कोडीन का किला

मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में कोडीन वाले अवैध कफ सिरप की बड़ी खेपें पकड़ी जा रहीं. नशे की इस मार ने पूरे इलाके को अंदर तक झकझोर कर रख दिया है

मध्य प्रदेश में कोडीन के साथ पकड़े गए आरोपी
मध्य प्रदेश में कोडीन के साथ पकड़े गए आरोपी

रीवा के कबाड़ी मोहल्ले में शाम होने वाली है. लोग काम से घर लौट रहे हैं. पर अंधेरा गहराते ही गलियों में छोटे-छोटे समूह जमा होने लगते हैं. हम ऐसे ही एक समूह के पास पहुंचते हैं और अंधेरे में खड़ी एक महिला से कफ सिरप की छह बोतलें मांगते हैं. वह शक भरी नजरों से देखती है, जैसे तौल रही हो कि हम ग्राहक हैं या पुलिस के आदमी. फिर कहती है, “कल आना, 3,000 रुपए लेकर,” और बिना कोई भरोसा दिए चली जाती है. शहर में कबाड़ी कॉलोनी को कफ सिरप बेचने वालों का अड्डा माना जाता है.

कभी विंध्य प्रदेश की राजधानी रहे रीवा में आपका स्वागत है. 1956 में यह क्षेत्र मध्य प्रदेश का हिस्सा बना. आज अधिकारी इसे राज्य की ‘कोडीन राजधानी’ कहते हैं. रीवा और आसपास के सतना, सीधी, सिंगरौली, मऊगंज और मैहर जिलों में पिछले कुछ वर्षों में कोडीन-आधारित कफ सिरप के दुरुपयोग और लत के मामले तेजी से बढ़े हैं. कोडीन फॉस्फेट वाले कफ सिरप की मांग इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह नशा देता है. करीब 100 मिलीलीटर सिरप 24 से 36 घंटे तक असर कर सकता है.

पुलिस ने पहली जनवरी, 2025 से 31 मई, 2026 के बीच रीवा संभाग के छह जिलों से 84,547 बोतलें जब्त कीं, जिनकी कीमत 1.01 करोड़ रुपए थी. एनडीपीएस ऐक्ट के तहत 685 लोगों को गिरफ्तार किया गया. पिछले साल रीवा के श्याम शाह मेडिकल कॉलेज में इस सिरप के करीब 2,000 नशेड़ियों का इलाज हुआ. समस्या इतनी गंभीर है कि पुलिस ने इसे रोकने के लिए ‘ऑपरेशन प्रहार’ शुरू किया है. मई के आखिर में भोपाल में स्पेशल टास्क फोर्स ने 73,000 बोतलों की बड़ी खेप पकड़ी. यह खेप भी विंध्य क्षेत्र भेजी जा रही थी.

सवाल है कि विंध्य में यह नशा इतना क्यों फैला? रीवा के आइजी गौरव राजपूत एक बड़ी वजह इसकी उत्तर प्रदेश की लंबी सीमा से बेलगाम सप्लाइ को मानते हैं. दवा नियंत्रक का दफ्तर इसके दुरुपयोग को रोकने की मुख्य जिम्मेदार एजेंसी है लेकिन अंतरराज्यीय मामला होने के कारण निगरानी और नियंत्रण की समस्या है. राजपूत कहते हैं, ‘‘पिछले कुछ महीनों से हम यूपी की एक एसटीएफ के साथ काम कर रहे हैं जो कि अपने क्षेत्र में भी इस पर कार्रवाई कर रही है. ’ ’

मांग के हिसाब से देखा जाए तो जानकार रीवा में खांसी के सिरप के इतना लोकप्रिय होने की दिलचस्प वजह बताते हैं. यहां समाज में जाति और वर्ग की भावना अभी भी अहम भूमिका निभाती है; उन जातियों में शराब पीना बुरा माना जाता है जो मेहनतकश नहीं हैं. कफ सिरप से कोई बदबू नहीं आती और बाहर से देखने पर नशा करने वाला सज्जन लगता है. इससे कई लोग दिन में भी टुन्न रहते हैं और उनके उन कामों पर भी कोई असर नहीं पड़ता जिनमें बहुत एकाग्रता की जरूरत नहीं. इस बारे में कोई स्टडी भले न हो लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह काफी प्रचलित है.

रीवा के बदलते चेहरे ने भी समस्या को जटिल बनाया है. 1990 के दशक तक शहर में यात्री रेल लाइन नहीं थी. आज बेहतर रेल संपर्क है, पिछले साल हवाई अड्डा भी जुड़ गया. पड़ोसी सिंगरौली खनिज-आधारित उद्योगों और बिजली उत्पादन इकाइयों की वजह से मध्य भारत की ‘पावर कैपिटल’ कहलाने लगा है. विकास की चमक रीवा तक आई है. लेकिन समृद्धि के साथ नशे जैसी सामाजिक बीमारियां भी बढ़ी हैं.

रीवा में अब फ्लाइओवर, ब्रांडेड होटल और मॉल हैं जिनकी एक दशक पहले तक कल्पना नहीं की जा सकती थी. जिंदगी की तरंग खत्म होने के साथ नशे जैसी खराब आदतें बढ़ गईं. उपमुख्यमंत्री और रीवा के विधायक राजेंद्र शुक्ल कहते हैं, “हमें कफ सिरप की सप्लाइ रोकनी ही होगी. अगर इसे अभी नहीं थाम गया तो अगली पीढ़ी रीवा की समृद्धि का फायदा नहीं उठा पाएगी.”

सप्लाइ चेन
पुलिस जांच में एक ऐसे लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का पता चला है जिसे वैध कारोबार से अलग करना बहुत मुश्किल है. जब्त सिरप का बड़ा हिस्सा बद्दी और हरिद्वार की दवा इकाइयों में बना था. प्लांट से माल स्टॉकिस्ट खरीदते हैं. स्टॉक रखने का लाइसेंस मिलना मुश्किल नहीं. स्टॉकिस्ट तक पहुंचने के बाद अवैध माल पेडलर उठा लेते हैं. कागजों में दिखाया जाता है कि सिरप रिटेलर को जा रहा है, लेकिन बोतलें दुकान तक पहुंचती ही नहीं.

23 जून को भोपाल निवासी राहुल कुशवाहा की केरल के तिरुवनंतपुरम से गिरफ्तारी ने इस नेटवर्क को और स्पष्ट किया. वह भोपाल के गांधी नगर में पकड़ी गई अवैध कफ सिरप फैक्टरी मामले में फरार था. वहां से ‘ओनेरेक्स’ की करीब 50,000 और ‘ऑफ-कफ’ की 23,125 बोतलें मिली थीं. दस लोग गिरफ्तार हुए और पैकेजिंग तथा रीसीलिंग की मशीनें भी जब्त हुईं.

आरोपियों ने लेबल हटा दिए थे और बैच नंबर मिटाकर सामग्री की रीपैकेजिंग करते थे. एमपी एसटीएफ, भोपाल के पुलिस अधीक्षक राजेश भदौरिया कहते हैं, ‘‘बैच नंबर मिटाने से यह पक्का हो जाता था कि स्टाक से मैन्युफैक्चरर का सुराग न मिले. नमूने लैब भेजे गए हैं क्योंकि शक है कि असर बढ़ाने के लिए सिरप में दूसरे नशीले पदार्थ मिलाए गए थे. मास्टरमाइंड तक सुराग न पहुंचे इसलिए इस धंधे में शामिल सभी लोगों ने एक-दूसरे से अलग रहकर काम किया.

ताबड़तोड़ कार्रवाई
मध्य प्रदेश पुलिस अब सख्ती बढ़ा रही है. एनडीपीएस ऐक्ट, ड्रग्स ऐंड कॉस्मेटिक्स ऐक्ट और संगठित अपराध से जुड़ी बीएनएस की धारा 111 तक लगाई जा रही है. रीवा के कुख्यात तस्कर बुच्ची साहू और प्रिंस दुबे एक साल से जेल में हैं. विडंबना देखिए, इस धंधे से जुड़े लोग बताते हैं कि जब धरपकड़ तेज हो जाती है तो मुनाफा बढ़ जाता है. कम सप्लाइ के दिनों में रीवा में बोतल 1,000 रुपए तक बिक जाती है.

इस धंधे में मुनाफा बेहिसाब है. कुछ साल पहले सड़कछाप पेडलर रहे बुच्ची के पास अब कथित रूप से दो मकान और सात प्लाट हैं. पुलिस अब उसके खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉंड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत आरोपियों की संपत्तियां जब्त करने की तैयारी भी कर रही है.

बहरहाल, इस इलाके में परिवार टूट रहे हैं और सैकड़ों नशेड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं. आइजी राजपूत कहते हैं कि वे अपनी तरफ से पूरे प्रयास कर रहे हैं लेकिन स्वीकार करते हैं कि इसमें बहुत सारे मुद्दे शामिल हैं. उनके शब्दों में, ‘‘जब तक समाज के भीतर मांग बनी रहेगी, सप्लाइ को 100 फीसदी रोकना मुश्किल होगा. ’ ’ विंध्य क्षेत्र की बात करें तो कफ सिरप की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका नशा करने वाला पकड़ा नहीं जाता. जब गंध ही नहीं आती तो नशेड़ी को पकड़ा कैसे जाएगा.

इन्हें पहचानने का तरीका कबाड़ी मोहल्ले के पास एक चायवाला बताता है: “कफ सिरप का नशेड़ी चाय में ढेर सारी चीनी मांगता है. खड़े चम्मच की चाय पीते हैं.” यानी इतनी चीनी कि चम्मच कप में खड़ी रह जाए. ओपिऑयड और चीनी, दोनों दिमाग के रिवॉर्ड सेंटर को सक्रिय करते हैं जिससे डोपामाइन और एंडोर्फिन रिलीज होता है और इंसान नशे की तरंग में चला जाता है. यही है नशेड़ी की जिंदगी का कड़वा-मीठा सच.

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