ईंधन से उठती चिनगारी

भारत में ई20 पेट्रोल चलन में आ जाने के बाद अब मोटरचालक माइलेज गिरने और इंजन में समस्या आने की बातें कह रहे

इस साल अप्रैल से ई20 मानक पेट्रोल के तौर पर देश भर में बिक रहा

बिहार के यूट्यूबर मनीष कश्यप ने हाल में दावा किया कि ई20 ईंधन पर चलने के कारण उनकी नई टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस के इंजन में खराबी आ गई और कंपन होने लगा. उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने बाद में उनके वारंटी दावे को खारिज कर दिया. एक्स पर व्यापक रूप से शेयर की गई एक और पोस्ट एक कार मालकिन की थी, जिसने कहा कि उन्हें उस वाहन को 'नष्ट करने के लिए मजबूर किया जा रहा' जिसे लेने को उन्होंने 'खासे पापड़ बेले'. उनका आरोप था कि ई20 ईंधन ने कार की एअरकंडिशनिंग के प्रदर्शन पर असर डाला और माइलेज तेजी से घटा दिया.

अप्रैल में केंद्र सरकार के ई20 पेट्रोल—20 फीसद इथेनॉल और 80 फीसद पेट्रोल का मिश्रण—को पूरे भारत में बिकने वाला मानक ईंधन बना देने के बाद ऐसी शिकायतें कई गुना बढ़ गईं. गन्ने, मक्का और दूसरे अनाजों के फर्मेंटेशन से बनने वाले इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाता है ताकि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटे. फिर भी कई कार और बाइक मालिकों का कहना है कि इस बदलाव का असर उनके इंजन पर पड़ा है. ये वे लोग हैं जिनकी पुरानी गाड़ियां ई20 के अनुकूल नहीं. गुरुग्राम निवासी सुनील मल्होत्रा के पास 2019 का होंडा सिटी मॉडल है. वे कहते हैं, ''मेरी कार का माइलेज 18 से घटकर 11-12 किमी प्रति लीटर रह गया है. कभी-कभी तो यह इकाई अंक में भी आ जाता है.''

इन शिकायतों से बहस छिड़ गई है कि क्या ई20 ईंधन को पूरे देश में उतारने की रफ्तार उसके अनुकूल गाड़ियां आने की रफ्तार से कहीं तेज है. केंद्र सरकार का तर्क है कि इथेनॉल वाला फ्यूल न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से सही बल्कि रणनीतिक रूप से जरूरी भी है. पश्चिमी एशिया संकट ने इसकी जरूरत नए सिरे से बढ़ा दी क्योंकि इस दौरान कच्चे तेल की सप्लाइ गड़बड़ा गई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च में इथेनॉल मिश्रण को 'बड़ी राहत' बताते हुए कहा था कि इस प्रोग्राम से भारत को हर साल करीब 4.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल के आयात से बचने में मदद मिली और करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बची. तब से तीन अहम मंत्रालयों—पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सड़क परिवहन और राजमार्ग, और सूचना और प्रसारण—ने इस प्रोग्राम का जोरदार बचाव किया है.

इसके सबसे मुखर समर्थक केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी हैं. शिकायतें बढ़ने पर वे कहते हैं, ''यह सब दुष्प्रचार है. इथेनॉल से कोई नुकसान नहीं.'' 2014 में पद संभालने के बाद से गडकरी भारत के ऊर्जा बिल को कम करने के उपाय के तौर पर इथेनॉल-मिश्रित ईंधन की वकालत करते रहे हैं. हाल में उन्होंने मारुति सुजुकी वैगनआर के फ्लेक्स-फ्यूल संस्करण और हीरो मोटोकॉर्प की दो ऐसी मोटरसाइकिलों को लॉन्च किया जो ई20 से ई85 तक के इथेनॉल पेट्रोल के साथ अच्छे से चल सकती हैं. इथेनॉल सुरक्षित होने के अपने दावे के समर्थन में गडकरी ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया ( एआरएआइ) की व्यापक जांच का जिक्र करते हैं: ''करीब एक लाख किलोमीटर की टेस्टिंग के बाद एआरएआइ ने कहा है कि (इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से) किसी भी वाहन के इंजन में खराबी नहीं देखी गई. वाहन की परफॉर्मेंस, स्टार्ट होने, चलाने और मेटल की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा.''

आधिकारिक रिसर्च
सरकार का पक्ष मुख्य रूप से पिछले दशक में किए गए कुछ अध्ययनों पर आधारित है. एआरएआइ की 2021 की एक स्टडी में जांच की गई कि ई20 का गाड़ियों के फ्यूल सिस्टम में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली आठ धातुओं, छह रबर मटीरियल (इलास्टोमर) और चार इंजीनियरिंग प्लास्टिक पर क्या असर होता है. इसमें धातुओं में 'बहुत कम' जंग और ज्यादातर दूसरे मटीरियल में लगभग एक जैसी या कुछ मामलों में बेहतर परफॉर्मेंस मिली. हालांकि दो इलास्टोमर और एक प्लास्टिक की जिन प्रॉपर्टीज को मापा गया, उनमें ज्यादा बदलाव दिखे. शोधकर्ताओं का कहना था कि इन नतीजों से फ्यूल-सिस्टम के कल-पुर्जों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी.

उसी साल नीति आयोग की बनाई एक अंतर-मंत्रालयी एक्सपर्ट कमेटी ने वाहनों की टेक्नोलॉजी, इथेनॉल की सप्लाइ और इससे जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर की जांच की. यह कवायद 2025 तक देश भर में चरणबद्ध तरीके से ई20 अपनाने का खाका सुझाने के लिए थी. कमेटी ने तीन व्यावहारिक चुनौतियां मानीं: पुराने इंजन कैलिब्रेशन में कम फ्यूल एफिशिएंसी, कुछ फ्यूल-सिस्टम पार्ट्स में ई20 के अनुकूल मटीरियल की जरूरत, और फ्यूल के रोलआउट के साथ-साथ ई20 के अनुकूल गाड़ियों को धीरे-धीरे बाजार में लाना.

कमेटी ने नई रिसर्च नहीं की बल्कि भारी उद्योग मंत्रालय की 2014-15 में करवाई एक स्टडी पर भरोसा किया जिसमें ई20 के इस्तेमाल से इंजन फेल होने, गाड़ी चलाने में दिक्कत या इंजन के असामान्य रूप से घिसने का कोई सबूत नहीं मिला था. लेकिन उसने कुछ इलास्टोमर और प्लास्टिक में ज्यादा खराबी पकड़ी और फ्यूल एफिशिएंसी में 2-6 फीसद की कमी देखी. फ्यूल एफिशिएंसी की चिंताओं पर बात करते हुए एआरएआइ के निदेशक रेजी मथाई ने हाल ही ई20 से जुड़ी कमियों को 'बेहद कम' बताया: ''वास्तविक हालात में फ्यूल की खपत और कुल एफिशिएंसी में कोई भी अंतर आता है तो वह बाहरी कारकों की वजह से होता है, जिनमें ड्राइविंग का तरीका, सड़क की हालत और गाड़ी की बुनियादी स्थिति शामिल है.''

सन् 2018 में बायोफ्यूल पर अधिसूचित राष्ट्रीय नीति में 2030 तक पेट्रोल में 20 फीसद इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा गया था. जब इस लक्ष्य की समय-सीमा जल्दी यानी 2025-26 कर दी गई, तो रोडमैप में तय किया गया कि नवंबर 2022 तक 10 फीसद मिश्रण किया जाए. यह लक्ष्य जून 2022 में ही यानी तय समय से पांच महीने पहले ही पा लिया गया. अप्रैल 2023 से सभी नई पेट्रोल गाड़ियों को ई20 फ्यूल के लिहाज से बनना जरूरी कर दिया गया.

मारुति सुजुकी के कार्यकारी निदेशक राहुल भारती कहते हैं, ''2023 के बाद कारों और फ्यूल दोनों का ई20 होना जरूरी है. यह चिंता की बात नहीं. चिंता उन कारों को लेकर है जो 2023 से पहले बनी और बिकी थीं, जिन्हें मुख्य रूप से ई10 के लिए डिजाइन किया गया था.'' मारुति ने ई20 के अनिवार्य होने से पहले ही इसकी टेस्टिंग शुरू कर दी और पाया कि गाड़ी की उम्र या फ्यूल के संपर्क में आने वाले पार्ट्स में ''टूट-फूट, जंग या नुक्सान'' जैसी कोई समस्या नहीं. इनमें ई10 के लिहाज से डिजाइन 2023 से पहले के मॉडल भी शामिल थे.

लागत संतुलन
टोयोटा किर्लोस्कर के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और कंट्री हेड विक्रम गुलाटी कहते हैं कि इस साल के पश्चिम एशिया संकट ने आयातित कच्चे तेल पर भारत के जोखिम को उजागर कर दिया. उनका तर्क है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से ''अर्थव्यवस्था और ग्राहकों की जेब पर पड़ने वाले असर को कम करने'' में मदद मिली है. लेकिन टीईआरआइ में डिश्टिंग्विश्ड फेलो और मारुति सुजुकी के आरऐंडडी हेड रहे आइ.वी. राव कहते हैं कि ई20 का उपभोक्ता अर्थशास्त्र इससे कहीं जटिल है. उनके मुताबिक, इथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले कम एनर्जी कंटेंट होने के चलते ईंधन की क्षमता में गिरावट लाजिमी है. क्योंकि ज्यादा ब्लेंडिंग के अनुकूल इंजन न बनाए गए हों तो उतनी ही दूरी तय करने के लिए ज्यादा ईंधन जलाना ही होगा. वे ई20 के अनुकूल फ्यूल सिस्टम कंपोनेंट की संभावित जरूरतों की ओर इशारा करते हैं, जिससे धीरे-धीरे मेंटेनेंस और लाइफस्टाइल की लागत बढ़ सकती है.

नीति आयोग का 2021 का रोडमैप पहले ही कह चुका है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग के चलते ईंधन की बढ़ी कीमतें तेल मार्केटिंग कंपनियां उपभोक्ताओं पर डाल रही हैं. उसने चेताया था कि इथेनॉल पेट्रोल से महंगा होने की स्थिति में इथेनॉल मिश्रित ईंधन उपभोक्ताओं पर भारी पड़ेगा. अब वह स्थिति आ चुकी है. पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, 2020-21 में पेट्रोल से सस्ता इथेनॉल अब रिफाइनरी स्टेज पर कहीं महंगा है. तेल कंपनियां अभी डिस्टिलरीज से इथेनॉल सरकार की तय दर 58-72 रुपए लीटर पर खरीदती हैं जबकि पेट्रोल की रिफाइनरी ट्रांसफर कीमत जुलाई के शुरू में 70.5 रुपए लीटर थी. ऐसे में मंत्रालय का तर्क है कि इस कार्यक्रम का सस्ते ईंधन के वादे से उतना लेना-देना नहीं जितना ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के कम आयात, पर्यावरण लक्ष्यों और किसानों की मदद से है.

इथेनॉल मिश्रण के अगले दौर की तैयारी पहले से ही चल रही है. भारतीय मानक ब्यूरो ने ई22, ई25, ई27 और ई30 के लिए ईंधन स्पेसिफिकेशन अधिसूचित कर दिए हैं. केंद्र ने भी ई20 से आगे धीरे-धीरे परिवर्तन पर वाहन निर्माताओं और अन्य हितधारकों के साथ विमर्श शुरू कर दिया है. जून में सरकार ने ई85 ईंधन बाजार में उतारना शुरू किया, जो विशेष रूप से फ्लेक्स-ईंधन वाहनों के लिए है. इसके अलावा ई22, ई25, ई27 और ई30 को केंद्रीय उत्पाद शुल्क से छूट दी गई.

फ्यूल टैंक से इतर
पर्यावरणवादियों के लिए यह बहस गाड़ी की परफॉर्मेंस से कहीं ज्यादा है. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की दलील है कि इथेनॉल के लिए जरूरत से ज्यादा जोर देने पर पानी और खाद्य सुरक्षा पर दबाव का खतरा है. सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं, ''हम अपनी कारों में जो हर लीटर इथेनॉल जलाते हैं, उससे हमारे खेतों का 10,000 लीटर पानी खर्च होता है. ऐसे समय में जब केंद्रीय भूजल बोर्ड महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और पंजाब के बड़े हिस्सों को जरूरत से ज्यादा जल-दोहन वाला बताता है, तो गाड़ियों की तेल टंकी में फसलों को डालना ऊर्जा सुरक्षा नहीं. यह छिपे तरीके से लागू की जाने वाली वॉटर पॉलिसी है.'' वे चेताती हैं कि इथेनॉल की गारंटीड मांग किसानों को दलहन, बाजरा और तिलहन से मक्का और गन्ने की ओर जाने को उकसा रही है.

पेट्रोलियम मंत्रालय ऐसे दावों को खारिज करता है. वह कहता है कि मॉडर्न इथेनॉल प्लांट एक लीटर इथेनॉल बनाने को सिर्फ 3-5 लीटर प्रोसेस्ड पानी का इस्तेमाल करते हैं. उसकी यह भी दलील है कि सिर्फ वही सरप्लस चावल इथेनॉल के उत्पादन में इस्तेमाल किया जाता है, जिसे खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने के बाद बताता है.

भारत का इथेनॉल एक्सपेरिमेंट अब सिर्फ सरकारी रोडमैप या लैब रिपोर्ट तक सीमित नहीं. गाड़ी चलाने वाले इसे रोज किलोमीटर प्रति लीटर में मापते हैं; तो नीतिनिर्माता आयात न किए गए कच्चे तेल के बैरल में. इन दोनों में आपस में कितना तालमेल है, इसी से ई20 की सफलता तय होगी. 

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