किफायती घर के लिए अब कहां जाएं
शहरी भारत में लगभग एक करोड़ सस्ते घरों की दरकार होने के बावजूद प्राइवेट डेवलपर तेजी के साथ इस सेग्मेंट से बाहर निकलते जा रहे. सस्ते घर बनाने में अब उन्हें खास फायदा नहीं दिखता. फंस गए जरूरतमंद जिन्हें रहने को ठिकाना नहीं मिल पा रहा.

हरियाणा के सोहना में सिग्नेचर ग्लोबल का द सेरेनाज अपार्टमेंट
पद्मश्री विनोद 1998 में त्रिशूर से मुंबई आई थीं. 48 साल की विनोद एक स्कूल टीचर हैं. कुर्ला में किराए के फ्लैट में जाने से पहले वे अंधेरी के पास काजूपाड़ा की एक साधारण-सी चाल में करीब दो दशक तक रहीं. उनको उम्मीद थी कि कुछेक साल में अपना घर खरीद लेंगी. उन्होंने एक बेडरूम का फ्लैट देखना शुरू किया.
लेकिन मुंबई में सबसे सस्ता विकल्प भी 1.2 करोड़ रुपए का था. उन्होंने नवी मुंबई में भी घर तलाशा, जहां महाराष्ट्र सरकार की टाउन प्लानिंग एजेंसी, सिडको तलोजा, द्रोणागिरि, खारघर और कलंबोली में सस्ते घर बना रही थी. पर वे घर भी उनकी हैसियत से बाहर थे.
वे कहती हैं, ‘‘लोकेशन, साइज और कीमत देखने के बाद हमें पता चला कि कुल कीमत उतनी ही बैठती थी जितने में कुछ प्राइवेट डेवलपर दे रहे थे. अफोर्डेबल (किफायती) शब्द बस एक दिखावा है.’’
उनके जैसे लाखों शहरी भारतीय घर का सपना तो देखते हैं पर उनकी कीमतें उनके बूते से बाहर होती हैं. उनके पास कुछ ही विकल्प बचते हैं: या तो वे खराब ढांचे और कम सुविधाओं वाली पुरानी इमारतों में रहें या किराए की चालों में, या फिर शहर के बाहरी इलाकों में चले जाएं और रोजाना लंबे सफर के कष्ट झेलते रहें.
रियल एस्टेट सलाहकार फर्म नाइट फ्रैंक के अनुसार शहरी भारत में लगभग एक करोड़ किफायती घरों की कमी है—सरकार की परिभाषा के अनुसार ये वे घर हैं जिनकी कीमत 45 लाख रुपए तक हो और जिनका कारपेट एरिया मेट्रो शहरों में 60 वर्ग मीटर और गैर-मेट्रो शहरों में 90 वर्ग मीटर तक हो. फासला बढ़ता ही जा रहा है.
सख्त जरूरत के बावजूद सस्ते घरों का मामला खराब योजना और नीतिगत उदासीनता की कहानी है. किफायती घरों का दायरा बढ़ाने के मकसद से सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (पीएमएवाइ-यू) जैसी बड़ी योजनाएं शुरू की हैं. इसके बावजूद ये योजनाएं बढ़ती मांग को पूरा करने में नाकाफी रही हैं.
विश्व बैंक के अनुमान बताते हैं कि 2014 और 2024 के बीच भारत की शहरी आबादी में करीब 23 फीसद का इजाफा हुआ, जबकि इसका वैश्विक औसत 8.4 फीसद था. आज 37 फीसद भारतीय शहरी इलाकों में रहते हैं.
पलायन और मौजूदा शहरों के विस्तार के कारण 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 40 फीसद हो जाने का अनुमान है. फिर भी कम और मझोली आमदनी वाले समूहों और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए घरों की सप्लाइ उतनी नहीं बढ़ी जितनी मांग बढ़ी है.
यूएन-हैबिटाट की वर्ल्ड सिटीज रिपोर्ट 2026—‘द ग्लोबल हाउसिंग क्राइसिस: पाथवेज टु ऐक्शन’—में बड़े शहरों में किफायती घरों की भारी किल्लत की बात कही गई है.
नाइट फ्रैंक के अनुसार, भारत के आठ सबसे बड़े शहरों—मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलूरू, कोलकाता, चेन्नै, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद—में 2018 में नए घरों की सप्लाइ में किफायती घरों की हिस्सेदारी लगभग 52 फीसद थी, जो 2026 तक घटकर 15 फीसद रह गई.
वहीं, एक करोड़ रुपए और उससे महंगे घरों की हिस्सेदारी 14 फीसद से बढ़कर 62 फीसद से ज्यादा हो गई.
अगर आंकड़ों में बात करें तो इन आठ शहरों में 2026 की पहली छमाही में शुरू किए गए कुल 1,87,350 घरों में से सिर्फ 28,102 घर ही सस्ती श्रेणी के थे. लॉन्च किए गए 1,16,157 मकानों में से ज्यादातर 1 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत के थे, जबकि 43,090 घर 50 लाख रुपए से 1 करोड़ रुपए की रेंज में थे.
शहरी भारत पहले से ही 96 लाख सस्ते मकानों की कमी झेल रहा है, और इस साल देश में ऐसे सिर्फ 56,000 घर बनने की उम्मीद है, जिससे यह कमी लगभग 95.4 लाख घरों की बनी रहेगी. नाइट फ्रैंक ने यह भी बताया है कि इन आठ शहरों में सप्लाइ और मांग का अनुपात 2019 में 1.05 था, जो 2025 में गिरकर मात्र 0.36 रह गया.
प्राइवेट सेक्टर ने तोड़ा नाता
इसका मतलब यह नहीं कि इस बारे में कोई गंभीर प्रयास ही नहीं किए गए. मगर चुनौती जितनी बड़ी थी, उसके मुकाबले ये कोशिशें बहुत ही कम थीं या फिर उनमें लंबी अवधि की प्लानिंग और इस पर लगातार अमल की कमी थी. पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सस्ते घरों की सप्लाइ बढ़ाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं.
मसलन, 2015 में शुरू की गई पीएमएवाइ-यू 1.0 योजना के तहत देश भर में शहरी गरीबों और मध्य वर्ग को 99 लाख घर बनाकर दिए गए. इस योजना में होम लोन पर शुरू में ही ब्याज सब्सिडी दी गई, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, कम आय वाले समूहों और मझोली आमदनी वाले तबकों के लिए मासिक किस्त का भुगतान करना आसान हो जाए.
हालांकि इसमें भी चुनौतियां रहीं, जैसे अमल में देरी और झुग्गी-बस्ती पुनर्वास में बाधाएं, फिर भी इस कार्यक्रम को—जिसका पहला चरण मार्च 2022 में खत्म हुआ—आम तौर पर सफल माना जाता है. इसके बाद केंद्र सरकार ने 2024-29 के लिए पीएमएवाइ-यू 2.0 शुरू की, जिसमें किस्त आधारित व्यवस्था के जरिए होम लोन पर ब्याज सब्सिडी दी जाती है जिससे लंबे समय तक लोन चुकाना आसान हो सके.
लेकिन ये उपाय पर्याप्त नहीं रहे हैं. हीरानंदानी समूह के अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी कहते हैं, “पीएमएवाइ योजना इस क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है.” किफायती घरों की कमी का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी के जरिए पूरा किया जा सकता था लेकिन कई कारणों से धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी घटती गई.
इन कारणों में शहरी जमीन नहीं मिलना या उसका महंगा होना, निर्माण की लागत में तेज इजाफा, कम मार्जिन और नियामक की बाधाएं शामिल हैं जिन्होंने लागत बढ़ाई और परियोजनाओं में देर की. पूर्व तकनीकी उद्यमी और अफोर्डेबल हाउसिंग वेंचर-वैल्यू ऐंड बजट हाउसिंग कॉर्पोरेशन (वीबीएचसी) के संस्थापक जेरी राव कहते हैं, “सस्ते मकान प्राइवेट डेवलपरों के लिए नहीं हैं.
हमारी सरकारें उस क्षेत्र की मदद में दिलचस्पी नहीं लेतीं. हमें उतनी ही मंजूरियां लेनी पड़ती हैं जितनी प्रीमियम घर के लिए होती हैं, और लागत भी उतनी ही है, देर भी उनके जितनी ही है. आपूर्ति के लिहाज से किफायती आवासों के लिए कोई मदद नहीं. रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) ने मदद नहीं की. बस उसने अनुमोदन की एक और परत जोड़ दी है.”
इसमें ताज्जुब नहीं कि कई डेवलपर जो कभी किफायती मकानों पर ध्यान देते थे, वे या तो इस क्षेत्र से बाहर निकल गए हैं या प्रीमियम परियोजनाओं की ओर बढ़ गए हैं. राव कहते हैं, “वीबीएचसी की सभी नई 6-7 परियोजनाएं एक करोड़ रुपए की हैं.”
टाटा हाउसिंग, जिसने 17 शहरों में 27 किफायती आवास परियोजनाएं पूरी की हैं, का कहना है कि वह भविष्य में मध्य, प्रीमियम और लक्जरी सेगमेंट में विकास करेगी. नाइट फ्रैंक इंडिया के वरिष्ठ कार्यकारी निदेशक गुलाम जिया कहते हैं, “पिछले 4-5 वर्षों में जब से हाउसिंग सेग्मेंट का मिड से अपर एंड चमका-दमका है, अधिकांश निजी डेवलपर सस्ते मकानों से दूर चले गए हैं क्योंकि मिड और अपर एंड सेग्मेंट में बेहतर मार्जिन है.”
विडंबना है कि रियल एस्टेट सेक्टर तो सालाना 10 फीसद से ज्यादा की दर से बढ़ रहा है, वहीं किफायती आवास डेवलपरों की प्राथमिकता सूची से गायब हो रहे हैं.
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत रेरा की सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य अभय उपाध्याय कहते हैं, “कीमतों को देखा जाए तो खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर में एक बड़ी आबादी मकान खरीदने की स्थिति में नहीं है. अफोर्डेबल हाउस के नाम पर जो प्रोजेक्ट आए भी उनमें एरिया कम कर दिया गया और ये लोगों को पसंद नहीं आ रहे.
आज की तारीख में 36 लाख या 60 लाख रु. में चिड़िया के घोंसले जैसा घर कोई नहीं लेगा. मध्यवर्ग के जेन-जी या आज के युवा जो माता-पिता के छोटे घर में पले-बढ़े हैं, उतना छोटा मकान खुद नहीं खरीदना चाहते. बिल्डर कीमत घटाने के लिए एरिया पर कंप्रोमाइज कर रहे हैं जिससे अफोर्डेबल मकान अव्यावहारिक हो गए हैं.
जमीन और बिल्डिंग मटीरियल की कीमत बढ़ी है. ऐसे में सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें अफोर्डेबल मकान का एरिया कंप्रोमाइज न हो और बिल्डर का प्रॉफिट मार्जिन भी लग्जरी प्रोजेक्ट के मुकाबले कम रखा जाए.”
महंगी जमीन
किफायती आवास में गिरावट की सबसे बड़ी वजहों में शामिल है शहरी जमीन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और महामारी के बाद निर्माण लागत में 25-30 फीसद का उछाल. इसने डेवलपरों के मार्जिन को दबा दिया है. हीरानंदानी कहते हैं, “जमीन की कीमतें उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी हैं. यह एक चुनौती है.”
बोझ और बढ़ाते हुए घर की लागत का करीब आधा हिस्सा सरकारी शुल्कों में चला जाता है. वे जोड़ते हैं, “मसलन, अगर मैं कोई प्रॉपर्टी 60,000 रु. वर्ग फुट पर बेच रहा हूं, तो उसमें से 30,000 रु. तक सरकार को स्टांप ड्यूटी, डेवलपमेंट चार्ज, सेस, जीएसटी आदि के रूप में चले जाते हैं. इससे आवास का ऐसा सेग्मेंट बनता है, जो उन लोगों के लिए किफायती नहीं रह जाता, जिन्हें जरूरत है.”
2025 की नाइट फ्रैंक रिपोर्ट कहती है कि मुंबई, बेंगलूरू, दिल्ली और चेन्नै जैसे महानगरों में सस्ते घरों लिए जमीन खरीदना ऊंची कीमतों के कारण आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं. इसलिए डेवलपर शहर के बाहरी इलाकों की ओर चले गए हैं, जहां जमीन सस्ती है, लेकिन अक्सर शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ाव कमजोर होता है.
मसलन, मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन में कई किफायती आवास परियोजनाएं पालघर, कर्जत और वसई-विरार में हैं—जो कारोबारी केंद्रों से तीन घंटे तक की दूरी पर हैं. लंबा और महंगा सफर इन घरों की कम कीमत के बावजूद उनका आकर्षण कम कर देता है.
देरी लागत को और बढ़ाती है. टाटा हाउसिंग के एमडी और सीईओ संजय दत्त कहते हैं, “समस्या यह है कि जमीन खरीदने से लेकर विकास शुरू करने तक में ही दो से तीन साल लग जाते हैं. निर्माण में और दो से तीन साल लगते हैं, परियोजना को रहने लायक बनने में एक-दो साल और लगते हैं, और बीच में आर्थिक चक्र, कोविड, युद्ध जैसी बाधाएं वगैरह आती हैं, जो परियोजना में और देरी कर देती हैं.”
जब तक घर खरीदारों तक पहुंचते हैं—अगर पहुंचते हैं—वे अक्सर कई साल देर से पहुंचते हैं. “सीधी-सी बात है, डेवलपर किफायती घर बनाने के कारोबार में नहीं, वे मुनाफे वाले घर बनाने के कारोबार में हैं. अगर वे सस्ते घर बनाते भी हैं, तो पूरी होते-होते परियोजनाएं लग्जरी बन जाती हैं.
यह लगातार चलता चक्र है, कोई वास्तव में इस पहलू को नहीं देख रहा, जबकि हर कोई इसकी बात करता है.” दत्त के मुताबिक, मुंबई में एक करोड़ रुपए का घर भी लागतों को देखते हुए अब भी “सस्ता” है. वे जोड़ते हैं, “सरकार तो वैसे भी 50 फीसद ले जाती है. आपके पास बाकी 50 फीसद बचता है, जिसमें से आप 15 फीसद रिटर्न बनाते हैं.”
विशेषज्ञ कहते हैं कि समस्या किफायती आवास योजनाओं के डिजाइन में भी है. दत्त कहते हैं, “यह डिजाइन बेतरतीब और निजी नियंत्रण में है. यह बोली प्रक्रिया पर चलता है, जहां प्लॉट स्वाभाविक रूप से और डिजाइन के हिसाब से सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को मिता है.” उनका तर्क है कि डेवलपर जमीन के लिए जो ऊंची कीमत देते हैं, उसे प्रीमियम कमर्शियल या आवासीय परियोजना बनाकर ही वाजिब ठहराया जा सकता है.
एक और वजह डेवलपरों के लिए बदलती अर्थव्यवस्था है. निजी बिल्डर प्रीमियम और लग्जरी परियोजनाओं पर 25-30 फीसद मुनाफा कमाते हैं, जबकि किफायती आवास पर यह सिर्फ 10-12 फीसद होता है. किफायती आवास में स्विमिंग पूल और जिम जैसी कमाई बढ़ाने वाली सुविधाओं या “तामझाम” की कम गुंजाइश होती है.
राव कहते हैं, “डेवलपरों के नजरिए से किफायती आवास में मार्जिन बेहद कम है, और बिक्री की रफ्तार में जरा-सी गिरावट भी मार्जिन को और चोट पहुंचा सकती है. साथ ही, ओवरहेड लागत वही रहती है. इसलिए इस कारोबार में बने रहने के लिए बहुत कम प्रोत्साहन है.”
किफायत की पुरानी पड़ चुकी परिभाषा ने इस अर्थशास्त्र को और दबाव में डाल दिया है. सरकार ने “किफायती” घर की कीमत सीमा 2017 से 45 लाख रुपए पर ही रखी है. इस बीच जमीन की बढ़ती कीमतों और निर्माण, श्रम तथा अनुपालन लागत में उछाल के कारण शहरों के बाहरी इलाकों में बने बुनियादी घर भी अक्सर इस सीमा को पार कर जाते हैं. डेवलपरों का कहना है कि यह सीमा बाजार की वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाई है.
नियामकीय भूलभुलैया
एक और बड़ी बाधा है नियमन. निर्माण शुरू होने से पहले डेवलपरों को कई तरह की मंजूरियां लेनी पड़ती हैं—भूमि उपयोग परिवर्तन, पर्यावरणीय मंजूरी, जोनिंग अनुमति, स्ट्रक्चरल सर्टिफिकेशन और यूटिलिटी कनेक्शन. ये मंजूरियां अक्सर सरकार के अलग-अलग स्तरों पर कई विभागों के हाथ में होती हैं, जिससे प्रक्रिया धीमी, अपारदर्शी और असंगत हो जाती है.
कई राज्यों में शुरू किए गए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम का उद्देश्य प्रक्रिया को आसान बनाना है. हालांकि ये सिस्टम अक्सर ठीक से एकीकृत नहीं हैं, आंशिक रूप से डिजिटाइज्ड हैं और अब भी मैनुअल हस्तक्षेप पर निर्भर हैं, जो प्रगति को धीमा कर देता है. दत्त कहते हैं, “कई राज्यों में ऐसी योजनाएं हैं, जिनमें अगर आप बड़ा विकास करना चाहते हैं तो आपको कुछ सस्ते आवास बनाने होते हैं लेकिन उनका सही नियमन नहीं होता.
इसका मतलब है कि इन घरों की सप्लाइ समय पर नहीं हो पाती.” इनमें से कोई भी चीज उत्पाद की गुणवत्ता, आखिरी छोर की कनेक्टिविटी, सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्कूलों और अस्पतालों को ध्यान में रखकर डिजाइन नहीं की जाती. वे जोड़ते हैं, “ये ऐसी जगहों पर बनाए जाते हैं, जहां पहुंच खराब होती है और रहने लायक होने का सूचकांक कमजोर होता है. अगर ये बन भी जाएं, तो उद्देश्य पूरा नहीं करते.”
सस्ते घरों में संस्थागत निवेश की कमी भी बड़ी कमजोरी है. इस सेग्मेंट में बड़े संस्थागत निवेशकों, बड़े पैमाने के डेवलपरों और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं की भागीदारी बहुत कम रही है. इसके बजाय इस क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों का बड़ा हिस्सा छोटे और स्थानीय डेवलपर चलाते हैं, जिन्हें आम तौर पर फंडिंग, परियोजना क्रियान्वयन और नियामकीय मानकों का पालन करने में सीमाएं झेलनी पड़ती हैं, नाइट फ्रैंक अध्ययन कहता है.
परियोजना मंजूरियों और विकास क्लीयरेंस में लंबा समय लगना बिल्डरों पर बड़ा वित्तीय बोझ डालता है, जिससे कम मार्जिन वाली परियोजनाओं में निवेश हतोत्साहित होता है.
इसके अलावा, भारत में पूंजी की लागत बहुत ज्यादा है, और उसके बाद ऊंचे टैक्स आते हैं. दत्त कहते हैं, “हमने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की बात की है लेकिन कारोबार करने की लागत बहुत ज्यादा है.” कई लोगों का कहना है कि रियल एस्टेट सेक्टर में कई निहित स्वार्थ हैं क्योंकि कारोबार की प्रकृति ही ऐसी है.
वे कहते हैं, “राज्य और केंद्र सरकारें अपनी शक्ति को ऐसे भुनाती हैं कि उस तक सिर्फ अमीर और प्रभावशाली लोग ही पहुंच पाते हैं. हम हर दरवाजा बंद कर रहे हैं और फिर पूछ रहे हैं: हम किफायती विकास क्यों नहीं कर पा रहे?”
नीतिगत नुस्खा
दत्त मानते हैं कि इस क्षेत्र की क्षमता खोलने की चाबी सरकार के पास है. केंद्र और राज्य सरकारों के स्वामित्व वाली विशाल जमीनों को भुनाने के लिए गंभीर प्रयास करना होगा. वे कहते हैं, “मुंबई में पोर्ट ट्रस्ट की 18,000 एकड़ जमीन है. धारावी की 350 एकड़ जमीन थी. रेलवे और रक्षा विभाग की काफी जमीन है.
इनमें से किसी भी संस्था को किफायती घरों के बारे में कुछ करने का निर्देश नहीं दिया गया है.” इसके अलावा, सरकारों को अपनी शहर विकास योजनाओं में कुछ जगहों को किफायती आवास या मास हाउसिंग के लिए आरक्षित घोषित करना होगा, नाइट फ्रैंक के जिया कहते हैं, “स्कूलों, अस्पतालों और नागरिक सुविधाओं के लिए भूमि आरक्षण होता है.
अगर सामाजिक समानता बनाए रखने के लिए किफायती आवास इतना जरूरी है, तो सरकार कुछ जमीन सिर्फ किफायती आवास के लिए क्यों नहीं चिह्नित करती?” मुंबई जैसे जमीन की कमी वाले शहरों में यह मुश्किल हो सकता है. इसलिए रेलवे और डिफेंस जैसी केंद्रीय एजेंसियों के पास पड़ी कम इस्तेमाल वाली जमीन को खोलना जरूरी हो जाता है.
एक और समाधान है शहरों और दूरदराज के इलाकों के बीच कनेक्टिविटी सुधारना. मसलन मुंबई में अगर लोग वसई, विरार, पनवेल या कर्जत से एक घंटे के भीतर आ-जा सकें, और इसके साथ किफायती परिवहन तथा बेहतर सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर हो, तो आवास संकट का एक हिस्सा हल किया जा सकता है.
आज कई लोग बहुत खर्च करके भीड़भाड़ भरी स्थितियों में दो घंटे से ज्यादा सफर करते हैं. विशेषज्ञ एक प्रभावी समुद्री परिवहन नेटवर्क की जरूरत पर भी जोर देते हैं. पीएमएवाइ-यू ने ब्लू-कॉलर अर्थव्यवस्थाओं में बेहतर काम किया है, जहां मुख्य इनपुट—जमीन—तुलनात्मक रूप से सस्ती है.
दत्त कहते हैं कि व्हाइट-कॉलर सर्विसेज सेक्टर, जो ज्यादातर महानगरों और टियर-2 शहरों में केंद्रित है, विकास का बड़ा चालक रहा है, लेकिन यह योजना वहां उतनी अच्छी तरह काम नहीं कर पाई. जहां भी मैन्युफैक्चरिंग या सर्विसेज हैं, वहां किफायती परिवहन, दूरदराज क्षेत्रों से कनेक्टिविटी और पर्याप्त सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ 30-40 साल का मास्टर प्लान होना चाहिए.
हीरानंदानी का मानना है कि सरकार को प्रत्यक्ष मूल्य समर्थन भी देना चाहिए. वे कहते हैं, “किसी तरह की सब्सिडी दी जानी चाहिए, जैसे महामारी के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने स्टांप ड्यूटी और डेवलपमेंट चार्ज में रियायतें दी थीं.” लेकिन यह समाधान का सिर्फ एक हिस्सा है; सस्ते घर अकेले सफल नहीं हो सकता.
इसे व्यापक शहरी विकास का हिस्सा होना चाहिए. शहरों को सिर्फ घर नहीं, बल्कि किफायती लाइफस्टाइल भी देनी होगी. दत्त कहते हैं, “यह ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां एक डिलिवरी बॉय या कैब ड्राइवर—जो आधुनिक शहरी जीवन के लिए बेहद जरूरी हैं—स्वच्छ नाश्ता भी कर सके.” वे सिंगापुर का उदाहरण देते हैं, जहां सड़क पर बिकने वाले भोजन की गुणवत्ता होटलों जैसी होती है.
सस्ते घर डेवलपरों के लिए दिखावे की चीज नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की जरूरत है. जब तक किफायती आवास शहरी योजना के केंद्र में नहीं आएगा, विकसित भारत का वादा पहुंच से बाहर रहेगा.