगा रही है—लगभग 54,000 एकड़ जमीन (जिसमें किसानों की 35,000 एकड़ जमीन शामिल है) जुटाने के बाद नायडू 50,000 एकड़ जमीन और लेने जा रहे हैं, जिससे कुल क्षेत्रफल लगभग एक लाख एकड़ हो जाएगा.

वाइएसआरसीपी के एक वक्तव्य के अनुसार, “खुद सरकारी आंकड़ों में केवल बुनियादी ढांचे पर ही लगभग दो करोड़ रुपए प्रति एकड़ खर्च होने का अनुमान लगाया गया है. इस तरह विधानसभा, सचिवालय, हाइ कोर्ट और संस्थागत भवनों के निर्माण से पहले ही एक लाख एकड़ जमीन पर लगभग दो लाख करोड़ रुपए खर्च हो जाएंगे.”

जाहिरा तौर पर, लैंड पूलिंग का दूसरा चरण जारी है. हालांकि एपीसीआरडीए अधिकारियों का कहना है कि सात और गांवों में करीब 16,666 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की जा रही है.

आयुक्त राजू कहते हैं, “इसे एक अंतरराष्ट्रीय स्पोर्ट्स सिटी, एक नए रेलवे स्टेशन और इनर रिंग रोड के लिए चिह्नित किया गया है.” वाइएसआरसीपी के दो लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को खारिज करते हुए एपीसीआरडीए ने वर्तमान परियोजना क्षेत्र के लिए बुनियादी ढांचे (जल निकासी, सड़कें, बिजली, बाढ़ सुरक्षा और अन्य सुविधाओं) की लागत 48,717 करोड़ रुपए बताई है.

जगन की तरफ से लगाए जा रहे भ्रष्टाचार के आरोपों को नायडू वाइएसआरसीपी नेता की “हताशा और अमरावती के काम में प्रगति तथा विकास को स्वीकार न कर पाने की लाचारी” बताते हैं.

जगन के माविगुन के विचार को “बेतुका” बताने वाले नायडू ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि विपक्ष के नेता तो अमरावती शब्द का उच्चारण तक नहीं करना चाहते, जिसे टीडीपी प्रमुख “देवताओं की राजधानी” कहते हैं. आंध्र प्रदेश प्रगति रिपोर्ट 2024-26 में नायडू ने कहा कि अमरावती को स्व-वित्त पोषित मॉडल के रूप में तैयार किया गया था, जिसकी कुल लागत 51,687 करोड़ रुपए तय की गई थी.

एपीसीआरडीए अधिकारियों का कहना है वाइएसआरसीपी के शासनकाल में परियोजना अटकी रहने के कारण एक दशक में कुल लागत बढ़कर 90,093 करोड़ रुपए हो गई है.

अगले दो साल यह तय करेंगे कि जिस प्रोजेक्ट की नींव एक दशक पहले रखी गई थी और जिस अमरावती पर इतना पैसा खर्च हो चुका है, वह आखिरकार आंध्र प्रदेश की स्थायी राजधानी बन पाती है या नहीं.

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