कच्चे तेल पर फिर बढ़ीं मुश्किलें
रूसी आयात पर प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिकी सेनेट में पेश बिल में 100 फीसद तक टैरिफ लगाने की धमकी शामिल. इस कारण भारत की कच्चे तेल की रणनीति और व्यापार संबंधी बातचीत पर फिर से काले बादल मंडराए

रूस अब भी भारत को सबसे ज्यादा कच्चा तेल सप्लाइ करता है
रूस से कच्चा तेल खरीदने पर अमेरिका ने एक बार फिर से भारत पर प्रतिबंधों की तलवार लटका दी है. इस कारण भारत की ऊर्जा रणनीति और वॉशिंगटन के साथ बढ़ते व्यापार रिश्तों में नई अनिश्चितताएं पैदा हो गई हैं.
अब 31 अगस्त को अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्ज की फिर बैठक होगी तो संभावना यही है कि इसमें दो देशों से जुड़े लिंजी ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया ऐंड ईरान ऐक्ट ऑफ 2026 पर चर्चा होगी.
इस बिल का मकसद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार देना है कि वे रूसी तेल और गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों—भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया—पर 100 फीसद तक टैरिफ लगा सकें.
इस विधेयक को अगस्त के पहले हफ्ते में सेनेट यानी ऊपरी सदन ने पहले ही मंजूरी दे दी है. अगर यह कानून बन भी जाता है तो टैरिफ लगाने का फैसला ट्रंप के विवेक पर निर्भर करेगा.
बिल जिस समय आ रहा है वह नई दिल्ली के लिए परेशानी वाला है. भारत और अमेरिका अभी भी एक व्यापक व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं, और प्रतिबंधों की नई धमकी से यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि क्या रूस का कच्चा तेल उनके उलझे रिश्तों में सौदेबाजी का सूत्र बन सकता है.
क्यों अहम है रूसी कच्चा तेल?
भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरतों का लगभग 90 फीसद आयात करता है और रूस उसका बड़ा सप्लायर बना हुआ है. जून 2026 में भारत के कुल क्रूड आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा 46 फीसद था और शिपमेंट 87.5 लाख टन. पश्चिम एशिया ने 42 लाख टन की आपूर्ति की और वह दूसरे स्थान पर रहा.
फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के चौतरफा हमले के बाद से रूसी कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता तेजी से बढ़ी है. पश्चिमी प्रतिबंधों और यूरोपीय खरीदारों के पीछे हटने के कारण मॉस्को को एशियाई रिफाइनरी कंपनियों को रियायती दर पर तेल की पेशकश करनी पड़ी.
वित्त वर्ष 2025 में भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर भी रूस रहा, जिसने 56.9 अरब डॉलर (5.4 लाख करोड़ रुपए) का निर्यात किया लेकिन 2025 में जब ट्रंप प्रशासन ने रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़े कुछ भारतीय निर्यात पर 25 फीसद का अतिरिक्त जुर्माना लगाने का फैसला किया तो रूस से आयात घट गया और वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में यह साल भर पहले की तुलना में 14 फीसद गिरकर 23.1 अरब डॉलर (2.2 लाख करोड़ रुपए) रह गया.
लेकिन इस साल के शुरू में पश्चिम एशिया में युद्ध छिड़ने के बाद रूसी तेल का रणनीतिक महत्व फिर बढ़ गया क्योंकि जंग ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की ढुलाई गड़बड़ा दी.
इस तेल गलियारे से वित्त वर्ष 2025 में भारत के तेल और गैस आयात का लगभग आधा हिस्सा आया. इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत ऐसे प्रमुख सप्लायर देशों में से हैं जो इस तेल गलियारे पर निर्भर हैं.
फरवरी 2026 में वॉशिंगटन ने कुछ समय के लिए अपना रुख नरम किया और भारत को रूसी तेल खरीदते रहने की इजाजत दी, ताकि ग्लोबल एनर्जी मार्केट में स्थिरता बनी रहे और सप्लाइ में बाधा न आए.
अब यह छूट कम होती दिख रही है. होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाला जहाजी यातायात अस्त-व्यस्त है क्योंकि ईरान और अमेरिका की वार्ता का अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है. इन तनावों का असर तेल की कीमतों पर भी दिखा है.
हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड के दाम 100 डॉलर (9,550 रु.) प्रति बैरल से ऊपर चले गए, जो कुछ समय के युद्धविराम के बाद जून में 80 डॉलर (7,650 रु.) प्रति बैरल से नीचे आ गए. लेकिन अगस्त के मध्य तक ये कीमतें फिर 89 डॉलर (8,500रु.) प्रति बैरल तक पहुंच गईं.
विकल्प कम और महंगे
निवेश सूचना और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आइसीआरए (इक्रा) के सीनियर वाइस-प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं, “रूसी तेल पर हमारी निर्भरता बहुत ज्यादा है. पिछले साल जब अमेरिका ने 25 फीसद जुर्माना लगाया था तब भी भारत ने रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद नहीं किया था.” हालांकि भारत ने प्रतिबंध वाली दो रूसी कंपनियों—रोजनेफ्ट और लुकऑयल—से खरीद बंद कर दी थी लेकिन दूसरे रूसी सप्लायरों से खरीद जारी रखी.
वशिष्ठ कहते हैं, “अगर भारत पर 100 फीसद टैरिफ लगाया जाता है तो अब भी ऐसा ही होने के हालात दिख रहे हैं.” उनके मुताबिक, चुनौती यह है कि विकल्प सीमित हैं. वे पूछते हैं, “जब होर्मुज के रास्ते आयात रुका हो और अमेरिका जैसी जगहों से आयात करना महंगा पड़े तो भारत अपने तेल आयात का प्रबंध कैसे करेगा?”
आमतौर पर पश्चिम एशियाई कच्चे तेल का ढुलाई खर्च 40-70 सेंट (38-67 रु.) प्रति बैरल होता है, जबकि अमेरिका से शिपमेंट का खर्च 2.5-4 डॉलर (240-380 रु.) प्रति बैरल तक हो सकता है.
सभी एनालिस्ट ऐसा नहीं मानते कि भारत को रूस से तेल खरीदना बंद करने के लिए मजबूर हो जाने की स्थिति में कोई बड़ा आर्थिक झटका लगेगा. कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी और करेंसी रिसर्च के हेड अनिंद्य बनर्जी ने एक न्यूज एजेंसी से कहा कि रूसी कच्चे तेल पर छूट काफी घट गई है.
2022 में एक बैरल रूसी तेल 15-20 डॉलर (1,450-1,900 रु.) के डिस्काउंट पर मिल रहा था; आज यह अंतर सिर्फ 2-3 डॉलर (190-285 रु.) है. बनर्जी की नजर में बड़ा जोखिम रूसी डिस्काउंट घटना नहीं बल्कि यह है कि दुनिया में कच्चे तेल की कीमतें किस दिशा में रहती हैं.
भारत के आयातित क्रूड बास्केट की औसत कीमत में एक बैरल पर हर 10 डॉलर (955 रु.) की बढ़ोतरी से देश का सालाना तेल आयात बिल लगभग 15 अरब डॉलर (1.4 लाख करोड़ रु.) बढ़ जाता है.
इस गणित से जाहिर है कि दिल्ली में चर्चा रूस से इतर क्यों जा रही है. बड़ा सवाल यह है कि जब प्रतिबंध, संघर्ष, शिपिंग में बाधा और व्यापार बातचीत लगातार आपस में जुड़ती जा रही हैं, ऐसे में भारत सस्ती एनर्जी कैसे हासिल कर सकता है.