प्रधान संपादक की कलम से

सीजेपी संभावना और खतरे, दोनों को समझते हुए आगे बढ़ती दिख रही है. सत्तारूढ़ भाजपा या कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इस नई ताकत के लिए आसानी से रास्ता नहीं छोड़ेंगे

from the editor-in-chief
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इसका नाम कमाल का है. कॉकरोच—बिल्कुल साधारण, संख्या में बहुत ज्यादा, बेबस, लेकिन हैरान करने वाली जिजीविषा वाला. खुद पर तंज कसते हुए इसे आम भारतीय का प्रतीक माना जा सकता है. ऑनलाइन व्यंग्य के रूप में जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जिस तेज रफ्तार से फैली, उसकी बराबरी शायद ही कोई पारंपरिक राजनैतिक पार्टी कर पाती.

अपनी वर्चुअल पेट्रीडिश से बाहर निकलकर यह जंतर मंतर पर असली राजनीति में उतर आई. वहां हजारों युवा भारतीयों, गिग वर्करों और झुग्गी बस्तियों के लोगों के साथ यूट्यूब इन्फ्लुएंसर और बड़े कॉलेजों के छात्र जुटे. महानगर और छोटे शहर एक साथ आए.

इस उफान ने नरेंद्र मोदी सरकार को दुर्लभ कदम वापसी और अपने पूरे जनसंपर्क पर दोबारा सोचने को मजबूर किया.एक केंद्रीय मंत्री ने इस्तीफा दिया, परीक्षा सुधारों में तेजी आई. प्रधानमंत्री खुद इंस्टाग्राम पर उतर आए.

एक मजाक के तौर पर शुरू हुए आंदोलन के लिए यह गंभीर पहला अध्याय है. इस सप्ताह की कवर स्टोरी वह सबसे जरूरी सवाल पूछती है कि अब आगे क्या?

सभी संकेत बताते हैं कि यह युवा संगठन आगे बढ़ना चाहता है. सीजेपी ने एजेंडा जारी किया और शुरुआती राष्ट्रीय स्तर का ढांचा खड़ा किया है. ऐसी यात्रा की तार्किक परिणति राजनैतिक दल के रूप में होती है. अगर वह बिखरा युवा आंदोलन, दबाव समूह या एनजीओ बनी रही तो उसके समर्थकों को भी निराशा हो सकती है.

राजनीति में उतरने पर मुख्यधारा से ताने मिल सकते हैं, लेकिन इस महत्वाकांक्षा में कुछ गलत नहीं है. वर्ष 2029 तक भारत में जेन ज़ी के 38 करोड़ वोटर होंगे, जो कुल मतदाताओं का एक-चौथाई हिस्सा होगा. कभी छोटा और राजनीति से दूर रहा यह समूह भारत का सबसे बड़ा और शायद सबसे निर्णायक पीढ़ीगत वर्ग बनेगा.

रोजगार की कमी जैसी साझा चिंताएं उन्हें जोड़ती हैं. उनकी ताकत तमिलनाडु में दिखी, जहां राजनीति में नए सुपरस्टार विजय ने युवाओं के दम पर एक मजबूत पारंपरिक दल को पीछे छोड़ दिया. आंकड़े और मिसाल दोनों मौजूद हैं. राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होना असंभव नहीं. मगर सैद्धांतिक रूप से मुमकिन चीजें भारत की उलझी और प्रतिस्पर्धी राजनीति की वास्तविकता के आगे अक्सर दम तोड़ देती हैं.

सीजेपी संभावना और खतरे, दोनों को समझते हुए आगे बढ़ती दिख रही है. सत्तारूढ़ भाजपा या कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इस नई ताकत के लिए आसानी से रास्ता नहीं छोड़ेंगे. फिर सीजेपी अपनी शुरुआत को टिकाऊ और लंबे समय तक अहमियत वाली राजनीति में कैसे बदलेगी? ऐसी राजनीति जो सचमुच बदलाव ला सके?

मैं 50 साल से भारतीय राजनीति देख रहा हूं. मैंने जन आक्रोश से उठे आंदोलनों को तब उतनी ही तेजी से बिखरते देखा है, जब उस गुस्से को कोई संगठित दिशा नहीं मिली. कुछ आंदोलन टिकाऊ राजनैतिक ताकत भी बने. दोनों में फर्क अक्सर जोश का नहीं होता.

सफल आंदोलन को तीन चीजें चाहिए—नेतृत्व, एजेंडा और ऐसा संगठन जो एजेंडे को जनता तक पहुंचाकर असर पैदा कर सके. 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण से लेकर 2010 के दशक में अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल तक, राजनैतिक ताकत बने जन आंदोलनों के पास ऐसे करिश्माई चेहरे थे, जो लोगों को एकजुट कर सके.

 31 अगस्त, 2011 का इंडिया टुडे का कवर

अभिजीत दीपके सीजेपी को सहज और पसंद आने वाला नेतृत्व देते हैं. लेकिन वे अब भी आम आदमी पार्टी (आप) के पर्दे के पीछे काम करने वाले व्यक्ति की पुरानी भूमिका से आगे बढ़ रहे हैं. उनकी टीम पर भी उसकी छाप है.

सीजेपी अब पूरे आंदोलन को जन्म देने वाले नीट विवाद के बाद अब होशियारी से आगे बढ़ रही है. अब वह सरकारी स्कूलों की हालत, चुनाव सुधार, भ्रष्टाचार और संस्थाओं की जवाबदेही की बात करती है. ये असली मुद्दे हैं लेकिन एक मजबूत राजनैतिक दल को इन शिकायतों की सूची से ज्यादा चाहिए.

उसे भारत की अर्थव्यवस्था का खाका देना होगा. हर साल रोजगार बाजार में आने वाले 1.2 करोड़ युवाओं के लिए नौकरियां कैसे सृजित होंगी? शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच ढांचागत दूरी कैसे मिटेगी? दूषित परीक्षा व्यवस्था को सुधारने भर से जेन ज़ी की गहरी गैर-बराबरी खत्म नहीं होगी. आंदोलन के बाद नीतिगत सोच नहीं जोड़ी जा सकती.

सीजेपी के एजेंडे को उससे ज्यादा धार, गहराई और तालमेल चाहिए जो उसके पास अभी है. उसे पारंपरिक दलों, खासकर कांग्रेस के हाथों अपना एजेंडा छिनने का खतरा भी है. कांग्रेस को अपनी तरफ से उठाए मुद्दों पर बहुत समर्थन नहीं मिला है. साथ ही, सत्तारूढ़ दल की पूरी ताकत भी सीजेपी पर टूटेगी.

बहरहाल, संवाद के मोर्चे पर सीजेपी साफ तौर पर आगे है. जेन ज़ी के पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सीधे बात करके वह पारंपरिक दलों के पूरे प्रचार तंत्र को दरकिनार कर सकती है. इंस्टाग्राम रील पलभर में जमीनी स्तर तक पहुंचती है. उसका ‘क्या बोलती पब्लिक?’ अभियान दोतरफा संवाद बनाता है, जनता से शासन के मुद्दे जुटाता है और एक तरह की जन निगरानी व्यवस्था तैयार करता है. यह नया भी है और वास्तविक भी.

सवाल है कि क्या इस कच्ची डिजिटल ऊर्जा को एक ठोस राजनैतिक रूप दिया जा सकता है या यह दूसरी जगहों पर हुए ऐसे आंदोलनों की तरह किसी अपरिपक्व संगठन की तरह बिखर जाएगी. भारत का राजनैतिक इतिहास आसानी से उम्मीद नहीं जगाता, लेकिन संभावना खत्म भी नहीं करता. हमने समर्थकों और आलोचकों, दोनों से बात करके यह परखा है कि व्यंग्य से जन्मा और असली जन आक्रोश से ताकत पाया युवा आंदोलन राजनैतिक परिपक्वता का कठिन सफर तय कर सकता है या नहीं.

सीजेपी के बढ़ने की मुश्किलें, चाहे जिस रूप में सामने आएं, एक बड़ी तस्वीर दिखाएंगी. भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है. वह युवाओं की राजनैतिक ऊर्जा को सकारात्मक या विनाशकारी रूप में कैसे समेटता है, यह किसी एक चुनाव से कहीं ज्यादा आने वाले दशकों के लोकतंत्र को आकार देगा.

लगता है, कॉकरोच की महत्वाकांक्षाएं सिर्फ जीवित रहने तक सीमित नहीं, इससे आगे की हैं.

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