प्रधान संपादक की कलम से

यह सर्वे जनाक्रोश से भरी उस असामान्य गर्मी के ठीक एक महीने बाद आया है, जब जेन ज़ी युवा इतनी बड़ी संख्या में जंतर मंतर पहुंचे कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा

from the  editor-in-chief
9 सितंबर, 2026 का इंडिया टुडे हिंदी का कवर

हर सरकार के कार्यकाल में एक ऐसी घड़ी आती है, जब लंबे समय से सत्ता में रहने का बोझ साफ नजर आने लगता है. मोदी सरकार के लिए वह वक्त अब आ गया लगता है. इंडिया टुडे के छमाही देश का मिज़ाज सर्वे का अगस्त 2026 संस्करण लोगों की राय को एक असल बदलाव के मोड़ पर दर्ज करता है.

यह सर्वे जनाक्रोश से भरी उस असामान्य गर्मी के ठीक एक महीने बाद आया है, जब जेन ज़ी युवा इतनी बड़ी संख्या में जंतर मंतर पहुंचे कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. इस आंदोलन ने सरकार को जनता तक पहुंचने और उससे संवाद करने की अपनी पूरी रणनीति पर तेजी से दोबारा विचार करने के लिए भी मजबूर कर दिया.

यह सर्वे लंबे समय से जारी होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के बीच हुआ है. इस संकट ने आर्थिक बेचैनी का ऐसा माहौल बनाया, जिसने विरोध-प्रदर्शनों को कहीं ज्यादा ताकतवर बना दिया. यह सर्वे उस घटना के बाद भी आया है, जिसे भाजपा के लिए पूरी तरह जीत और जश्न का मौका होना चाहिए थाः मई में पश्चिम बंगाल में उसकी भारी चुनावी जीत.

इस जीत के बाद पार्टी का भारत के 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 22 पर कब्जा हो गया. हमारे सर्वे के आंकड़े खासकर इसलिए अहम हैं क्योंकि वे किसी एक सीधी, आसान या एकतरफा कहानी को सामने नहीं रखते.

अगर आज लोकसभा चुनाव होते हैं तो मोदी सरकार छह महीने पहले हासिल अपनी बड़ी बढ़त का कुछ हिस्सा गंवाती दिखती है और एनडीए की सीटें 352 से घटकर 326 रह जाती हैं.

इसके मुख्य घटक के रूप में भाजपा ने जनवरी के देश का मिज़ाज सर्वे में मिला 287 सीटों का स्पष्ट एकदलीय बहुमत खो दिया है और अब 261 सीटों पर आ गई है. यह उसे उस अनिश्चितता वाले 2024 के लोकसभा चुनाव के समय की स्थिति तक ले जाता है जब पार्टी सिर्फ 240 सीटें जीत सकी थी.

छह महीनों में 26 सीटों की गिरावट विनाशकारी नहीं है, मगर यह एक संकेत जरूर है. वैसे, इससे विपक्ष को बहुत कम राहत मिलती है. देशभर में बिखरा और सियासी लड़ाइयों से चोट खाया इंडिया ब्लॉक 185 सीटों पर सिमटता दिखता है, जो 2024 में जीती उसकी 232 सीटों से 47 कम हैं.

मगर एक पार्टी के रूप में कांग्रेस एनडीए और भाजपा के हाथ से निकली सभी 26 सीटें अपने खाते में डालती नजर आती है और उसका आंकड़ा बढ़कर 106 हो जाता है.

11 फरवरी, 2026

निजी लोकप्रियता के मामले में मोदी अब भी ‘अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त’ नेता के रूप में बड़े अंतर से सबसे आगे हैं, हालांकि उनकी रेटिंग जनवरी के 54.7 फीसद से गिरकर 48.7 फीसद पर आ गई है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की रेटिंग सिर्फ 0.5 फीसद अंक बढ़ी और वह 27.1 फीसद तक पहुंची है. पहली बार इस सूची में आए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने 9.2 फीसद समर्थन के साथ अस्थिर वोटों का अच्छा हिस्सा अपने पक्ष में कर लिया है.

कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके ने भी चौंकाने वाली एंट्री की है और वे अपने पुराने सियासी आदर्श अरविंद केजरीवाल से आगे निकल गए हैं. वैसे, अभी कोई साफ विकल्प उभरता नहीं दिखता, मगर संकेत जरूर हैं कि लोग किसी नए विकल्प की शिद्दत से तलाश कर रहे हैं.

इन आंकड़ों का मतलब बिल्कुल साफ है. हम इसे एनडीए सरकार के लिए ‘चेतावनी के संकेत’ कह रहे हैं. इसलिए कि पिछले 12 वर्षों से भारत की राजनीति पर उसका जो स्पष्ट दबदबा रहा है, उसमें अब टूट-फूट के संकेत दिखने लगे हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना समझदारी नहीं होगी.

हमारे सर्वे में मोदी की निजी लोकप्रियता और सरकार के कामकाज की रेटिंग के बीच हमेशा एक अंतर रहा है, खासकर अर्थव्यवस्था के मामले में. यह फासला और ज्यादा बढ़ गया है. हमारे सवालों के जवाब बताते हैं कि लोग अब जवाबदेही और बेहतर प्रदर्शन की मांग को लेकर कहीं ज्यादा मुखर हैं.

सर्वे में शामिल लगभग आधे लोगों यानी 47 फीसद ने एनडीए सरकार के आर्थिक कामकाज को ‘औसत’, ‘खराब’ या ‘बहुत खराब’ बताया है. इसे ‘शानदार’ या ‘अच्छा’ मानने वालों की संख्या 47.2 फीसद है, जो 2023 के देश का मिज़ाज सर्वे के बाद सबसे कम है. कुल मिलाकर जनता का मिज़ाज निराशा की ओर झुका दिखाई देता है.

करीब 54.5 फीसद लोगों का अनुमान है कि अगले छह महीनों में आर्थिक हालात  ‘बिगड़ेंगे’ या ‘जस के तस बने रहेंगे’. पिछले सर्वे की तरह इस बार भी गैर-बराबरी एक बड़ी ‌च‌िंता है. 43.7 फीसद लोगों को लगता है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में अमीरों को ज्यादा फायदा मिला है. वहीं, 55.7 फीसद मानते हैं कि आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा बड़े कारोबारियों को मिला है. लगभग दो-तिहाई लोगों ने बेरोजगारी की स्थिति को ‘गंभीर’ या ‘बहुत गंभीर’ माना है. इस आखिरी आंकड़े पर सरकार को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए.

वर्षों से देश का ‌मिज़ाज के हर सर्वे में बेरोजगारी लोगों की चिंताओं की सूची में सबसे ऊपर रही है. वह स्थिति नहीं बदली है.

इस संस्करण में एक नई चीज शामिल हैः जेन ज़ी पर केंद्रित एक अलग सेक्शन. अर्थव्यवस्था से जुड़े बुनियादी मुद्दों, खासकर रोजगार और अवसरों के मामले में जेन ज़ी के जवाब देने वालों और आम जनता की राय में लगभग पूरी समानता दिखाई देती है. युवा भारत बाकी भारत से कुछ अलग नहीं मांग रहा है. वह उन्हीं चीजों की मांग कर रहा है लेकिन ज्यादा जल्दबाजी, ज्यादा खुलकर और काफी कम धैर्य के साथ.

अपनी कवर स्टोरी में हमने इस सर्वे के हर पहलू की पड़ताल की हैः सीटों के अनुमान से लेकर अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों की चिंताओं तक. इससे ऐसी सरकार की तस्वीर सामने आती है, जिसके पास 2024 के बाद से अब भी काफी राजनैतिक पूंजी बची हुई है, लेकिन यह पूंजी लगातार घट रही है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की मजबूती, वापसी करने की क्षमता और राजनैतिक समझ को कम आंकना भारी भूल होगी.

हाल में उन्होंने छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों पर तेजी के साथ प्रतिक्रिया दी. उम्मीद है कि हमारे सर्वे में लोगों ने जिन चिंताओं को सामने रखा है उन पर भी वे उतनी ही ऊर्जा, गंभीरता और तेजी के साथ काम करेंगे.

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