बड़ी परीक्षा से पहले के बदलाव
नए अध्यक्ष नितिन नवीन को अपनी टीम आखिर मिल ही गई. यह भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण समय और नए पदाधिकारियों के कंधों पर अब पार्टी का नैरेटिव नए सिरे से पटरी पर लाने का कठिन काम

संगठन में शक्ति : पीएम मोदी, नितिन नवीन और अमित शाह 11 अगस्त को एनडीए संसदीय दल की ‘मंगल मिलन’ बैठक के दौरान
विशाखापत्तनम जिले के गुडिलोवा में संघ परिवार की बैठक से दो दिन पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपना सांगठनिक कायाकल्प शुरू किया. अखिल भारतीय समन्वय बैठक 19 से 21 अगस्त तक चली जिसमें संघ के 32 आनुषंगिक संगठन शामिल हुए. उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विचार साझा किए. नितिन नवीन पहली बार इसमें बतौर भाजपा अध्यक्ष शामिल थे.
एक सवाल वहां उनका इंतजार कर रहा था: पार्टी नेटवर्क मजबूत करने के लिए वे क्या कर रहे हैं? जवाब उन्होंने 17 अगस्त को ही खोज लिया था. क्या कुछ हटा दिया गया, यही उनके जवाब की सबसे बड़ी विशेषता थी. वरिष्ठ पदों पर टेलीविजन वाला कोई चेहरा नहीं, न ही बाहर से किसी सेलेब्रिटी को लाया गया.
ग्यारह साल पार्टी के आइटी सेल और सोशल मीडिया का काम संभालने वाले अमित मालवीय हटा दिए गए. उसके सबसे चर्चित युवा नेता तेजस्वी सूर्या युवा मोर्चे से बाहर हैं. प्राइम टाइम के परिचित चेहरे संबित पात्रा को समन्वयक बनाकर उत्तरपूर्व भेज दिया गया है.
नवीन के पास अब 64 पदाधिकारी हैं, जिनमें से कई नए हैं और ज्यादातर संसद की अगली कतारों से नहीं बल्कि राज्य इकाइयों से लाए गए हैं. पार्टी को पिछले कुछ महीने कड़े इम्तहान से गुजरना पड़ा. इसका जवाब उसने ऐसे लोगों को आगे लाकर दिया जो समझते हैं कि संगठन कैसे खड़ा किया जाता है, न कि ऐसे लोगों को जो टेलीविजन पर उसके बारे में समझा सकते हैं. अलबत्ता राजनैतिक बियाबान में भेज दिए गए कुछ जाने-माने चेहरों को वापस लाया गया है.
आरएसएस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राम माधव, जिन्हें 2020 में (कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ मतभेदों के कारण) हटा दिया गया था, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनकर लौटे तो 2024 में अमेठी से चुनाव हार गईं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी राष्ट्रीय महासचिव बनाई गई हैं.
नवीन के पूर्ववर्तियों ने भी कमान संभालने के बाद नई टीमें बनाईं लेकिन 2026 की टीम कहीं ज्यादा गहरी काट-छांट के बाद बनी है. पूर्व पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की टीम में आठ महासचिव थे, जिनमें से मात्र दो, विनोद तावड़े और सुनील बंसल, ही बचे हैं.
तेरह उपाध्यक्षों में से नौ नए हैं, तो 16 सचिवों में से 15 नए. सभी सातों मोर्चों के प्रमुख भी नए हैं. उधर, लगातार अच्छा काम कर रहे तरुण चुघ को केंद्रीय कार्यालय का प्रभारी बनाया गया है. उनसे पहले अरुण सिंह इस पद पर थे, जिन्हें पार्टी का बेशकीमती राज्य गुजरात सौंपा गया है.
तावड़े को उत्तर प्रदेश दिया गया है. सतीश पूनिया को पंजाब मिला है, जहां जून 2025 में एयर इंडिया की विमान दुर्घटना में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपानी की मृत्यु के बाद कोई राज्य प्रभारी नहीं था. सारे उलटफेर की एक निश्चित दिशा दिखाई देती है. नए नामों से भरे गए पद वे हैं जिनका सामना मतदाताओं से है. मजबूत किए गए पद वे हैं जो काडर और संगठन का निर्माण करते हैं.
अतीत के सबक
भाजपा ने 2024 में लोकसभा की 240 सीटें जीतकर अपना बहुमत गंवा दिया था. इससे तीन सबक निकाले गए और तीनों ही इस सूची में साफ देखे जा सकते हैं. पहले का वास्ता संघ के साथ रिश्ते सुधारने से है. ये रिश्ते मई 2024 में टूट गए थे जब लोकसभा चुनाव अभियान की चरम गहमागहमी में नड्डा ने एक इंटरव्यू में कह दिया था कि पार्टी आत्मनिर्भर है और अब उसे आरएसएस की जरूरत नहीं रह गई है.
अब ये रिश्ते काफी हद तक सुधरे हैं, लेकिन संघ पूरी तरह साथ नहीं आया है. उसके बाद हुए राज्य विधानसभाओं के चुनाव अभियानों और संगठन में हुए इस फेरबदल, सभी से पता चलता है कि ज्यादातर फैसले लेने में संघ के संगठनों की सलाह ली जा रही है और उन्हें साथ रखा जा रहा है. मगर फासले अब भी कायम हैं. भाजपा का नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर पर और राज्यों में महासचिव (संगठन) का पद भरने के लिए नए प्रचारक दिए जाने के बारे में बातचीत कर रहा है. चुनाव की तरफ बढ़ रहे उत्तराखंड समेत आठ राज्यों में ये पद खाली हैं.
फेरबदल का सिलसिला जारी है. संघ की तरफ से भाजपा को सौंपे गए पूर्णकालिक प्रचारक सौदान सिंह संयुक्त महासचिव (संगठन) के पद पर लौट आए हैं. दिसंबर 2020 तक वे इसी पद पर थे लेकिन फिर उन्हें चंडीगढ़ भेज दिया गया और इस कतार में एक ही पदाधिकारी शिवप्रकाश रह गए थे. अब उन्हें वापस लाया गया है जबकि बी.एल. संतोष महासचिव (संगठन) के नाते उनके मुखिया हैं.
पार्टी के अंदरूनी लोग इसे दो तरह से देख रहे हैं. या तो नेतृत्व इस दिग्गज प्रचारक को संतोष के उत्तराधिकारी के तौर पर तैयार कर रहा है, या संतुलन की खातिर उन्हें उस महासचिव की बगल में बिठा दिया गया है जिनका रुख फैसलों को लेकर अड़ियल हो गया था.
दूसरे सबक का वास्ता पार्टी के जनाधार से है. विपक्ष ने संविधान और आरक्षण पर खतरे का जो अभियान चलाया, वह ओबीसी, दलित और किसान मतदाताओं के बीच जितनी तेजी से फैला उतनी तेजी से पार्टी उसका मुकाबला नहीं कर पाई. जवाब में भाजपा के उन सभी मोर्चों के प्रमुख बदल दिए गए हैं जिनका वास्ता इन समूहों से है.
उत्तर प्रदेश के राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चे की कमान मिली है. एससी मोर्चा शिवेश कुमार राम को सौंपा गया है, जो नवीन के करीबी विश्वासपात्र हैं और उसी दौर में बिहार से राज्यसभा पंहुचे जिसमें खुद अध्यक्ष पहुंचे थे. उदयपुर के सांसद मन्नालाल रावत ने आदिवासियों के मुद्दे पर डॉक्टरेट की है और इसलिए उन्हें एसटी मोर्चा मिला.
अल्पसंख्यकों का सरोकार अब मेरठ के युवा मुस्लिम राजपूत नेता कुंवर बासित अली से है. छत्तीसगढ़ में महासमुंद से सांसद रूप कुमारी चौधरी महिला मोर्चे की प्रमुख हैं, तो राज्यसभा सांसद मध्य प्रदेश के बंसीलाल गुर्जर को उपाध्यक्ष से पदोन्नत करके किसान मोर्चे का प्रमुख बनाया गया है.
पहली बार संसद में आए वडोदरा के सांसद हेमांग जोशी को सूर्या की जगह युवा मोर्चे की कमान सौंपी गई है. जोशी के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है, उन्हें हाल के जेन जी प्रदर्शनों के दौरान सामने आई खाई को जो पाटना है.
तीसरा सबक नैरेटिव को लेकर है. यह वह सबक है जिसे पार्टी ने सबसे ज्यादा ना-नुकुर के बाद स्वीकार किया. मालवीय को तब हटाया गया है जब तीन हफ्ते पहले ही कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक होने के मुद्दे पर देश भर में छात्रों के प्रदर्शनों को संगठित करने का जरिया बनी.
भाजपा की अपनी पोस्ट पर इस्तीफे की मांग करती टीका-टिप्पणियों की बाढ़ आ गई थी, और 26 जुलाई को केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान मंत्रिमंडल से विदा हो गए. कुछ ही हफ्तों पहले पार्टी को चुनाव की तरफ बढ़ रहे पंजाब में सतलज फिल्म को हटाने के पक्ष में अपना नजरिया पेश करने के बजाय फैसले का बचाव करना पड़ा था.
दोनों ही मामलों में नौबत यह आ गई कि भाजपा को दूसरों की तरफ से बनाए गए नैरेटिव का जवाब देना पड़ा. यह वही भाजपा थी जिसने भारतीय राजनीति में पहला विशाल डिजिटल जनअभियान चलाया था और 12 साल अपनी बढ़त बनाए रखी थी.
सोशल मीडिया प्रमुख के पद पर मालवीय की जगह आए दीपक म्हस्के छत्तीसगढ़ इकाई में जमीन से ऊपर उठे, प्रवक्ता रहे और राज्य के डिजिटल अभियानों का संचालन किया. उन्होंने और नवीन ने वहां 2023 के विधानसभा चुनाव अभियान में साथ काम किया था, जब नवीन राज्य के चुनाव प्रभारी थे. म्हस्के इस पद पर संगठन से उठकर आने वाले पहले व्यक्ति भी हैं (मालवीय और अन्य सीधे बाहर से आए थे).
उनके साथ चार सह-संयोजक हैं—महाराष्ट्र की प्रीति गांधी महिला मोर्चे के लिए सोशल मीडिया संभाल चुकी हैं. दिल्ली के शिवानंद द्विवेदी श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में शोधकर्ता और स्तंभकार हैं. उत्तराखंड के आलोक भट्ट ने राज्य स्तर पर डिजिटल अभियान चलाए हैं. अंत में हैं हरियाणा के अरुण यादव, जिन्हें पैगंबर के बारे में 2017 की एक अपमानजनक पोस्ट फिर सामने आने के बाद जुलाई 2022 में राज्य आइटी प्रकोष्ठ के प्रमुख के पद से हटा दिया गया था.
उनकी वापसी से संकेत मिलता है कि आइटी प्रकोष्ठ का पुनर्गठन तेवर में बदलाव के बजाय पहुंच और प्रसार बढ़ाने को ध्यान में रखकर ज्यादा किया गया है.
पार्टी पर नजर रखने वाले कहते हैं कि नवीन की टीम अतीत से मुक्ति के बजाय निरंतरता की झलक देती है. मगर उम्र और लैंगिक प्रतिनिधित्व के मामले में गौरतलब बदलाव किए गए हैं. चौंसठ पदाधिकारियों में से 42 अब 60 से कम उम्र के हैं, वहीं 13 उपाध्यक्षों में छह महिलाएं हैं, चार सचिव और एक महासचिव भी महिला हैं. यह राष्ट्रीय टीम में महिलाओं की अब तक की सबसे बड़ी मौजूदगी है.
संघर्ष की तैयारी
अगले साल 2027 में सात राज्यों में चुनाव होने हैं—उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में साल की शुरुआत में और गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में साल के आखिर में. इनमें उत्तर प्रदेश का चुनाव सबसे अहम है, शायद इसीलिए आठ नए पदाधिकारी इसी राज्य के हैं.
मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जवाब में नबीन का फीता राज्य को जाति समूहों के हिसाब से नापता है. इसीलिए ओबीसी समूहों से अमरपाल मौर्य, संगीता यादव और रेखा वर्मा हैं, हरीश द्विवेदी (ब्राह्मण चेहरे) और ईरानी राष्ट्रीय महासचिव बने हैं.
पश्चिम के दलितों के लिए बुलंदशहर से तीन बार के सांसद भोला सिंह हैं, और टीम में शामिल कुल जमा दो मुसलमान, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर तिराक मंसूर (उपाध्यक्ष) और बासित अली, भी इसी राज्य से हैं. ईरानी, द्विवेदी और वर्मा 2024 में अपनी-अपनी सीट हार गए थे; उनकी वापसी बताती है कि पार्टी के मामलों पर पकड़ हाल की चुनावी जीत-हार से ज्यादा मायने रखती है.
नजर पंजाब के चुनाव पर भी है इसलिए भाजपा ने राज्यसभा सांसद तरुण चुघ को पार्टी मुख्यालय के प्रभारी के पद पर पदोन्नत किया है और उन्हें गुजरात की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है.
दूसरी पार्टियों से आए मनप्रीत बादल (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष) और संदीप पाठक (राष्ट्रीय सचिव) को भी पुरस्कृत किया गया है. चुघ और आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता पाठक की चुनावी रणनीतिकार के तौर पर थोड़ी प्रतिष्ठा रही है लेकिन राज्य के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत पिछले कुछ सालों से चुनावों में अपनी जमीन गंवाते रहे हैं. ऐसे में उनकी पदोन्नति शायद राज्य में दबदबा रखने वाले जट सिख समुदाय को इशारा है.
दक्षिण को सबसे कम अहमियत मिलती दिखती है, जहां से 64 सदस्यों की टीम में महज छह चेहरे हैं. केरल से बेशक दो हैं, दिग्गज कांग्रेसी ए.के. एंटनी के बेटे अनिल एंटनी और राज्य इकाई के पूर्व प्रमुख के. सुदर्शन राष्ट्रीय सचिवों की सूची में हैं. इनके अलावा डी. पुरंदेश्वरी (आंध्र प्रदेश) और एम. नागराज (कर्नाटक) को उपाध्यक्ष बनाया गया है.
भाजपा सूत्रों का कहना है कि टीम पूरी तरह अध्यक्ष की भी नहीं है. वे फेरबदल से ऊपर और परे बने रहे संतोष, प्रमुख पदों पर कायम तावड़े और बंसल, और प्रतीकात्मक पायदानों पर रखे गए दूसरे भारी-भरकम नेताओं की तरफ इशारा करते हैं.
नवीन अपने गृह राज्य बिहार से केवल एक सचिव बनवाने में कामयाब रहे. उनकी सीट और पार्टी के गढ़ रहे बांकीपुर के उपचुनाव में मिली हार से भी उनकी स्थिति शायद कुछ कमजोर हुई. पार्टी अध्यक्ष की दोटूक छाप बस नए डिजिटल दस्ते पर दिखती है, और उसे भी अभी आजमाया जा रहा है.
आगे की तरफ रुख करें तो यह भाजपा और नवीन के लिए बेहद अहम वक्त है. प्रधानमंत्री मोदी 75 वर्ष के हैं. एनडीए की सरकार का कार्यकाल 2029 तक है. नवीन का तीन साल का कार्यकाल जनवरी 2029 में पूरा होगा, यानी ठीक तभी जब चुनाव अभियान शुरू हो रहा होगा लेकिन वह तो अभी बहुत आगे की बात है.
यह संक्रमण काल है या अपने को मजबूत करने का समय, यह 2027 में उत्तर प्रदेश में तय हो जाएगा. पार्टी के पक्ष में अच्छे नतीजे से नवीन की स्थिति मजबूत होगी. ऐसा नहीं हुआ तो खुद उनके और उनके हाथों गढ़े जा रहे पार्टी संगठन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.