सीजेपी का अगला कार्यक्रम

कॉकरोच जनता पार्टी फिलहाल ‘प्रेशर ग्रुप’ बनने पर ध्यान दे रही है. वह अपने अगले बड़े मुद्दे के लिए देश की ओर देख रही है और अपना ढांचा भी खड़ा कर रही है.

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5 अगस्त को संभाजीनगर में अभिजीत दीपके के घर पर सीजेपी कोर कमेटी की मीटिंग हुई

"क्या बोलती पब्लिक?" दो दिनों की चर्चा के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सदस्यों ने यह सवाल सड़कों पर ले जाने का फैसला किया है. वे देश भर में फैलकर जमीनी स्तर पर लोगों की बात सुनेंगे कि वे क्या चाहते हैं. लेकिन संभाजीनगर में पार्टी संयोजक अभिजीत ‌दीपके के घर पर हुए ‘कॉकरोच कॉन्क्लेव’ से शायद जो ज्यादा अहम संदेश निकला, वह महत्वाकांक्षा का है.

सितंबर में अगले अभियान की अगुआई करने वाले लोग विरोध में जुटे इंस्टाग्रामर्स का बिखरा हुआ समूह नहीं रहेंगे. वे ऐसे संगठन का प्रतिनिधित्व करेंगे, जिसका ढांचा नाम को छोड़ दें तो कैडर-आधारित राजनैतिक पार्टी जैसा दिखता है. पार्टी ने अपना ढांचा औपचारिक कर दिया है. दीपके इसके संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक हैं जबकि दिल्ली के सौरभ दास और जयपुर के आशुतोष रांका—जो दिल्ली प्रदर्शनों के दो अन्य सबसे पहचाने जाने वाले चेहरे हैं—सह-संयोजक होंगे.

इसके आगे एक क्रमबद्ध संगठन होगा, जिसमें लीगल अफेयर्स, पॉलिसी, टेक, फाइनेंस आदि जैसे साफ तय वर्टिकल होंगे और हर वर्टिकल की अपनी बैकरूम टीमें होंगी. महाराष्ट्र में आम आदमी पार्टी के युवा विंग से जुड़े रहे और दीपके के लंबे समय से सहयोगी अजिंक्य शिंदे एक राजनैतिक स्टार्ट-अप के सीओओ जैसे होंगे, जो पूरे ढांचे को संभालेंगे.

शीर्ष चार के अलावा दीपक बालियान भी हैं, जो राजस्थान में किसान मुद्दों के एक्टिविस्ट हैं और जिन्हें रांका इस संगठन में लाए. लीगल अफेयर्स टीम की प्रमुख दिल्ली की वकील और पूर्व पत्रकार रत्ना सिंह हैं. उनकी टीम आंदोलन का काम करते हुए कानून से टकराव में आने वाले किसी भी व्यक्ति को कानूनी मदद देगी. (देखें: सीजेपी में किसकी क्या है जिम्मेदारी).

सिर्फ ढांचे के स्तर पर देखें तो सीजेपी ने अपने लिए जो स्वरूप तय किया है, वह एक पार्टी के ढांचे जैसा दिखता है—जोनल इंचार्ज, राज्य और लोकसभा क्षेत्र इकाइयां और आदेश की एक समर्पित शृंखला.

ढीले-ढाले आंदोलनों का व्यवहार आम तौर पर ऐसा नहीं होता. वे अभी चुनाव लड़ते हैं या बाद में, यह पूरी तरह उनका अपना फैसला है. अगर विरोध ही आपका अंतिम लक्ष्य हो तो आप जोनल कमान और अनुशासित कैडर नहीं बनाते.

सीजेपी की मन की बात
अपने दोनों सह-संयोजकों के साथ खड़े दीपके ने बैठक के बाद कहा, “भारत की करीब 65 फीसद आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है, लेकिन शिक्षा और बेरोजगारी जैसे क्षेत्रों में उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उन पर कोई बात नहीं करना चाहता... सरकार ऐसे व्यवहार करती है जैसे ये मुद्दे मौजूद ही नहीं हैं.

उनके लिए एकमात्र मुद्दा हिंदू बनाम मुसलमान है.” ‘क्या बोलती’ संपर्क अभियान को “स्टेकहोल्डर कंसल्टेशन” बताते हुए दीपके ने जोर दिया कि अब समय आ गया है कि सरकार युवाओं के “मन की बात” सुने. उन्होंने जोड़ा, “जेन ज़ी की मूल निराशा यह है कि उन्हें खारिज कर दिया जाता है.

नजरअंदाज किया जाता है, कोई उनसे देश को लेकर उनकी उम्मीदों, सपनों और आकांक्षाओं के बारे में नहीं पूछता.” उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय संपर्क कार्यक्रम का मकसद “जनता को सुनने की संस्कृति को वापस लाना” है.

इंडिया टुडे से बात करते हुए दीपके ने बताया कि जंतर मंतर प्रदर्शनों को सिर्फ पेपर लीक से नाराज नीट अभ्यर्थियों का ही समर्थन नहीं मिला, बल्कि अन्य सार्वजनिक परीक्षाओं में गड़बड़ियों से निराश लोगों का भी समर्थन मिला.

वे कहते हैं, “हम बिहार इसलिए जा रहे हैं क्योंकि जंतर मंतर पर मौजूद ज्यादातर लोग वहीं से थे, साथ ही छत्तीसगढ़, झारखंड और यूपी से भी. इन राज्यों के युवा सामाजिक उन्नति के लिए पब्लिक सर्विसेज कमिशन (पीएससी) परीक्षाओं पर निर्भर हैं और निराश हैं.

उन्होंने हमसे पूछा कि हम सिर्फ नीट की बात क्यों कर रहे हैं, पीएससी परीक्षाओं की क्यों नहीं.” वे यह भी कहते हैं, “यह पूरे भारत में बहुत बड़ी चिंता है.”

एक और मुद्दा जिसे सीजेपी उठाने को उत्सुक है, वह डिलिवरी ऐप्स के गिग वर्करों का है. दीपके का कहना है, “यह अवधारणा पश्चिमी देशों के लिए ठीक है क्योंकि वहां समाज उन्नत है. भारत में गिग वर्किंग श्रम के शोषण के अलावा कुछ नहीं है.

उन्हें सुरक्षा जाल चाहिए और इसके लिए बड़े नीतिगत सुधार की जरूरत होगी. वे बहुत कम लाभ के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं.” “दीर्घकालिक लक्ष्य” बेशक देश के राजनैतिक विमर्श को आशावादी ढंग से बदलना है. उनका कहना है, “समाज में सहानुभूति और करुणा घट रही है. समाज के तौर पर हम परपीड़क बनने लगे हैं.”

पिछले कुछ दिनों में व्यापक गेम प्लान साफ दिख रहा है. सीजेपी का अभी किसी मौजूदा राजनैतिक दल में शामिल होने या खुद दल बनने का कोई इरादा नहीं है. इसके बजाए वह चुस्त रहना चाहती है, और खुद को कभी “रिस्पॉन्स ग्रुप”, कभी “प्रेशर ग्रुप” और कभी “जन आंदोलन” बताती है.

जो देश भर में स्वाभाविक रूप से फैलने की उम्मीद रखता है. अगर यह पारंपरिक राजनैतिक एजेंडा जैसा नहीं लगता तो इसकी वजह है कि सीजेपी अभी तक किसी एक नेता के इर्द-गिर्द बना पारंपरिक राजनैतिक संगठन नहीं है.

एक खास तरह का कच्चापन
दीपके के घर के लिविंग रूम में बी.आर. आंबेडकर की दो बड़ी पेंटिंग्स लगी हैं, जहां रणनीतिक बैठकें हो रही हैं. वे उनकी राजनीति को जोर से बयान करती हैं. लेकिन असल जिंदगी में सीजेपी नेता एक ‘नॉन-लीडर’ जैसे लगते हैं: धीमे बोलने वाले, दुबले-पतले, कॉटन टी-शर्ट पहने. लेकिन वे इंस्टाग्राम पर जो कुछ भी पोस्ट करते हैं—रील, लाइव या स्टोरी—उसे लाखों लोग देखते हैं.

राजनैतिक कंटेंट क्रिएटर माद्री काकोटी, जिन्हें उनके लोकप्रिय इंस्टा हैंडल डॉ. मेडुसा से ज्यादा जाना जाता है, मानती हैं कि यही चीज काम कर गई. वे कहती हैं, “यह पीढ़ी अपने फोन पर जो देखती है, उसमें एक खास तरह का कच्चापन चाहती है.

वे आम बड़े इन्फ्लुएंसर जैसे नहीं हैं, जो हमेशा इतने सजे-धजे, इतने बनाए-संवारे होते हैं.” वे दलील देती हैं कि जेन ज़ी, जो दुनिया का बड़ा हिस्सा फोन, फिल्टर और मीम्स के जरिए अनुभव करती है, उसके लिए असलियत दुर्लभ हो गई है. “इसलिए जो भी चीज असली लगती है, कच्ची लगती है, वह अलग दिखती है.”

काकोटी कहती हैं कि मई में शुरुआती दिनों में वे सीजेपी की बैकरूम गतिविधियों से जुड़ी थीं और यह असलियत कोई संयोग नहीं है. “आंदोलन के पहले 14 दिनों में हमने यही किया... हमने सिर्फ अनक्यूरेटेड, अनएडिटेड वीडियो डाले.”

सलाह काम कर गई. दीपके के वीडियो आम तौर पर इससे ज्यादा कुछ नहीं होते कि वे फोन उठाते हैं और उसके कैमरे के सामने बोलने लगते हैं. एडिटिंग लगभग नहीं होती. उनके सहयोगियों, सौरभ दास और आशुतोष रांका का भी लगभग यही अंदाज है.

अगर काकोटी सोशल मीडिया पर दीपके की अपील की परतें खोलती हैं तो राजनीति शास्त्री योगेंद्र यादव इसे सही जगह, सही समय का सिद्धांत मानते हैं—आंदोलन ठीक उसी राजनैतिक क्षण पर आया, जब उसे आना था.

वे कहते हैं, “बुनियाद पहले से मौजूद थी, युवाओं के बीच शिक्षा और नौकरियों, दोनों को लेकर गहरी बेचैनी थी. इस देश के युवाओं को अपने लिए वैसा भविष्य नहीं दिखता, जैसा 20 साल पहले दिख सकता था.”

वे दलील देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की “कॉकरोच” टिप्पणी चिंगारी इसलिए बनी, क्योंकि कई बेरोजगार युवाओं को यह बेहद निजी लगी. यादव कहते हैं, “कई युवाओं ने मुझसे कहा, ‘जब मैंने यह सुना तो मुझे लगा कि वे मेरे बारे में बोल रहे हैं’.”

हालांकि सिर्फ टाइमिंग यह नहीं समझाती कि विरोध इतना कैसे फैल गया. यादव कहते हैं, “दूसरी चीज थी मीम्स का इस्तेमाल.” वे सर्बियाई एक्टिविस्ट सर्जा पोपोविच की ‘डिलेमा ऐक्शन थ्योरी’ की ओर इशारा करते हैं—यह विचार कि व्यंग्य और प्रैंक अक्सर अधिनायकवादी सरकारों को ऐसी स्थिति में डाल देते हैं, जहां हर प्रतिक्रिया उन्हें ही नुक्सान पहुंचाती है.

वे कहते हैं कि तीसरा तत्व यह था कि आंदोलन ने खुलकर कोई एक राजनैतिक रंग नहीं अपनाया. “जो लोग इसकी अगुआई कर रहे थे, वे कोई रंग लेकर नहीं चले.” हालांकि वे सावधान करते हैं कि यह सचमुच नेतृत्वहीन भी नहीं है. “उनके नेता हैं. उनके पास फैसला लेने का ढांचा है. लेकिन वे इसे कम नेता-केंद्रित, कम पदानुक्रम वाला रखना चाहेंगे.”

लेकिन उस जानबूझकर कमतर रखी गई छवि के पीछे नेतृत्व कोई संयोग नहीं है. 30 वर्षीय दीपके राजनीति के हा‌शिये से अनजान नहीं हैं. बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स करने से पहले वे आम आदमी पार्टी (आप) की सोशल मीडिया टीम में इंटर्न रह चुके थे.

दास 18 साल की उम्र में ही आरटीआइ एक्टिविस्ट थे, और पत्रकार के रूप में भी मैदान में समय बिता चुके हैं. आंदोलन के ‘पॉलिसी ब्रेन’ रांका कभी आप के स्वयंसेवक रहे और मैकेंजी में कंसल्टेंट रह चुके हैं.

इनमें से कोई भी राजनैतिक विमर्श से अनजान, भोला-भाला बाहरी व्यक्ति नहीं है. लेकिन इन तीनों से आगे यह अब भी ऐसे बेतरतीब लोगों का समूह है, जो एक मुद्दे के लिए साथ आए. लिहाजा, अब ढांचे और संगठन की जरूरत है.

सोशल मीडिया स्टार और राजनैतिक एक्टिविस्ट मेघनाद कहते हैं, “यह अच्छी शुरुआत है... उन्हें संगठनात्मक ढांचा बनाना ही था.” वे शुरुआत से आंदोलन का हिस्सा रहे हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने ही दीपके को इंस्टाग्राम से परिचित कराया.

वे यह भी कहते हैं, “लेकिन इसके आगे लक्ष्य, विचारधारा जैसी चीजें हैं... और यह कि आप फैसले कैसे लेते हैं. यह बहुत अहम है. यही तय करेगा कि आप गंभीर हैं या सिर्फ राजनैतिक पार्टी की वेशभूषा में अ‌भिनय करने की कोशिश कर रहे हैं.”

कई हाथ मिले...
सीजेपी के लिए यह नाजुक वक्त है. दो महीने पुराना यह आंदोलन अब उन मीम्स से आगे बढ़ चुका है, जिनसे उसे पहली बार पहचान मिली थी. जब उसने पहली बार समर्थकों से जंतर मंतर पहुंचने की अपील की तो वहां मुश्किल से 800 लोग थे.

आखिरकार जो बड़ी लामबंदी हुई, उसका बड़ा हिस्सा उन संगठनों ने किया जो पहले से जमीन पर सक्रिय थे. इनमें सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) जैसे वाम संगठनों के छात्र विंग भी शामिल थे.

दरअसल, दीपके के बोस्टन से आने से पहले भी आइसा परीक्षा लीक मुद्दे पर शिक्षा मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन कर रहा था. इसकी अध्यक्ष नेहा बोरा समेत दो अन्य एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के साथ भूख हड़ताल पर भी थे.

जंतर मंतर पर उनसे मिलने वालों में अभिनेत्री और एक्टिविस्ट शबाना आजमी भी थीं, जिन्होंने स्नेह से उनका हाथ सार्वजनिक रूप से चूमा था. यह तस्वीर फिर वायरल हो गई. सीजेपी की ऑनलाइन फॉलोइंग की ‘ड्यूरेबिलिटी’ के लिए तारीफ हुई है, लेकिन इसका बहुत श्रेय इन संगठित और लामबंद समूहों को जाता है.

बोरा राज्य पीएससी और स्टाफ सेलेक्शन कमिशन परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शनों को आवाज देने के लिए पहले ही झारखंड में हैं. वे कहती हैं कि पेपर लीक कानून पास करने की सरकार की प्रतिक्रिया सिस्टम ठीक करने से ज्यादा सजा पर केंद्रित है.

“अगर आप पेपर लीक रोकना चाहते हैं तो एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) जैसी एजेंसी, जो पूरी तरह अपारदर्शी तरीके से काम करती है, को या तो खत्म करना होगा या उसे वैधानिक संस्था बनाना होगा. उसकी जवाबदेही तय करनी होगी.”

रांका भी यही राय रखते हैं. “आप पेपर लीक के बाद होने वाली हर चीज पर चर्चा कर रहे हैं... फास्ट-ट्रैक कोर्ट, कड़ी सजा, जुर्माना. लेकिन आपने अब भी यह नहीं बताया कि इसे रोकने के लिए आप क्या कर रहे हैं.”

कारण और असर
पहला ‘कॉकरोच कॉन्क्लेव’ वह क्षण भी है, जब सीजेपी अपने सामने खड़ी एक ढांचागत दुविधा से टकरा रही है: क्या वह खुद को टिकाए रख सकती है? चुनाव विशेषज्ञ यशवंत देशमुख के लिए यह सवाल सीजेपी से भी बड़ा है.

वे जयप्रकाश नारायण (संपूर्ण क्रांति), वी.पी. सिंह (भ्रष्टाचार-विरोध) और अण्णा हजारे (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) का हवाला देते हुए कहते हैं, “हर दशक में, हर आंदोलन के दौरान, हमेशा एक नेता होता था, एक चेहरा जिसके इर्द-गिर्द लोग जुटते थे.” वे दलील देते हैं कि इसके बिना “भीड़ बस किसी मुद्दे के लिए जमा होती है और फिर बिखर जाती है.”

प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बाद हुए सी-वोटर स्नैप पोल से संकेत मिलता है कि ऐसे किसी चेहरे के लिए जगह है, लेकिन सीजेपी उस रास्ते पर नहीं जा रही. युवाओं में सबसे लोकप्रिय नेता की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब भी 39.8 फीसद के साथ आगे हैं जबकि कांग्रेस के राहुल गांधी को 28 फीसद समर्थन है.

जहां तक सीजेपी की बात है, करीब 50 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि वे अन्य मुद्दों पर भी उसका समर्थन करेंगे. हालांकि भाजपा को यह सीखना बाकी था कि सिर्फ लोकप्रिय अपील लोगों के गुस्से से बचाने के लिए काफी नहीं होती.

देशमुख कहते हैं, “हमारे पोल ने दिखाया कि 70 फीसद लोग इस्तीफे की मांग कर रहे थे. यह भावना करीब दो महीने पहले ही बन चुकी थी. सरकार मुगालते में थी, यह सोचते हुए कि वह इसे संभाल लेगी. वे बस अहंकार दिखा रहे थे.”

तो फायदा किसे?
इस बीच एक सवाल यह उठा है कि सीजेपी के उभार से आखिर फायदा किसे होगा. देशमुख का तर्क है कि यह सवाल उतना ही अहम साबित हो सकता है, जितना यह कि सीजेपी खुद क्या बनती है. वे अण्णा आंदोलन का हवाला देते हैं, जिसका फायदा अंततः दिल्ली में आम आदमी पार्टी को और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को मिला.

वे कहते हैं कि हर राजनैतिक सिस्टम अंततः लोगों की शिकायतों को व्यक्त करने के लिए कोई न कोई चेहरा खोज ही लेता है. “मिसाल के लिए, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को कुछ महीने पहले तक खारिज किया जा रहा था और अब अचानक जीत की ओर चलती दिख रही है, या तमिलनाडु में अभिनेता विजय युवाओं की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.”

हालांकि थिंक-टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के राहुल वर्मा अण्णा आंदोलन की तुलना में एक अहम फर्क बताते हैं. वे कहते हैं कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आइएसी) एक मौजूदा इकोसिस्टम पर खड़ा था, जिसमें एनजीओ और एक्टिविस्ट शामिल थे.

“मेधा पाटकर, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, इन सबके अपने संगठन थे. सीजेपी के पास सिर्फ एक इंस्टाग्राम पेज था.”

फिर ठीक ही है कि चुनाव लड़ना अभी सीजेपी के एजेंडे में नहीं है. दीपके कहते हैं, “अगर लोग कहेंगे तो हमें इस पर विचार करना होगा. लेकिन फिलहाल हमारी ऐसी कोई योजना नहीं है.” यह लाइन पहले भी सुनी जा चुकी है.

कभी दीपके के रोल मॉडल रहे आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल की भी राजनीति में आने की कोई योजना नहीं थी. अब देखना होगा कि यह ‘प्रेशर ग्रुप’ वैसा ही रहता है, या फिर मैदान में उतरता है.

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