घट रहा भरोसा
सत्ता के इस्तेमाल और संस्थाओं के कामकाज को लेकर भारतीयों के मन में संदेह बढ़ रहा है, मगर इसका मतलब यह नहीं कि वे मोदी सरकार के व्यापक राजनैतिक एजेंडे के खिलाफ हो गए हैं

पड़ताल अधिकारियों ने घर-घर जाकर मतदाता सूची का सत्यापन किया, नई दिल्ली, 30 जून
संस्थाओं के कामकाज को लेकर भारतीय अधीर होते दिख रहे हैं. व्यवस्था की निष्पक्षता पर उनका संदेह बढ़ा है. फिर भी, नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्र सरकार के सियासी एजेंडे के कई प्रमुख विचारों को उनका समर्थन जारी है. इनमें समान नागरिक संहिता, ‘एक देश, एक चुनाव’ और अवैध घुसपैठ के खिलाफ मुहिम शामिल हैं.
अगस्त 2026 में हुए इंडिया टुडे के देश का मिज़ाज सर्वे का एक प्रमुख संदेश यही है. मजबूत सियासी सहमति के बीच भरोसे का संकट भी उभर रहा है.
यह असहज मेल सड़कों पर भी दिखने लगा है. राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) का पेपर लीक होने के खिलाफ जंतर मंतर से शुरू हुआ जेन ज़ी का आंदोलन इतना तेज हुआ कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.
फिर यह गुस्सा दूसरे राज्यों तक फैल गया. झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की कथित गड़बड़ियों के खिलाफ युवाओं ने प्रदर्शन किया. बिहार में भी प्रशासन से ऐसा ही टकराव हुआ. कुछ हफ्तों के भीतर जंतर मंतर पर फिर प्रदर्शनकारी जुटे.
इस बार मांग जाति आधारित आरक्षण में बदलाव की थी. इन प्रदर्शनों के मुद्दे और राजनीति अलग हैं, मगर इन्हें युवा भारतीयों के बीच बढ़ता यह शक जोड़ता है कि शिक्षा, रोजगार और आगे बढ़ने के रास्ते न तो तय हैं, न निष्पक्ष.
यह बेचैनी लोकतंत्र की हालत पर मिले जवाबों में साफ दिखती है. जनवरी 2026 में 46 फीसद लोगों ने कहा था कि लोकतंत्र खतरे में नहीं है, जबकि 44.7 फीसद ने इसे खतरे में माना था. वह स्थिति पलट गई. अब 46.7 फीसद लोकतंत्र को खतरे में मानते हैं, जबकि 41.6 फीसद ऐसा नहीं मानते.
इससे ज्यादा चिंता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर भरोसे में लगातार आती कमी की है. अगस्त 2025 में 64.4 फीसद लोगों ने चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष माना था. जनवरी में यह आंकड़ा घटकर 56.5 फीसद और अब 51.9 फीसद रह गया है.
इसी दौरान चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष न मानने वालों की हिस्सेदारी 31.7 फीसद से बढ़कर 40.9 फीसद हो गई. संस्थाओं के लिए शायद यही सबसे अहम चेतावनी है.
फिर भी, मतदाता चुनाव आयोग के खिलाफ हर दलील को स्वीकार नहीं कर रहे. बीते एक साल में चुनाव आयोग पर भरोसे के सवाल पर 43.3 फीसद लोगों ने कहा कि यह बढ़ा है, मगर 38 फीसद ने कहा कि घटा है.
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) पर 60.2 फीसद ने कहा कि फर्जी या दो जगह दर्ज मतदाताओं को हटाने के लिए यह कवायद जरूरी थी. संदेश साफ है. मतदाता चुनावों की निष्पक्षता को लेकर चिंतित हो सकते हैं, मगर विपक्ष के सारे दावे को स्वीकार नहीं करते.
जांच एजेंसियों के गलत इस्तेमाल पर भी एक अहम उलटफेर हुआ है. जनवरी में 47.7 फीसद लोगों ने कहा था कि सभी दलों की सरकारें प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और आयकर विभाग जैसी एजेंसियों का गलत इस्तेमाल करती हैं.
वहीं, 41.1 फीसद ने खास तौर पर भाजपा सरकार पर इसका आरोप लगाया था. अब क्रम पलट गया है. खासकर भाजपा सरकार को जिम्मेदार मानने वालों का आंकड़ा बढ़कर 43.8 फीसद हो गया, तो सभी दलों की सरकारों को जिम्मेदार मानने वालों का आंकड़ा घटकर 38.1 फीसद रह गया.
साथ ही, 54.1 फीसद लोगों का अब भी कहना है कि वे राजनीति एवं धर्म पर खुलकर अपनी बात रख सकते हैं. जनवरी में यह आंकड़ा 57.3 फीसद था. इसलिए यह तस्वीर ऐसे डरे हुए समाज की नहीं, जिसे लगता है कि वह बोल नहीं सकता, बल्कि ऐसे समाज की है जो सत्ता के इस्तेमाल के तरीके को लेकर बेचैन हो रहा है.
आस्था का सवाल
राम मंदिर चढ़ावा मामला दिखाता है कि शासन की नाकामी भाजपा के लिए भारी प्रतीकात्मक महत्व रखने वाले मुद्दे को भी कितनी जल्दी नुक्सान पहुंचा सकती है. अयोध्या में चढ़ावे की कथित चोरी पर 46.6 फीसद लोगों ने कहा कि इससे मोदी और योगी आदित्यनाथ, दोनों सरकारों को लेकर उनकी राय खराब हुई है.
वहीं, 8.1 फीसद ने सिर्फ केंद्र और 6.6 फीसद ने सिर्फ यूपी सरकार को जिम्मेदार माना. कुल, 61.3 फीसद की राय में इसने दोनों में से कम से कम एक सरकार की छवि को नुक्सान पहुंचाया है.
जातिगत आरक्षण पर जवाब भी अहम हैं, खासकर हालिया प्रदर्शनों के बाद. सबसे बड़ा समूह, 36.3 फीसद, अब भी बीच का रुख रखता है. उसका मानना है कि आरक्षण के कुछ लाभ हैं, पर इसमें सुधार जरूरी है. मगर, जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह खत्म करने के पक्ष में लोगों की हिस्सेदारी जनवरी के 28 फीसद से बढ़कर 32.2 फीसद हो गई है.
युवाओं के प्रदर्शनों को सीमित अवसरों को लेकर उनमें गहरी चिंता के रूप में भी देखा जा सकता है. यह बेचैनी सरकार के कामकाज पर लोगों की राय में भी दिखती है. जनवरी में 24 फीसद लोगों ने भारत की सड़कों और बुनियादी ढांचे को ‘शानदार’ बताया था.
अब यह छह फीसद अंक घटकर 18 फीसद रह गया है, जबकि बुनियादी ढांचा मोदी सरकार के अच्छे कामकाज के सबसे मजबूत दावों में रहा है. इथेनॉल का सवाल ऊपर से बनाई जाने वाली नीतियों की सीमाएं भी दिखाता है. सिर्फ 18 फीसद लोग ज्यादा इथेनॉल मिलाने की मौजूदा नीति को बिना बदलाव जारी रखना चाहते हैं.
वहीं, 35 फीसद ऐसी गाड़ियों के लिए सुरक्षा उपाय और साफ दिशा-निर्देश चाहते हैं, जिनमें यह ईंधन नुक्सान कर सकता है. अन्य 25 फीसद ऐसी गाड़ियों को पूरी छूट देने के पक्ष में हैं. यानी 60 फीसद लोग नीति में किसी न किसी बदलाव की मांग करते हैं.
धीमे बदलाव
कुछ और अहम रुझान भी हैं. सांप्रदायिक सौहार्द पर अब सिर्फ 34 फीसद लोगों का कहना हैं कि भाजपा की अगुआई वाले एनडीए सरकार में हालात सुधरे हैं. जनवरी में यह आंकड़ा 39.6 फीसद था. मौजूदा आंकड़ा 2021 के बाद के सबसे निचले स्तर के बराबर है.
हालात बिगड़ने की बात कहने वालों की हिस्सेदारी भी 32.2 फीसद से घटकर 29.5 फीसद हो गई है. तो लोगों की राय किधर गई? ‘हालात में कोई बदलाव नहीं’ कहने वालों की हिस्सेदारी बढ़कर 22.7 फीसद हो गई, तो अनिश्चित लोगों का आंकड़ा करीब दोगुना होकर 13.8 फीसद हो गया.
यह रुझान सीधे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाए हालात सुधरने के भरोसे में कमी दिखाता है. हालात बिगड़ने की बात कहने वालों में सबसे ज्यादा ने भाजपा-आरएसएस को जिम्मेदार बताया.
महिला सुरक्षा पर ऐसा ही बदलाव दिखता है. भारत को महिलाओं के लिए ज्यादा सुरक्षित मानने वालों की हिस्सेदारी जनवरी के 44.1 फीसद से घटकर 38.3 फीसद रह गई.‘
कम सुरक्षित’ मानने वालों का आंकड़ा भी 38.4 फीसद से घटकर 33.8 फीसद हो गया. ‘हालात में कोई बदलाव नहीं’ कहने वालों की हिस्सेदारी 13.8 फीसद से बढ़कर 21 फीसद हो गई जो 2021 के बाद सबसे ज्यादा है.
फिर भी, सर्वे साफ करता है कि यह असंतोष मोदी-विरोधी रुझान नहीं है. समान नागरिक संहिता को 75 फीसद समर्थन मिला है, जो 2021 के बाद के उच्चतम स्तर के करीब है. ‘एक देश, एक चुनाव’ को अब भी 70 फीसद समर्थन हासिल है.
तीन-चौथाई से ज्यादा लोग अवैध घुसपैठ को गंभीर खतरा मानते हैं. ये मुद्दे राष्ट्रीय पहचान, सुरक्षा और संस्थागत सुधार की भाजपा की राजनीति के केंद्र में हैं.
लोग ऐसे सुधारों के भी पक्ष में दिखते हैं, जिनसे लोकतांत्रिक व्यवस्था ज्यादा निष्पक्ष और जवाबदेह बन सके. करीब दो-तिहाई लोग ज्यादा मजबूत दलबदल विरोधी कानून चाहते हैं.
परिसीमन के सवाल पर ज्यादा लोग मौजूदा आबादी के आधार पर सीटें बांटने के बजाए जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक काबू करने वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने से बचाने के पक्ष में हैं. महिला आरक्षण कानून पर 47.2 फीसद लोग चाहते हैं कि परिसीमन का इंतजार किए बिना इसे लागू किया जाए.
जलवायु परिवर्तन भी लोगों के लिए निजी चिंरता बन गया है. 52.7 फीसद लोगों का कहना है कि इससे उनके जीवन या आजीविका पर खासा असर पड़ा है. वहीं, 59 फीसद लोग मानते हैं कि भारत पर्यावरण की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा रहा है.
सर्वे कई मोर्चों पर बढ़ता असंतोष दिखाता है, मगर जरूरी नहीं कि यह सियासी बदलाव की मांग में भी तब्दील हो. बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय अब भी व्यवस्था और उसे चलाने की मोदी सरकार की क्षमता पर भरोसा कर सकते हैं?