चुप्पी तोड़ें और खुलकर बोलें

महिलाएं अतीत के दर्द को पीछे छोड़कर बेहतर शिक्षा, मजबूत संस्थानों और गहरे सांस्कृतिक बदलाव के हक में. अपनी आवाज और रजामंदी को अपवाद के तौर पर नहीं बल्कि समाज की स्थापित नीति बनाने की पक्षधर

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर

अगर पहले तीन सेक्शन समस्या की पहचान को लेकर हैं तो चौथा आगे की राह की टोह लेता है. सवाल यह परखते हैं कि महिलाओं को शिक्षा, कानूनी सुरक्षा और संस्थागत मदद के तौर पर क्या मिला और वे अगली पीढ़ी के लिए क्या चाहती हैं. उनके जवाब सर्वे से निकली दो-टूक राय जाहिर करते हैं.

आइए, पहले मौजूदा खामियों और कमियों पर नजर डालते हैं. सिर्फ 54 फीसदी को स्कूल या कॉलेज में रजामंदी और उसकी सीमा के बारे में कोई औपचारिक शिक्षा या वर्कशॉप मिली. बदतर हाल देखिए: 44 फीसदी की राय में उन्हें कभी यह नहीं सिखाया गया कि चुप रहने या विरोध न करने को रजामंदी माना जा सकता है. सिर्फ 55 फीसदी ने बचपन में गुड टच और बैड टच के बारे में जाना था. मतलब यह कि काफी बड़े हिस्से को शोषण पहचानने की बुनियादी जानकारी भी नहीं.

कानून तो मौजूद हैं, लेकिन उस पर भरोसा कम है. सर्वे में दो-तिहाई को पॉश ऐक्ट (कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम का कानून), सुप्रीम कोर्ट के विशाखा दिशा-निर्देश, हेल्पलाइन नंबर और जीरो एफआइआर जैसे प्रावधानों की जानकारी थी. फिर भी, सिर्फ 27 फीसदी ही पॉश कानूनी तंत्र को 'बहुत असरदार' मानती हैं, जबकि 15 फीसदी को इसकी कोई जानकारी नहीं. दिल्ली में 2012 के 'निर्भया' बलात्कार कांड के बाद हुए कानूनी सुधारों का नतीजा भी चिंताजनक है. सिर्फ 42 फीसदी का मानना है कि उन कड़े कानूनों के लागू होने के बाद महिलाओं की सुरक्षा में काफी या कुछ हद तक सुधार हुआ है, जबकि एक-तिहाई का कहना है कि कोई सुधार नहीं हुआ या स्थिति और खराब हो गई है.

इसलिए सुझाव सिर्फ कानूनी इंतजामात तक सीमित नहीं. सवाल था: महिलाओं के खिलाफ अपराध कम करने का सबसे असरदार तरीका क्या है? जवाब में पुलिस व्यवस्था से ज्यादा अहमियत बच्चों की परवरिश पर था. 65 फीसदी ने माना कि बेटों को लड़कियों-स्त्रियों का सम्मान करना सिखाया जाना चाहिए. 58 फीसदी की राय सख्त सजा के पक्ष में थी. इसी तरह, जब पूछा गया कि आपसी रजामंदी का माहौल बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी है? 58 फीसदी ने जिम्मेदारी परिवार की बताई, तो 54 फीसदी ने दारोमदार स्कूलों और कॉलेजों पर डाला, जो कानून और नीतियों से भी बढ़कर था.

सबसे ज्यादा राय शिक्षा को लेकर है. 86 फीसदी चाहती हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में रजामंदी के बारे में शिक्षा अनिवार्य हो, और उनमें सबसे ज्यादा (40 फीसदी) का कहना है कि यह शिक्षा 10 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होनी चाहिए. 85 फीसदी का कहना है कि वे खुद छोटी लड़कियों को सहमति और मना करने के अधिकार के बारे में सिखाएंगी. संदेश साफ है. जिन महिलाओं ने रजामंदी की समझ के बिना अपना जीवन बिताया, वे चाहती हैं कि अगली पीढ़ी के साथ ऐसा न हो.

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