नित नए मोर्चों पर नारी-शक्ति
इंडिया टुडे विमेन समिट में राजनीति, बिजनेस, आर्ट और दूसरी कई विधाओं की शख्सियतें जुटीं और नारीवादी नारों से हटकर कई अहम पहलुओं पर की गहन चर्चा

केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल और इंडिया टुडे टीवी की मैनेजिंग एडिटर मारिया शकील (बाएं)
सहमति लेने-न लेने के मुद्दे पर तीखी बहस और राजनीति में जेन ज़ी की भूमिका; मनोरंजन उद्योग में लैंगिक असमानता पर चौंकाने वाली जानकारी; जंग में अपना जीवनसाथी गंवाने वाली विधवाएं और खेल जगत की हस्तियों की विपरीत परिस्थितियों से उबरने की प्रेरक कहानियां; उद्योग विशेषज्ञों की वित्तीय और चिकित्सा संबंधी उपयोगी सलाह; शानदार प्रस्तुतियां और हंसाने-गुदगुदाने वाले पल.
सबसे बढ़कर जिज्ञासु और मुख्यत: महिला दर्शकों की मौजूदगी. इन सब बातों ने पिछले सप्ताह दिल्ली में आयोजित इंडिया टुडे विमेन समिट को बेहद खास बना दिया.
कार्यक्रम में कुछ कड़वे सच भी सामने आए. केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण तथा रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने कहा कि संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण लागू कर देना ही उनका राजनैतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने का एकमात्र समाधान नहीं. वास्तविक बदलाव के लिए महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारे जाने के प्रति हिचक को दूर करना होगा.
उन्होंने कहा कि एक महिला नेता होने का मतलब है कि आपको लगातार खुद को साबित करना पड़ता है. साथ ही जोड़ा, “लोग आपकी क्षमताओं पर बहुत मुश्किल से भरोसा करते हैं...उनका विश्वास जीतने के लिए आपको अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं.”
भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं. भारत की पहली वीर नारी लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदर जीत (रोमी) रंधावा ने बताया कि कैसे महिलाएं अब सशस्त्र बलों की उन भूमिकाओं में आ रही हैं जिनसे पहले उन्हें बाहर रखा गया था.
इंस्पायर इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स की प्रेसिडेंट मनीषा मल्होत्रा ने इस बात को रेखांकित किया कि कैसे “संघर्ष के जज्बे और कुछ कर दिखाने की भूख” ने हमारी महिला खिलाड़ियों को विश्व मानकों के करीब पहुंचाया है. कुचिपुड़ी नृत्यांगना यामिनी रेड्डी ने बताया कि कैसे महिलाएं उस क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिकाओं में आ रही हैं जिसे कभी पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था.
नेटफ्लिक्स इंडिया की ओरिजिनल फिल्म्स निदेशक रुचिका कपूर शेख जैसी अन्य हस्तियों का मानना है कि महिलाओं को एक-दूसरे की सबसे बड़ी प्रशंसक बनना होगा.
उन्होंने बताया कि नेटफ्लिक्स पर हर पांच में से एक मूल फिल्म का निर्देशन एक महिला ने किया था, और कैसे मौजूदा रुढ़ियों को चुनौती देने के वास्ते अभिनेत्रियों के लिए ठोस भूमिकाएं लिखी गईं.
सहमति पर इंडिया टुडे के हाल ही के एक सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर अलग-अलग विचार सामने आए. मसलन, बचपन में हुई लड़कियों की कंडिशनिंग से लेकर प्रतिशोध के डर से कार्यस्थल पर महिलाओं का शिकायत दर्ज न कराना.
लेकिन समय के साथ वे बदल रही हैं. सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी कहती हैं, हालांकि यह सच है कि लड़कियों को अक्सर समझौता करने और लड़कों को अधिकार की भावना के साथ पाला-पोसा जाता है, फिर भी उन्होंने विशेष रूप से युवा पीढ़ी के दृष्टिकोण में बदलाव देखा है जो पूछती है—“मैं ही क्यों? भाई क्यों नहीं?” इस छोटे-से सवाल में उम्मीद की किरण छिपी है.