मुश्किल में फंसी भाजपा
परस्पर विरोधी सियासी हितों की वजह से भाजपा हिंसाग्रस्त मणिपुर में दुविधा में फंस गई है. ऐसी स्थिति में राज्य में शांति बहाली की राह अभी मुश्किल नजर आ रही

मणिपुर में जातीय हिंसा भड़कने को करीब दो माह बीत चुके हैं. इसकी आग 150 लोगों की जान ले चुकी है और अभी भी इसके काबू में आने के कोई संकेत नहीं मिल रहे. इसको लेकर केंद्र और इस पूर्वोत्तर राज्य, दोनों की भाजपा सरकारों को आलोचना झेलनी पड़ रही है. राज्य की कानून-व्यवस्था पर पकड़ कमजोर होने से ज्यादा बड़ी चिंता की बात यह है कि 'डबल इंजन सरकार' संघर्षरत मैतेई और कुकी समूहों को बातचीत शुरू करने पर राजी करने में भी नाकाम रही है. यह दिखाता है कि कैसे परस्पर विरोधी सियासी हितों के कारण भाजपा यहां बुरी तरह फंस गई है.
हिंसा भड़कने के बाद से मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को हटाने की मांग न केवल विपक्ष और कुकी समूह कर रहे हैं बल्कि खुद भाजपा के अंदर भी ऐसी आवाज उठ रही है. उन्होंने 30 जून को इस्तीफा तैयार भी कर लिया था, पर उनके आधिकारिक आवास के बाहर जुटी भीड़ ने राज्यपाल को सौंपे जाने से पहले ही उसे फाड़ दिया. मुख्यमंत्री के आलोचकों का कहना है कि भाजपा आलाकमान की ओर से पद छोड़ने के लिए कहे जाने पर उन्होंने 'इस्तीफे का नाटक' किया. बहरहाल, इस प्रकरण ने राज्य के मामलों को संभालने में पार्टी की दुविधा को उजागर ही किया है.
राज्य का घटनाक्रम पहली नजर में बीरेन सिंह को अयोग्य मुख्यमंत्री के तौर पर सामने लाता है जो केंद्र और सशस्त्र बलों के समर्थन के बावजूद हिंसा रोकने में नाकाम रहे. उनके विरोधी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने खुलकर अपने मैतेई समुदाय का पक्ष लिया है. इसी तर्ज पर, कुकी समूहों का दावा है कि अफीम की खेती और वन क्षेत्रों के अतिक्रमण के खिलाफ बीरेन सिंह के पूर्व के अभियानों का असली निशाना तो कुकी समुदाय था, जिसका मैतेई से टकराव रहा है. इसलिए जब कभी मुख्यमंत्री ने म्यांमार से कुकी लोगों की अवैध घुसपैठ का मुद्दा उठाया, या उनकी बढ़ती आबादी की ओर इशारा किया, कुकी नेताओं ने उन पर जातीय पूर्वाग्रह का आरोप लगाया. इसीलिए वे बीरेन सिंह के मुख्यमंत्री रहने तक केंद्र की पहल पर किसी भी शांति वार्ता का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं.
लेकिन केंद्र सरकार की ओर से बीरेन सिंह की बरखास्तगी की कोई संभावना नजर नहीं आती, क्योंकि इससे मैतेई समुदाय पर पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ सकती है. मणिपुर की 60 विधानसभा सीटों में से 40 के नतीजों में मैतेई अहम भूमिका निभाते हैं. बीरेन सिंह ने दो प्रमुख मुद्दे उठाकर मैतेई समुदाय के बीच अपना कद काफी बढ़ा लिया है. इसमें एक है, कुकी नागरिकों की कथित अवैध घुसपैठ. मैतेई समुदाय का आरोप है कि इन लोगों ने मैतेई वर्चस्व वाली इंफाल घाटी—जो अभी संघर्ष के केंद्र में है—के आसपास तलहटी वाले क्षेत्रों में जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है. दूसरे, वे कुकी उग्रवादियों के खिलाफ अभियान स्थगित करने संबंधी एसओओ समझौते को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, जो 2008 में उनसे बातचीत शुरू करने के उद्देश्य से किया गया था. 10 मार्च को राज्य सरकार ने एकतरफा कदम उठाते हुए दो समूहों कुकी नेशनल आर्मी (केएनए) और जोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी (जेआरए) के साथ एसओओ समझौता खत्म कर दिया. सरकार का आरोप था कि वे वन भूमि से अवैध अतिक्रमणकारियों को हटाने के सरकारी अभियान के खिलाफ लोगों को भड़का रहे थे.
शीर्ष भाजपा नेताओं को यह आशंका सता रही है कि अगर बीरेन सिंह को हटाया गया तो इसे कुकी समूहों के खिलाफ उनकी कार्रवाई की सजा के तौर पर देखा जाएगा. वैसे नगा समुदाय—जो कुकी की तरह ही पहाड़ियों में बसे आदिवासी ही हैं—का संघर्ष में तटस्थ बने रहना बीरेन सिंह के पक्ष में गया है.
लेकिन 8 जून को राष्ट्रीय जांच एजेंसी कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका ने इस मामले में भाजपा आला कमान के लिए मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा दीं. याचिकाकर्ता एस.एस. हाओकिप एसओओ में पक्षकार सशस्त्र संगठन यूनाइटेड कुकी लिबरेशन फ्रंट (यूकेएलएफ) के अध्यक्ष हैं. हलफनामे में 2019 का एक पत्र शामिल है जो उन्होंने कथित तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखा था, और जिसमें यह दावा किया गया कि उनके संगठन और एक अन्य कुकी संगठन यूनाइटेड पीपल्स फ्रंट (यूपीएफ) ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और पूर्वोत्तर में भाजपा के प्रभारी रहे राम माधव के साथ एक समझौते के तहत विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की जीत में मदद की थी. संगठन ने कथित तौर पर 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की मदद की. (2022 के विधानसभा चुनावों में 17 विद्रोही गुटों के साझा समूह कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (केएनओ) और आठ अन्य कुकी संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले यूपीएफ ने कुकी क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को समर्थन देने की घोषणा की थी.)
इस खुलासे ने मैतेई समूहों की नाराजगी बढ़ा दी, जो पहले ही आरोप लगा रहे थे कि केंद्र और सशस्त्र बल एसओओ में पक्ष बने कुकी उग्रवादी समूहों के प्रति नरमी बरत रहे हैं. सरमा ने शुरू में हाओकिप के हलफनामे पर जवाब नहीं दिया, लेकिन एक हफ्ते बाद कई भाजपा विधायकों ने केंद्र को ज्ञापन सौंपकर उनके स्पष्टीकरण की मांग की, तब उन्होंने आधिकारिक तौर पर खंडन जारी किया. तब तक देर हो चुकी थी, क्योंकि केंद्र पर यह आरोप पहले ही लगने लगे थे कि कुकी समूहों से मिले समर्थन के कारण वह एसओओ समझौता रद्द करने में हीलाहवाली कर रहा है.
वहीं, भाजपा को लेकर कुकी समुदाय के सिविल सोसाइटी समूहों में भी संदेह बढ़ रहा है. उन्हें लगता है कि भाजपा बीरेन सिंह और मैतेई निगरानी समूहों के प्रति नरम है. सशस्त्र बलों तक ने आरोप लगाया है कि इंफाल घाटी में महिला निगरानी समूह अक्सर उनके अभियान में बाधा खड़ी करते हैं और हिंसा फैलाने वालों की मदद करते हैं. करीब 1,200 महिलाओं ने 24 जून को सेना के एक दस्ते को मैतेई अलगाववादी समूह कांगलेई यावोल कन्ना लूप (केवाइकेएल) से जुड़े एक दर्जन उग्रवादियों को रिहा करने पर बाध्य कर दिया. 2015 में इस संगठन के एक हमले में 20 सैनिक शहीद हो गए थे. सैन्य सूत्रों का दावा है कि उनकी कार्रवाई इसलिए प्रभावी नहीं हो पा रही, क्योंकि सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम (एएफएसपीए) उन अधिकांश क्षेत्रों में लागू नहीं जो हिंसा प्रभावित है. वैसे, केंद्र की ओर से एएफएसपीए का दायरा बढ़ाने की संभावना नहीं है क्योंकि यह इंफाल घाटी में एक नए आक्रोश को दावत दे सकता है.
मुख्यत: ईसाई धर्म से जुड़े कुकी समुदाय के कुछ सिविल सोसाइटी समूह यह आरोप भी लगाते हैं कि भाजपा सरकार पार्टी की हिंदुत्व विचारधारा से प्रेरित है. पार्टी नेता इन दावों को खारिज करते हैं. वैसे, कुछ लोग दबी जुबान में स्वीकार करते हैं कि उनके लिए मुख्यत: हिंदू समुदाय वाले मैतेई नागरिकों के खिलाफ 'कड़ा' रुख अपनाना मुश्किल है, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले. इस तरह भाजपा के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति है. इन सबके बीच मणिपुर की शांति कहीं ताक पर रखी हुई है.
तीन अहम किरदार
मणिपुर में संघर्ष का सियासी समाधान तलाशने की कोशिश में जुटे तीनों प्रमुख नेता फिलहाल आम सहमति का कोई आधार तैयार करने में नाकाम रहे हैं
अमित शाह, केंद्रीय गृह मंत्री
मई के अंत में अपनी तीन दिवसीय यात्रा और विभिन्न हितधारकों से नियमित बातचीत के बावजूद शाह राज्य सरकार, विद्रोही समूहों और कुकी तथा मैतेई दोनों पक्षों के नागरिक समूहों को बातचीत के मंच पर आने के लिए तैयार नहीं कर पाए
दरअसल, दोनों पक्षों की प्रमुख मांग ने उन्हें अधर में लटका दिया है. मुख्यमंत्री बीरेन सिंह कुकी उग्रवादियों के साथ एसओओ (उनके खिलाफ कार्रवाई स्थगित करने संबंधी) समझौते को रद्द करना चाहते हैं. वहीं, कुकी समूह शांति वार्ता से पहले बीरेन सिंह को बरखास्त करने पर अड़े हैं
एन. बीरेन सिंह, मुख्यमंत्री, मणिपुर
मैतेई नेता बीरेन सिंह पर अपने ही समुदाय का पक्ष लेने का आरोप लगता है. कुकी समुदाय का आरोप है कि वे जान-बूझकर उन्हें निशाना बना रहे हैं और उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया जाना चाहिए
बीरेन सिंह का दावा है कि कुकी विद्रोही समूहों ने लोगों को उकसाया और हिंसा फैलाई; इसलिए उनके साथ एसओओ करार रद्द कर दिया जाना चाहिए
पद छोड़ने का दबाव पड़ा तो उन्होंने दिखाया कि मैतेई समुदाय के बीच वे कितने लोकप्रिय हैं, भीड़ ने उन्हें इस्तीफा देने से रोक दिया
उन्हें बरखास्त करना भाजपा के लिए घाटे का सौदा हो सकता है क्योंकि 60 सदस्यीय विधानसभा में से 40 सीटों के नतीजे मैतेई तय करते हैं
हिमंत बिस्व सरमा, मुख्यमंत्री, असम
कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं. अनौपचारिक तौर पर विभिन्न पक्षों के बीच मुख्य वार्ताकार हैं. कुकी समूह भी उन पर भरोसा करते हैं
कुकी विद्रोहियों के इस दावे ने मैतेई समूहों को सशंकित कर दिया है कि सरमा ने 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए कुकी समूहों की पार्टी से लेकर एसओओ समझौते तक की मदद ली. मणिपुर के भाजपा विधायकों ने ही केंद्रीय गृह मंत्रालय से इसकी शिकायत की जिस पर उन्हें खंडन जारी करना पड़ा
2 जुलाई को, गुवाहाटी में गृह मंत्रालय (पूर्वोत्तर मामलों) के सलाहकार ए.के. मिश्र के साथ सरमा कई कुकी नेताओं से मिले