भुगतान के संकट से कैसे पार पाएंगे छोटे उद्यम?
एमएसएमई क्षेत्र भारत के जीडीपी में 30 फीसद का योगदान देता है लेकिन यह बड़े उद्यमों की तरफ से भुगतान में देरी की मुसीबत झेल रहा है

सफेद लिनेन की शर्ट में ये दिनेश सिंघल हैं, बिजली के ट्रासंफॉर्मर बनाने वाली कंपनी कनोहर इलेक्ट्रिकल्स के संस्थापक. इनके हाथ मंं मध्यस्थता और सुलह (आर्बिट्रेशन ऐंड कंसिलिएशन) अधिनियम 1996 की एक प्रति है. पूछिए क्यों, और वे जवाब देते हैं, "कानून जाने बगैर भारत में बिजनेसमैन कारोबार नहीं कर सकता. मैं पूरा का पूरा अनुबंध अधिनियम जस का तस बोल सकता हूं."
67 साल के उद्यमी हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए दिल्ली आए थे. मामला केंद्रीय रेल विद्युतीकरण संगठन (CORE या कोर) के खिलाफ उनकी शिकायत का था. इसने उनकी कंपनी को रेलवे के विद्युतीकरण का ठेका दिया था. ठेका 49 करोड़ रुपए का था. नौ महीने बाद रद्द कर दिया. सुनवाई भी नहीं. सीओआरई ने कहा कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया. कनोहर ने रेलवे को कई अर्जियां दीं.
इन पर उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. अपील करने पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने दिसंबर 2017 में उनके पक्ष में फैसला सुनाया और रेलवे से कहा कि फर्म की बात सुने. मगर उसने नहीं माना.
उलटे बीजी (बायर्स गारंटी, यानी सप्लायर को बायर या खरीदार के पास जो रकम रखनी होती है) के 3 करोड़ रुपए और भुना लिए. उसी काम का नया टेंडर भी जारी कर दिया. लागत 25 फीसद ज्यादा और अवधि भी लंबी रखी. पांच साल और 30 सुनवाई हो चुकी हैं. सिंघल आज भी मुकदमा लड़ रहे हैं. यह अकेला मामला नहीं है. दो दिल्ली हाईकोर्ट में, एक नैनीताल हाईकोर्ट में और एक लखनऊ हाईकोर्ट में हैं.
सिंघल की कहानी कोई अलग-थलग नहीं है. देश भर में एमएसएमई उद्यमियों की हालत दयनीय है. वे निजी और सरकारी कंपनियों के साथ कानूनी लड़ाइयों में फंसे हैं. मुद्दे कई तरह के हैं—भुगतान में देरी से लेकर अनुबंध लागू न करने और सप्लाई की खराब क्वालिटी तक. यह तब है जब भारत के 6.34 करोड़ एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.
देश की जीडीपी में 30 फीसद और निर्यात में 45 फीसद का योगदान देते हैं. यह क्षेत्र कृषि के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा एम्पलॉयर भी है. करीब 12 करोड़ लोगों को नौकरियां देता है. विश्व बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में भारत अपनी स्थिति में सुधार करके 2014 में 134 से 2020 में भले 63वें पायदान पर आ गया हो, पर अनुबंध पर अमल की अलग ही कहानी है. इसकी रैंकिंग में बहुत मामूली सुधर आया—2014 में 186 से 2020 में 163.
फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) के सेक्रेटरी जनरल अनिल भारद्वाज कहते हैं, "बड़े खरीदारों से सौदे करने पर बहुत छोटे और छोटे मैन्युफैक्चरर के पास मोल-भाव की ताकत नहीं होती, चाहे वे सरकारी हों या निजी. बड़ी कंपनियां सप्लायर के साथ लंबे वक्त का रिश्ता नहीं बनातीं. उनकी स्थिति का फायदा उठाती हैं और बांह मरोड़कर उनसे शोषण करने वाली शर्तें मनवा लेती हैं."
भुगतान में देरी
कानून उनके हितों का रखवाला है. 2006 का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम साफ कहता है कि सामान या सेवा मिलने के 45 दिनों के भीतर एमएसएमई सप्लायर को भुगतान कर दिया जाना चाहिए. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस साल के अपने बजट भाषण में भुगतान में देरी का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि कंपनियां कटौतियां (डिडक्शन) का दावा संचित आधार पर नहीं बल्कि एमएसएमई को वास्तव में भुगतान करते समय करें. एमएसएमई कारोबार कर्ज के सहारे चलते हैं. ग्राहक देर से भुगतान करते हैं तो उद्यमी कार्यशील पूंजी कर्ज वक्त पर नहीं चुका पाते. साख को बट्टा लगता है, सो अलग.
नॉन प्रॉफिट संगठन ग्लोबल अलायंस फॉर मास एंटरप्रेन्योरशिप (GAME या गेम) के संस्थापक रवि वेंकटेशन कहते हैं, "कभी-कभार भुगतान में देरी के लिए क्वालिटी या कारोबार की जायज वजहें होती हैं. मगर भुगतान में ज्यादातर देरी इसलिए होती है क्योंकि बड़े खरीदार अपनी कार्यशील पूंजी की जरूरत कम करना चाहते हैं और ऐसा करके वे बच निकल सकते हैं." दरअसल गेम और एनालिटिक्स कंपनी डन ऐंड ब्रैडस्ट्रीट (डीऐंडबी) की रिपोर्ट 'अनलॉकिंग द फुल पोटेंशियल ऑफ इंडियाज एमएसएमई थ्रू प्रोक्वप्ट पेमेंट्स' का अनुमान है कि खरीदारों की तरफ से एमएसएमई सप्लायरों को भुगतान में देरी की वजह से सालाना 10.7 लाख करोड़ रुपए फंस जाते हैं.
यह बहुत बड़ी रकम है (भारतीय कारोबारों के ग्रॉस वैल्यू एडेड या जीएवी की करीब 5.9 फीसद). वाकई, भारत के 99 फीसद एमएसएमई अब भी बहुत छोटे उद्यम हैं. वे एसएमई बनने की तरफ कदम क्यों नहीं बढ़ा पाते? मुख्यत: भुगतान में देरी और उसके चलते हाथ में पूंजी न होने की वजह से.
सार्वजनिक बनाम निजी कंपनियां
FISME के भारद्वाज एक और बात बताते हैं. भुगतान में देरी का मसला सरकारी क्षेत्र के उद्यमों के साथ ज्यादा है. अक्सर इसलिए कि उनकी खरीद प्रक्रिया भी बहुत ज्यादा नियम-कायदों के जाल में जकड़ी है. उनका कहना है कि क्षेत्र या समूह के स्तर पर खरीद अक्सर बजट बनाए बगैर की जाती है और खरीद प्रक्रिया में भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर दाखिल हो सकता है, जिससे भुगतान टलता रहता है.
लखनऊ के शशि केबल्स के प्रमोटर वी.के. अग्रवाल के साथ भी यही हुआ. वे पिछले तीन साल से उत्तर प्रदेश सरकार की बिजली वितरण कंपनी मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एमवीवीएनएल) से लड़ रहे हैं. 2020 में उनकी फर्म ने एजेंसी से 18 करोड़ का काम लिया. उन्हें बिजली कंडक्टर सप्लाई करने थे. मगर जब काम पूरा होने को आया तो भुगतान में देरी होने लगी.
भुगतान रोकने की वजह बताते हुए एमवीवीएनएल ने सामान की खराब क्वालिटी और लैबोरेटरी के नतीजे फेल होने का आरोप लगाया. अग्रवाल को अपने सामान की क्वालिटी पर पूरा भरोसा था. वे यूपी पावर कॉर्पोरेशन (यूपीपीसीएल) के चेयरमैन के सामने मामला ले गए. उन्होंने आरोप लगाया कि एक शीर्ष पदाधिकारी जान-बूझकर तंग करने में शामिल है.
जांच समिति ने आखिरकार शशि केबल्स को सही ठहराया. अग्रवाल कहते हैं, "मगर सख्त रुख अपनाने और व्यवस्था को नाराज करने की कीमत हमारे कारोबार के लिए विनाशकारी थी. हमारे आकार की फर्म के लिए करीब 18 करोड़ रुपए अटक जाते देखना मर जाने जैसा था. हम बैंक को अंधाधुंध ब्याज चुका रहे थे. वह भी उस कार्यशील पूंजी पर जो फंसी थी. कोई नया कारोबार भी हाथ में नहीं ले सकते थे."
एमवीवीएनएल के एमडी भवानी सिंह खंगरोत ने 19 सितंबर को मैसेज किया कि उनकी फर्म को आरोपों का जवाब दिया जाएगा. बार-बार याद दिलाने पर भी अभी तक कोई जवाब नहीं आया. सिर्फ सरकारी क्षेत्र की फर्म ही नहीं हैं. निजी कंपनियां भी इतनी ही दोषी हैं. मसलन, 2018 में 'किया मोटर्स' आंध्र प्रदेश में फैक्टरी लगा रही थी. उसके वेंडर कोटेक ऑटोमोटिव सर्विसेज इंडिया को अपनी पाइपलाइनों का निरीक्षण करवाना था. कोटेक ने इस काम के लिए एनडीटीएस इंडिया को नियुक्त किया. मगर उसके बाद पाइपलाइनें जाम पाई गईं. एनडीटीएस ने मंजूरी प्रमाणपत्र जारी नहीं किया.
एनडीटीएस इंडिया के सीईओ मुकेश अरोड़ा का आरोप है, "वे झूठी रिपोर्ट चाहते थे. कहा कि वरना इनवॉइस के भुगतान का काम आगे नहीं बढ़ेगा." 7.43 लाख रुपए का बिल तभी से फंसा पड़ा है. कई रिमाइंडर भेजे. कोटेक ने कोई जवाब नहीं दिया. गेम की रिपोर्ट कहती है कि एमएसएमई को देय कुल रकम का करीब 80 फीसद या 8.55 लाख करोड़ रुपए बकाया है.
कार्यशील पूंजी की कमी तो हो ही जाती है पर एमएसएमई को यही एक कीमत नहीं चुकानी पड़ती. शशि केबल्स के अग्रवाल याद करते हैं कि बेल्जियम की एक प्रतिष्ठित कंपनी के साथ एक सौदा तय करने में उन्होंने चार साल लगाए. वे कहते हैं, "इससे हमें अनूठी टेक्नोलॉजी मिलती. हम उद्योग के अगुआ बनने की तरफ बढ़ते. मगर ज्यों ही हमने उन्हें मध्यांचल के साथ चल रहे मामले के बारे में बताया, वे चुपचाप पीछे हट गए."
हितों की रक्षा में खामियां
भारत में एमएसएमई की हिफाजत के लिए काफी कानून हैं. मसलन, एमएसएमई समाधान योजना, 2006 का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम. हाल में ट्रेड रिसीवेबल्स डिसकाउंटिंग सिस्टम (टीआरईजीएस) भी लॉन्च हुआ. एमएसएमईडी कानून में प्रावधान है कि राज्य सरकारें अदालत से बाहर भुगतान में देरी के विवाद निबटाने के लिए सूक्ष्म और लघु सुविधा परिषद बनाएं. मध्यस्थता और सुलह के लिए कानून में 90 दिन की अवधि तय है. कागज पर तो ये प्रावधान जोरदार नजर आते हैं पर हकीकत में अमल बहुत खराब है.
उत्तर प्रदेश सुविधा परिषद (फैसिलिटेशन काउंसिल) के सदस्य और इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट संजय कौल बताते हैं, "इनमें से ज्यादातर एएसईएफसी की कमान राज्य औद्योगिक आयुक्त के हाथ में हैं. जिले को संभालते हुए उनके पास दूसरे भी बहुत-से काम होते हैं. इसके कई सदस्य वकील भी नहीं हैं. लिहाजा फैसले अच्छे तर्कों पर आधारित नहीं होते. इससे प्रतिवादियों के लिए अपील का दरवाजा खुल जाता है." अदालतों में वैसे भी मुकदमों का अंबार है. ये मामले भी बरसों घिसटते रह सकते हैं.
चेन्नई सुविधा परिषद (एफसी) के सदस्य डी. गांधीकुमार कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसले दिए. कहा कि एफसी के मध्यस्थता फैसले अंतिम माने जाने चाहिए और विशेष परिस्थितियों में ही ऊपर की अदालतों में अपील करनी चाहिए. मगर बीते तीन-चार साल में हम अदालतों को तरह-तरह की अपीलें स्वीकार करते देखते हैं. कुछ तो हल्के-फुल्के आधारों पर भी. हो सकता है, बड़े उद्यमों की लॉबीइंग इसकी वजह हो."
इसे सुलझाने के लिए अक्टूबर 2017 में एमएसएमई समाधान योजना लाई गई ताकि सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों पर बकाया रकम का निबटारा तेजी से किया जा सके. इसके लॉन्च होने के बाद एमएसई ने 17 अक्टूबर, 2023 तक केंद्रीय मंत्रालयों, महकमों, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और दूसरों के खिलाफ 39,015 करोड़ रुपए के लिए 1,64,280 अर्जियां दायर कीं. इनमें से 15,274 का आपस में निबटारा हो गया. 42,787 खारिज कर दी गईं. एमएसईएफसी ने 32,542 मामलों का निबटारा किया, तो बाकी 73,676 लटके हैं.
एमएसएमई की लिक्विडिटी के इन्हीं मसलों को हल करने के लिए आरबीआई 2014 में ऑनलाइन बिल डिसकाउंटिंग प्लेटफॉर्म टीआरईडीएस या ट्रेड्स लेकर आया. इससे एमएमएमई सप्लायर अपने इनवॉइस पर छूट ले सकते और नीलामी के जरिए उन बिलों के एवज धन उगाह सकते हैं. इससे उन्हें कार्यशील पूंजी के प्रबंधन में मदद मिलती है. तीन ट्रेड्स एक्सचेंज काम कर रहे हैं. वित्त वर्ष 2022-23 में उन्होंने कुल 76,000 करोड़ रुपए के इनवॉइसों की छूट दी. यानी पिछले साल के 40,000 करोड़ रुपए के मुकाबले करीब दोगुनी. बिल की छूट के लिए करीब 60,000 एमएसएमई ने ट्रेड्स का लाभ लिया.
सीपीएसई (केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम) और 500 करोड़ रुपए से ज्यादा के टर्नओवर वाली कंपनियों ने ट्रेड्स पर रजिस्टर नहीं किया जबकि कानूनी तौर पर उनके लिए ऐसा करना अनिवार्य है. 7,700 जितनी बड़ी तादाद में कंपनियों और सीपीएसई को तीनों में से किसी एक एक्सचेंज पर अभी रजिस्टर करना है. जिन सीपीएसई ने रजिस्टर किया भी है, उन्होंने भी 10 फीसद से कम इनवॉइस को ट्रेड्स पर छूट दी.
इसका मतलब है कि उन्होंने सरकारी अधिसूचना का पालन करने भर को रजिस्टर किया है. ट्रेड्स प्लेटफॉर्मों में से एक रिसीवेबल्स एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (आरएक्सआईएल) के एमडी और सीईओ केतन गायकवाड़ का कहना है कि रजिस्टर्ड सीपीएसई अपने अंदरूनी मसलों की वजह से बहुत कम ही लेनदेन करते हैं. वे कहते हैं, "अगर सरकारी या निजी सभी कॉर्पोरेट बिल डिसकाउंटिंग के लिए ट्रेड्स का फायदा उठाना शुरू कर दें, तो मुझे यकीन है कि एमएसएमई के 20-25 लाख करोड़ रुपए के क्रेडिट गैप को कुछ हद तक सुलझाया जा सकता है."
छोटे कारोबारों के सामने मौजूद वित्तीय चुनौतियों को हल करना बेहद जरूरी है. उनकी वृद्धि के लिए ही नहीं, उन्हें जिंदा रखने के लिए भी. देश की अर्थव्यवस्था में छोटे कारोबारों की निर्णायक भूमिका के बारे में बहुत कुछ कहा गया है. अब उन्हें सच्ची मान्यता देने का वक्त आ गया है. वरना 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर (50 खरब) की अर्थव्यवस्था बनने का भारत का सपना महज सपना ही रह जाएगा.