युवाओं का आक्रोश और बेचैनी
देश का मिज़ाज सर्वे बताता है कि युवा अपने भविष्य को लेकर बेहद बेचैन हैं. उन्हें डर है कि कहीं वे पीछे न छूट जाएं. साथ ही, उन्हें लगता है कि सरकार उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर रही. नीति निर्माताओं के लिए बेहतर यही होगा कि युवाओं की चिंताओं पर गहराई से ध्यान दें

युवा कांग्रेस कार्यकर्ता दिल्ली में नीट पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान
भारत में जेन ज़ी अब कोई ऐसा आबादी वर्ग नहीं रहा जिसकी राजनैतिक दल अनदेखी कर सकें. 1997 से 2012 के बीच जन्मे ये युवा अब देश के कुल मतदाताओं का करीब 30 फीसद हिस्सा हैं. यानी राजनैतिक एजेंडे और चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की पूरी ताकत रखते हैं.
इंडिया टुडे-सीवोटर का एक्सक्लूसिव देश का मिज़ाज सर्वे दिखाता है कि यह पीढ़ी महत्वाकांक्षी है, लेकिन भविष्य को लेकर काफी सशंकित भी है. युवा मौजूदा हालात से परेशान हैं और चिंता यह है कि क्या सिस्टम उन्हें वे मौके दे पाएगा जिनका वादा किया गया था.
रोजगार उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है—53 फीसद युवाओं का कहना है कि नौकरी सबसे अहम मसला है जबकि शिक्षा और परीक्षाओं में पारदर्शिता को 22 फीसद और महंगाई को 12 फीसद युवाओं ने सबसे बड़ा मुद्दा माना.
हर भारतीय को इस सर्वे के नतीजों पर गंभीरता से मंथन करना चाहिए, खासकर इस बात पर कि युवाओं के मन में यह बात बैठ गई है कि सिर्फ मेहनत के बलबूते आगे नहीं बढ़ पाएंगे.
केवल 32 फीसद युवाओं को लगता है कि योग्यता और कड़ी मेहनत सबसे ज्यादा मायने रखती है जबकि 26 फीसद का मानना है कि पैसा, पहचान और पहुंच से ही काम बनता है. 22 फीसद लोगों का मानना है कि योग्यता चाहे कितनी भी हो, मौके ही बहुत कम हैं.
दरअसल, 32 फीसद युवा नौकरियों के अभाव को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं, 18 फीसद कम वेतन की शिकायत करते हैं और 17 फीसद का कहना है कि उनकी योग्यता के हिसाब से उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं.
करीब आधे या 48 फीसद युवाओं की नजर में मोदी सरकार की योजनाओं से नई नौकरियां पैदा करने में कोई खास मदद नहीं मिली.
उनकी पसंद और सोच भी एक अलग तस्वीर बयान करती है. करिअर चुनते समय 29 फीसद युवाओं के लिए पहली शर्त अच्छी तनख्वाह है, इसके बाद 19 फीसद के लिए सुरक्षित जॉब और 18 फीसद के लिए काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन मायने रखता है.
लेकिन सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात है सरकारी नौकरी का आकर्षण—49 फीसद युवा अब भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं. सिर्फ 16 फीसद अपना बिजनेस शुरू करना चाहते हैं और केवल 10-10 फीसद युवा ही किसी बड़ी प्राइवेट कंपनी या स्टार्ट-अप या छोटे उद्योग में काम करना चाहते हैं.
यह अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है, क्योंकि यह भारत की सबसे ज्यादा डिजिटली सक्षम और बिजनेस सोच वाली पीढ़ी है जो स्टार्ट-अप इंडिया और डिजिटल इंडिया के दौर में बड़ी हुई है.
फिर भी, इनमें से आधे युवा सरकारी नौकरी की सुरक्षा चाहते हैं. इसके अलावा, 63 फीसद युवा नौकरियां देना पूरी तरह केंद्र और राज्य सरकारों की ही जिम्मेदारी मानते हैं.
बेशक, शिक्षा का स्तर सुधारना और अवसरों को बढ़ाना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन युवाओं को भी यह समझना होगा कि सिर्फ सरकार पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है. खुद का भविष्य संवारने के लिए उन्हें प्राइवेट सेक्टर, बिजनेस, नए हुनर और उभरते क्षेत्रों को भी अपनाना होगा.
नीति निर्माताओं को इसका भी संज्ञान लेना चाहिए कि युवाओं में असुरक्षा की भावना इस हद तक बढ़ गई है कि भारत में अपना भविष्य ही नहीं देख पा रहे. लगभग 37 फीसद युवाओं का मानना है कि देश सही दिशा में जा रहा है, जबकि 46 फीसद इससे असहमत हैं.
38 फीसद युवा ऐसे हैं जो अच्छा मौका मिलने पर विदेश जाकर काम करना पसंद करेंगे, और 34 फीसद ऐसे हैं जो कुछ समय विदेश में काम करके लौट आना चाहते हैं.
36 फीसद युवाओं के लिए विदेश जाने की सबसे बड़ी वजह बेहतर वेतन और आगे बढ़ने के मौके हैं. 16 फीसद अच्छी पढ़ाई और 13 फीसद योग्यता के आधार पर बेहतर मौकों के लिए बाहर जाना चाहते हैं.
शिक्षा और परीक्षाओं की बात करें तो चिंता गुस्से में बदल जाती है. एक बड़े वर्ग, करीब 67% युवाओं को देश की प्रवेश परीक्षाओं व सरकारी भर्तियों की पारदर्शिता पर बहुत कम या शून्य भरोसा रह गया है.
उनमें 40 फीसद तो कहते हैं कि उन्हें सिस्टम पर बिल्कुल भरोसा नहीं रहा. नीट पेपर लीक मामले ने इस अविश्वास को और गहरा कर दिया है. 53 फीसद युवाओं का मानना है कि इस विवाद पर केंद्र सरकार का रवैया ‘खराब’ या ‘बहुत खराब’ रहा, जबकि 65 फीसद की राय थी कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा जरूरी था और यह पहले ही होना चाहिए था.
यह आक्रोश अब राजनीति में भी झलक रहा है, जहां युवा भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टियों से इतर नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं.
असल में, केवल 15 फीसद युवाओं को लगता है कि मौजूदा राजनैतिक दल देश के युवाओं की बात रखते हैं, जबकि 56 फीसद का मानना है कि ये पार्टियां युवाओं के लिए बहुत कम या कुछ भी नहीं करतीं. यही वजह है, हाल ही में सामने आई कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर उनका रुख सकारात्मक तो है लेकिन आंख मूंदकर इसका समर्थन नहीं कर रहे.
42 फीसद युवा मानते हैं कि सीजेपी को एक दबाव समूह के रूप में काम करना चाहिए जबकि सिर्फ 30 फीसद चाहते हैं कि यह एक राजनैतिक दल बनकर चुनाव लड़े. अगर सीजेपी चुनाव लड़ती भी है तो केवल 40 फीसद युवाओं ने उसे वोट देने की बात कही जबकि इतने ही लोगों ने इससे साफ इंकार कर दिया. सीधे शब्दों में कहें तो यह पीढ़ी किसी भी नई पार्टी पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं है.
युवा चाहते हैं कि पार्टी पहले अपनी नीतियां, ईमानदार नेतृत्व और समस्याएं सुलझाने की अपनी क्षमता साबित करे. और, सही मायने में देखा जाए तो युवाओं का यह नजरिया बेहद समझदारी भरा है.