मुलाकातें हों लेकिन...
सीमा विवाद का सही समाधान निकाले बिना ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी और शी की संभावित मुलाकात 2020 में लगे झटकों की भरपाई नहीं कर सकती

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गौतम बंबावाले
भारत-चीन रिश्तों में ताजा हलचल को लेकर उम्मीद जगना स्वाभाविक है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सितंबर मध्य में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आने की उम्मीद है. अक्तूबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मामल्लापुरम अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी.
वह मुलाकात अप्रैल 2018 के वुहान शिखर सम्मेलन के बाद हुई थी, जब दोनों देशों के रिश्तों में नई रणनीतिक स्थिरता आती दिख रही थी. लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर 2020 में पूर्वी लद्दाख में चीन की सैन्य कार्रवाइयों से रिश्ते बुरी तरह बिगड़ गए.
इतिहास देखते हुए हमें ज्यादा उम्मीदें नहीं पालनी चाहिए. मेरा अंदाजा है कि पूर्वी लद्दाख की घटनाओं ने भारत-चीन रिश्तों को 10 कदम पीछे धकेल दिया. 2024 से अब तक हम बमुश्किल दो या तीन कदम आगे बढ़े हैं.
रिश्ते अब भी 2019 वाली स्थिति से काफी पीछे हैं. भरोसा दोबारा कायम करने में दोनों पक्षों का वक्त, मेहनत और राजनैतिक पूंजी लगेगी. इसका मतलब यह नहीं कि भारत को चीन से बातचीत बंद कर देनी चाहिए. इसीलिए बीजिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी की हाल ही की बैठक स्वागतयोग्य है. दोनों सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि हैं. उनकी आठ सूत्री सहमति आगे का रास्ता दिखाती है.
इसमें दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति की अहमियत दोहराई और निष्पक्ष तथा दोनों को मंजूर सीमा समाधान के लिए बातचीत पर सहमति जताई. वे सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन पर काम आगे बढ़ाने पर राजी हुए. इसमें जल्द ठोस नतीजे हासिल करने के साथ सीमा व्यापार और तीर्थयात्रा में सहयोग बढ़ाना भी शामिल है.
ये उपयोगी कदम हैं. लेकिन भारत को खासकर सरहद पर ‘जल्द नतीजे’ हासिल करने के विचार को लेकर सावधान रहने की जरूरत है. भारत ऐतिहासिक रूप से सभी क्षेत्रों को शामिल करने वाले व्यापक पैकेज समाधान के पक्ष में रहा है. इससे बातचीत में हमारे पास बढ़त रहती है. एक क्षेत्र में दी गई रियायत की भरपाई दूसरे क्षेत्र में रियायत से हो सकती है. किसी आसान क्षेत्र का अलग से समाधान इस बढ़त को कमजोर कर सकता है.
इस बीच कुछ काम किए जा सकते हैं और किए जाने चाहिए. दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क फिर कायम किया जा सकता है, ज्यादा वीजा दिए जा सकते हैं और सीधी उड़ानें बढ़ाई जा सकती हैं.
2020 से पहले मौजूद कई अंतर-सरकारी व्यवस्थाएं अब तक बहाल नहीं हुई हैं. आर्थिक रिश्तों पर व्यावहारिक नजरिया अपनाना चाहिए. अगर सोच-समझकर किया गया चीनी निवेश भारत के राष्ट्रीय हित में है तो सिर्फ उसके चीनी होने की वजह से ठुकराना ठीक नहीं.
इसके लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर पाबंदियां लगाने वाले भारत के 2020 के ‘प्रेस नोट 3’ में चुनिंदा ढील भी दी जा सकती है. लेकिन अर्थनीति को रणनीतिक नीति से अलग रखकर नहीं बनाया जा सकता. चीन खुद भी ऐसा नहीं करता. बीजिंग भारतीय बाजार में पहुंच चाहता है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और रेयर अर्थ मैग्नेट की अहम तकनीक भारत को देने में लगातार हिचकिचाता रहा है.
वहीं, दवा और सॉफ्टवेयर जैसे भारत के मजबूत क्षेत्र गैर-शुल्क बाधाओं की वजह से चीनी बाजार में खास जगह नहीं बना पाए हैं. इसलिए रिश्तों की बुनियादी रुकावटें अब भी कायम हैं. रुकावटों में पहली है अनसुलझा सीमा विवाद और दूसरी चीन-पाकिस्तान की सांठगांठ. सीमा विवाद को लेकर बीजिंग और नई दिल्ली की सोच में बुनियादी फर्क है.
चीन इसे दूसरे मुद्दों से अलग रखना चाहता है. उसके मुताबिक, सीमा पर मतभेदों के कारण बाकी रिश्तों को सामान्य रूप से आगे बढ़ने से नहीं रोकना चाहिए. भारत को अपने रुख पर कायम रहना होगा कि सरहद पर शांति सामान्य रिश्तों की पहली शर्त है.
हमें चीन की रणनीतिक सोच समझनी होगी. उसका लक्ष्य अपनी कथित ‘समग्र राष्ट्रीय शक्ति’ बढ़ाना और वैश्विक वर्चस्व के लिए अमेरिका को चुनौती देना है. बीजिंग अक्सर भारत को वाशिंगटन के साथ अपनी होड़ के नजरिए से देखता है और भारत-अमेरिका की बढ़ती नजदीकी को भारत का अमेरिका के ‘पक्ष में खड़ा होना’ बताता है.
भारत को न तो यह धारणा स्वीकार करनी चाहिए, न चीन को यह तय करने देना चाहिए कि हम दूसरी शक्तियों के साथ किस तरह रिश्ते रखें.
ब्रिक्स के लिए शी जिनपिंग की संभावित यात्रा सात साल पहले उनके दौरे के बाद से बुरी तरह बिगड़े रिश्तों को फिर बनाने का एक और मौका दे सकती है. लेकिन न कोई शिखर सम्मेलन और न समझौतों की कोई शृंखला 2020 की घटनाओं को मिटा सकती है.
सोच-समझकर रिश्तों में सुधार लाने का लक्ष्य होना चाहिए लेकिन बुनियादी सिद्धांत साफ रहना चाहिए. सीमा पर होने वाली घटनाओं को बाकी रिश्तों से अलग नहीं किया जा सकता. यानी अभी लंबा सफर बाकी है.
(लेखक चीन और पाकिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके हैं)