ओडिशा रेवड़ियों ने खोली आधी आबादी की आत्मनिर्भरता की नई राह
ओडिशा की सुभद्रा योजना पर अपने तरह के पहले अध्ययन ने पेश की उत्साहजनक तस्वीर. हाथ में आई नकद राशि महिलाओं के लिए अपना उद्यम शुरू करने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में साबित हो रही मददगार

बंगाली बरदा (बाएं से दूसरी) भुवनेश्वर के पास जय सियाराम स्वयं सहायता समूह की साथी सदस्यों के साथ
महिलाओं को सीधे नकद हस्तांतरण अब लगभग सभी राज्यों के बजट का एक खास पहलू बन चुका है. राजनैतिक दलों ने एक के बाद एक राज्य में इसके बलबूते सत्ता पाई, महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ाई और यही नहीं, अपनी पारंपरिक राजनैतिक प्राथमिकताओं का एक अलग वर्ग स्थापित कर लिया. इसके पक्ष और विपक्ष के सभी तर्क मुख्य रूप से राजकोषीय स्थिति के इर्द-गिर्द केंद्रित होते हैं.
मसलन, “क्या राज्य यह खर्च उठा सकते हैं?” या “क्या यह जनकल्याण है या सिर्फ मुफ्त की रेवड़ियां?” किसी ने महिलाओं से पूछने की जहमत ही नहीं उठाई कि बजट से करोड़ों रुपए का यह खर्च उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में क्या बदलाव ला रहा है. कम से कम अभी तक ऐसा नहीं हुआ था.
ओडिशा अपनी सुभद्रा योजना के बारे में जमीनी स्तर पर अनूठे अध्ययनों के जरिए इस खालीपन को दूर कर रहा है. नतीजे इतने के लिए तो काफी हैं जो ऊहापोह में फंसे नीति निर्माताओं को भी इस बारे में सतर्क कर दें. हालांकि, इसमें खामियां भी हैं पर इतनी भी नहीं जो मूल विचार को खारिज कर दें. बल्कि इनसे तो ऐसे पहलू सामने आते हैं, जिनसे हर राज्य इसका फायदा उठा सके.
सितंबर 2024 में शुरू की गई सुभद्रा योजना के तहत 21 से 60 साल की पात्र महिलाओं को पांच वर्ष तक 10,000 रुपए सालाना आर्थिक मदद दी जाती है ताकि वे आजीविका कमा सकें और वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बन सकें. यह ओडिशा की ज्यादातर पात्र महिलाओं को कवर करती है. योजना में अब तक 1.02 करोड़ महिलाओं को 20,648 करोड़ रु. से ज्यादा की रकम दी जा चुकी है.
तो कैसा रहा है इसका व्यावहारिक अनुभव? दो आकलन हुए हैं. एक भारतीय प्रबंध संस्थान (आइआइएम), संबलपुर ने किया और दूसरा एसबीआइ रिसर्च ने. ये बताते हैं कि योजना से क्या हासिल हो रहा है, कहां कमियां रह गई हैं और आगे क्या करने की जरूरत है.
एक जमीनी दौरे ने आंकड़ों को इंसानी चेहरों के जरिए पढ़ने-सुनने में हमारी मदद की. सोच यह पता लगाने की थी कि यह पैसा वास्तविक जीवन की जटिलताओं के बीच महिलाओं को कितना सशक्त बनाता है. निर्णय प्रक्रिया में उनका दायरा कितना बढ़ पाया है?
वर्षों पहले बरदा के पति ने उन्हें छोड़ दिया था. उन्होंने अपने दो बच्चों—फार्मेसी की पढ़ाई कर रही एक बेटी और रांची में क्रिकेट में करिअर बनाने में लगा बेटा—का पालन-पोषण करने के लिए लोगों के घरों में खाना बनाने का काम किया. उनके अपने सपने पीछे छूट गए थे. सुभद्रा योजना ने उसे बदल दिया. इसके वित्तीय सहयोग और अपने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से उन्होंने खाने-पीने की चीजें बनाना और बेचना शुरू किया. वे कहती हैं, “पैसे तो मैं पहले भी कमा रही थी पर सुभद्रा के बूते अब मैं अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी दे सकती हूं.’’
भुवनेश्वर के बाहरी इलाके में रहनी वाली 43 वर्षीया नमिता मिश्रा ने एक दशक पहले मां बनने पर निजी क्षेत्र की नौकरी छोड़ दी थी. पति एक निजी स्कूल में पढ़ाते हैं; अक्सर पैसे की तंगी रहती थी. सुभद्रा योजना के बाद उन्होंने एक सिलाई मशीन और एक वेट ग्राइंडर खरीदा और घर पर मसाले तैयार करने शुरू कर दिए. नमिता कहती हैं, “मेरी बेटी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ती है. मैं कमाऊंगी नहीं तो उसे पढ़ाना भी मुश्किल हो जाएगा.”
दोनों अध्ययन मोटे तौर पर बदलाव की बात को सच होते दिखाते हैं. महिला और बाल विकास (डब्ल्यूसीडी) विभाग की ओर से कराए आइआइएम के अध्ययन सुभद्रा समीख्या में ओडिशा की 22,000 लाभार्थियों से बातचीत की गई और पूछा कि वे पैसे कहां खर्च करती हैं; क्या यह परिवार और व्यापक अर्थव्यवस्था के भीतर उनकी भूमिका को बढ़ा रहा है?
निष्कर्ष बताता हैः सुभद्रा ने जमीनी स्तर पर वित्तीय व्यवहार को नया आकार देना शुरू कर दिया है. 64 फीसद महिलाओं ने स्वतंत्र वित्तीय निर्णय लेने की बात स्वीकारी. 31 फीसद परिवार के लोगों के साथ मिलकर फैसले लेती हैं. दस में से छह महिलाओं का कहना है कि योजना में शामिल होने के बाद वे पैसे का प्रबंधन ज्यादा आत्मविश्वास के साथ कर पाती हैं; लगभग 87 फीसद सुभद्रा को “बहुत उपयोगी” बताती हैं, जो इसके बेहद लोकप्रिय होने का संकेत है.
उद्यमिता की जबरदस्त भूख
इसमें सबसे आश्चर्यजनक निष्कर्ष संभवत: उद्यमिता से जुड़ा है. आलोचना के तौर पर कहा जाता है कि बिना शर्त नकद हस्तांतरण मुख्य रूप से रोजमर्रा की चीजों में ही खर्च हो जाता है. सर्वे में पता चला कि सुभद्रा के कुल खर्च का 25.52 फीसद बिजनेस सेटअप करने में लगाया गया है, जिससे नए उद्यमों की शुरुआत की एक नई राह खुली है. इस मामले में दलित लाभार्थी बाकी लोगों की तुलना में आगे दिखाई देती हैं, जिनमें से करीब एक-तिहाई इस पैसे को आजीविका के साधन खड़ा करने में लगाती हैं.
हालांकि, आइआइएम की रिपोर्ट बहुत ज्यादा उत्साही तस्वीर पेश करने से बचती है. कई परिवारों के लिए सुभद्रा मुख्य रूप से एक वित्तीय सहारा है. 35 फीसद से ज्यादा पैसा घरेलू जरूरतों पर खर्च होता है; 14 फीसद कर्जा चुकाने में जाता है.
अध्ययन बताता है कि यह महिलाओं के निर्णय लेने के मामले में सशक्त होने या न होने भर का मामला नहीं है. वे पैसों पर अपना नियंत्रण तो हासिल कर रही हैं लेकिन खर्च के निर्णय अक्सर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की बजाए पारिवारिक मजबूरियों के आधार पर तय होते हैं. रिपोर्ट इसे “सशक्तीकरण का विरोधाभास” करार देती है. यानी औपचारिक वित्तीय अधिकार का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि वास्तव में आर्थिक स्वतंत्रता भी मिल गई है.
अध्ययन एक दिलचस्प पैटर्न भी रेखांकित करता है. 31 से 40 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं उद्यमिता हासिल करने के मामले में सबसे आगे रहीं. युवतियों ने हुनर सीखने में निवेश करने की ओर ज्यादा झुकाव दिखाया. शिक्षा ने वित्तीय व्यवहार को प्रभावित किया: ज्यादा शिक्षित महिलाओं में बचत करने और दीर्घकालिक संपत्तियां बनाने की संभावना अधिक दिखी. बाकी महिलाओं ने परिवार की तात्कालिक जरूरतों को प्राथमिकता दी, जो कि महिलाओं के कम समझदार होने के बजाए उन जरूरतों के अधिक गंभीर होने का नतीजा था.
एक बड़ी खामी: सुभद्रा फंड का सिर्फ 6.62 फीसद ही हुनर तराशने में खर्च हुआ. रिपोर्ट आगाह करती है कि जब तक उद्यम को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और बाजार तक पहुंच का रास्ता नहीं मिलता, तब तक इससे कई शुरुआती व्यवसाय खुद को बचाए रखने के लिए संघर्ष ही कर सकते हैं. इसमें यह भी कहा गया है कि डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास, शून्य-ब्याज पर कर्ज, वित्तीय परामर्श और ज्यादा सशक्त सहकर्मी मार्गदर्शन को जोड़कर योजना को ज्यादा स्मार्ट बनाया जाए ताकि समय के साथ बेहतरीन और व्यापक प्रभाव नजर आए.
बैंकिंग के रास्ते मिले प्रमाण
एसबीआइ रिसर्च का अध्ययन भी कमोबेश इसी तरह के निष्कर्षों पर पहुंचता है जो 1,60,000 से ज्यादा महिलाओं के बैंकिंग डेटा पर आधारित है. समान आय वर्ग की 75,750 लाभार्थियों के लेन-देन की तुलना 85,588 गैर-लाभार्थियों से करने पर सुभद्रा से एक सकारात्मक चक्र शुरू होने के प्रमाण मिले, जो अक्सर शुरुआती नकद हस्तांतरण से कहीं आगे तक जाते हैं.
महीने के अंत में लाभार्थियों के बैंक खाते की बची शेष राशि में औसतन 6,887 रुपए की वृद्धि दर्ज की गई, जो कि गैर-लाभार्थियों की तुलना में 45 फीसद ज्यादा है. उपभोग में भी लगभग 28 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई. ये लाभ महीनों तक दिखाई देते रहे, जिसके बाद परिवारों के फंड का उपयोग कर लेने पर ये धीरे-धीरे कम होने लगे. लाभ सभी आयु वर्गों को मिला था, लेकिन 30 से 44 वर्ष के बीच की महिलाओं में सबसे ज्यादा स्पष्ट तौर पर दिखता था, जिन्होंने सबसे ज्यादा बचत और खपत दर्ज की.
दिलचस्प बात यह है कि कम या बिना किसी औपचारिक शिक्षा वाली महिलाओं ने बचत में सबसे तेज वृद्धि (करीब 73 फीसद) दर्ज की. ज्यादा शिक्षित महिलाओं ने खपत में कहीं अधिक वृद्धि दिखाई, जो आय के आधार को दर्शाती है. जैसे-जैसे महिलाओं की बचत बढ़ी, पतियों, पिताओं और बेटों के बैंक बैलेंस में भी सुधार हुआ. उनके खर्चों में मामूली गिरावट भी आई, जिससे संकेत मिलता है कि महिलाएं घरेलू खर्चों का बड़ा हिस्सा उठा रही थीं, जिससे परिवार के अन्य सदस्य ज्यादा बचत कर सके.
आइआइएम अध्ययन की तरह एसबीआइ ने निष्कर्ष निकाला कि यह योजना दोहरी भूमिका निभाती है. कुछ के लिए, यह एक बुनियादी सामाजिक सुरक्षा है तो बाकियों के लिए, छोटे-उद्यमों के वास्ते कार्यशील पूंजी. अगर स्थानीय मांग और छोटे उद्यमों का क्रम यूं ही चलता रहे तो अनुमानत: यह योजना पांच वर्षों में लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपए का आर्थिक प्रभाव उत्पन्न कर सकती है.
यह अध्ययन सुझाव देता है कि भविष्य में इसको विस्तार देते समय अधिक लक्षित प्राथमिकता तय की जानी चाहिए, जिसमें केवल ज्यादा कवरेज पर जोर नहीं हो. इसमें कहा गया है कि नकद हस्तांतरण अंतत: टिकाऊ आजीविका प्रदान करने का एक माध्यम बन सकता है, बशर्ते लाभार्थियों को स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास, बाजारों और औपचारिक किस्म की कर्ज व्यवस्था से जोड़ दिया जाए.
दक्षता पर अध्ययन
इन सिफारिशों के आधार पर ओडिशा अपनी योजनाओं को आकार दे रहा है. उपमुख्यमंत्री और महिला तथा बाल विकास मंत्री प्रवती परीदा बताती हैं कि सरकार ने योजना को नए सिरे से डिजाइन करने से पहले पता लगाने का फैसला किया कि महिलाओं ने पहली किस्तों का इस्तेमाल कैसे किया. वे बताती हैं, नीति निर्माताओं को जिस बात ने हैरान किया, वह यह कि महिलाओं ने अपेक्षाकृत मामूली रकम का इस्तेमाल कितनी समझदारी से किया.
“कई महिलाओं ने सिलाई, मछली पालन, बकरी पालन आदि में निवेश किया. कुछ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने सामूहिक व्यवसाय के लिए अपनी अनुदान राशि को साथ मिला दिया.” कोरापुट, मलकानगिरी, रायगड़ा और देवगढ़ के उनके दौरों ने आश्वस्त किया कि व्यक्तिगत कहानियां योजना की सफलता के सबूत पेश करती हैं. तभी अध्ययनों का फैसला हुआ. इन निष्कर्षों ने राज्य को सुभद्रांकु मुद्रा पहल के तहत सुभद्रा योजना को कौशल प्रशिक्षण, मिशन शक्ति, एमएसएमई, कृषि और ऋण योजनाओं के साथ एकीकृत करने को प्रेरित किया है.
बकौल परीदा, “हम चाहते हैं कि हर गांव, पंचायत में महिला नेतृत्व वाले उद्यम हों जो सुभद्रा शक्ति ब्रांड के तहत उत्पादों का विपणन करें.” विभिन्न आयु वर्गों के लिए आइआइएम संबलपुर, एक्सआइएम यूनिवर्सिटी के साथ उड़िया उद्यमियों से मार्गदर्शन दिलाने की योजना बन रही है. महिला और बाल विकास विभाग की आयुक्त-सह-सचिव मृणालिनी दर्सवाल का कहना है कि अगर कोई महिला इतने कम पैसे में खुद का व्यवसाय खड़ा कर सकती है, तो क्षमता निर्माण होने पर “सोचिए वह क्या हासिल कर सकती है.
हम बस इतना चाहते हैं कि जब तक वह एक सफल उद्यमी न बन जाए, उसका हाथ थामे रखें.” सामाजिक कल्याण निदेशक मनीषा बनर्जी कहती हैं, “निर्णय लेने में भूमिका रातो-रात नहीं मिलती. यह तब आती है जब महिलाएं बार-बार क्षमता साबित करती हैं.”
पुरुषों के नजरिए को बदले बिना महिलाओं को सशक्त बनाने से अक्सर समानता के बजाए प्रतिरोध पैदा हो सकता है, इसलिए सरकार ने अपने अद्विका प्लेटफॉर्म के माध्यम से किशोर लड़कों को जोड़ना और पिताओं को बच्चों की देखभाल में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है. साफ है कि महीने के इन 833 रुपयों को लंबा सफर तय करना है.