प्रधान संपादक की कलम से
महाराष्ट्र से बेहतर जगह भला क्या होती, जहां पिछले साल शिवसेना को तोड़कर वे पहली बढ़त हासिल कर चुके थे. 2019 में एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना को मिले कुल वोटों के साथ महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के पास अजेय 55 फीसद वोटों का अंबार था.

अरुण पुरी
महाराष्ट्र से महाभारत तक. पटना में विपक्ष की बड़ी बैठक के महज नौ दिन बाद एनसीपी को दोफाड़ करके महाराष्ट्र में भाजपा ने जिस तरह तख्ता पलटा, उसका यही मतलब है कि 2024 के आम चुनाव के संग्राम का बिगुल वाकई बज गया है. भाजपा ने 2019 में अपने दम पर 303 और एनडीए के साथ 353 सीटें जीती थीं. भारत की सबसे चतुर-सुजान पार्टी अच्छी तरह जानती है कि महज सामान्य चुनावी अभियान के बूते वह ऐसी हिमालयी चोटियां फिर फतह नहीं कर सकती.
बदले समीकरणों की वजह से भाजपा के लिए अनिवार्य हो गया है कि वह तीन लक्ष्य हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का सहारा ले. ये तीन लक्ष्य हैं—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए रिकॉर्ड तीसरा कार्यकाल पक्का करना, अपने दम पर बहुमत की गारंटी करना ताकि सहयोगी दलों पर निर्भर न रहना पड़े और नए भूभागों में पैर पसारना. इसके लिए उसने सीटों और राजनैतिक पूंजी से भरपूर छह या सात राज्यों की पहचान की है. उसने कई मोर्चों पर एक साथ अदावतों का सूत्रपात कर दिया और लड़ाई के मुगदर सीधे दुश्मन खेमे में ले गई. हम इसे 'ऑपरेशन तोड़-फोड़’ कह रहे हैं.
उसे पहले अपना मैदान सुरक्षित रखना है. उत्तर प्रदेश उनमें सबसे बड़ा है. वहां वह 80 में से अपनी 62 सीटों में थोड़ी भी कमी गवारा नहीं कर सकती, पर यह फिर भी उसकी कमतर मुश्किल चुनौती है. खेल यही है कि अखिलेश यादव को अलग-थलग करके उन्हें 3-4 फीसद ढुलमुल वोटों के टुकड़ों को जोड़कर कई गुना ताकत बढ़ा देने वाला तानाबाना तैयार न करने दिया जाए. मायावती पर लगाम ढीली न करना, उनके संगी-साथियों को आरएलडी के जयंत चौधरी की तरह साथ ले आना और छोटी-मोटी पार्टियों को जोड़ना काफी होना चाहिए.
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सरीखे राज्यों को, जहां भाजपा की एकतरफा जीत हुई थी, किसी भी कतरब्योंत से निरापद रखना होगा. मगर असली फोकस उन दूसरे बड़े राज्यों पर है जिन्होंने 2019 में बंपर फसल दी थी. महज महीने भर पहले हर जगह उत्साहहीन तस्वीर भाजपा का मुंह ताक रही थी. बस चार को लीजिए. महाराष्ट्र में भगवा खेमे ने लोकसभा की 48 में से 41 सीटें जीतीं, पर उनमें 18 शिवसेना की थीं.
वहीं बिहार में जद (यू) की 16 सीटें कुल 40 में से 39 के साथ लगभग पूर्ण सफाये का अहम हिस्सा थीं. ये दोनों प्रमुख सहयोगी पार्टियां खेमे से कूच कर गई हैं. कर्नाटक में खुद भाजपा ने 28 में से 25 सीटें जीती थीं, पर राज्य में कांग्रेस नए जोश से उठ खड़ी हुई है. पश्चिम बंगाल में 42 में से काबिले तारीफ 18 सीटों पर जीत हासिल की थी, पर अब वह ताकत और रफ्तार गंवाती दिखती है. इस हफ्ते हुए पंचायत चुनाव में 3,317 ग्राम पंचायतों में से महज 220 और 341 पंचायत समितियों में से छह उसके हाथ लगीं और जिला परिषदों में खाता तक नहीं खुला.
उधर, विपक्ष भाजपा विरोधी ताकतों का भव्य तानाबाना बुनने में लगा है. 23 जून को पटना में उन्होंने इसके नमूने का प्रायोगिक परीक्षण किया, जिसमें 15 पार्टियां साथ आईं, और एक हफ्ते में वे बेंगलूरू में फिर मिल रहे हैं. उनका बुनियादी गणित यह है—उन्होंने भाजपा के 22.9 करोड़ वोटों से ज्यादा वोट हासिल करके भी उसकी 303 सीटों के खिलाफ महज 154 सीटें जीतीं, क्योंकि उन्होंने एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा. अगर वे साझा हित में एक हो जाएं और 'दो में दो जोड़कर पांच’ बना दें, तो क्या होगा? इसी कल्पना ने भाजपा को डरा दिया होगा. गुजरात और दूसरे राज्यों में पहले ही अधिकतम सीमा पर पहुंचने के बाद संभावित नुक्सान से बचना होगा. ऐसे में विपक्ष को तोड़ने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक का वक्त अब आ गया था.
महाराष्ट्र से बेहतर जगह भला क्या होती, जहां पिछले साल शिवसेना को तोड़कर वे पहली बढ़त हासिल कर चुके थे. 2019 में एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना को मिले कुल वोटों के साथ महाराष्ट्र विकास अघाड़ी के पास अजेय 55 फीसद वोटों का अंबार था. सेना में कड़ी मेहनत से डाली गई फूट भी विचाराधारा पर आधारित उस प्रेम संबंध के टूटने से दिल में लगी ठेस कम नहीं कर पाई थी.
उन्हें शायद यह भी लगा हो कि मौजूदा मुख्यमंत्री और उनके ढीले-ढाले घुड़सवार लोकसभा की लड़ाई के रणबांकुरे शायद न बन सकें. इसी ने ऑपरेशन लोटस के भाग 2 को तेजी से अंजाम देने के लिए उकसाया हो सकता है. अब एनसीपी को ही तोड़ना था. महत्वाकांक्षी अजित पवार, उनके साथ ताकतवर नेता शरद पवार के भरोसेमंद सहयोगी प्रफुल्ल पटेल और विधायकों के एक जत्थे को तोड़कर यह भी हासिल कर लिया गया. विपक्षी एकता के बड़े राजनीतिज्ञ पवार अपमानित हुए, और एमवीए पूरी तरह दिशाहीन हो गया, सो अलग.
अगली बारी 'महागठबंधन’ की मूल प्रयोगशाला बिहार की थी. 2019 में एनडीए का वोट शेयर 53 फीसद और इसके ठीक बाद 31 फीसद के साथ राजद+ था. मगर जद (यू) के 21.8 फीसद को जोड़ें तो पलड़ा दूसरी तरफ झुक जाता है. इसीलिए दोतरफा हमला हुआ. दोस्त से हौआ बने नीतीश कुमार का कद छोटा करने के लिए तीखी लड़ाइयां छेड़ दी गईं.
जीतन राम मांझी के एचएएम को तोड़ लिया गया, और चर्चा थी कि जद (यू) के साथ भाजपा वही कर सकती है जो एनसीपी के साथ किया. नीतीश अपने विधायकों से आपात वार्ता कर ही रहे थे कि हमला शुरू हो गया—सीबीआइ ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनके माता-पिता लालू यादव व राबड़ी देवी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पर भी यही तलवार लटकी है, जहां पार्टी में सेंध लगाने के लिए उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी निशाने पर हैं.
कर्नाटक में अब कांग्रेस सत्ता में है और 2019 की 28 में से शानदार 25 सीटें बचाए रखना चुनौती है. इसलिए वह छुईमुई जद (एस) के साथ दोस्ती गांठ रही है. कांग्रेस रूपी साझा दुश्मन की मौजूदगी ने भाजपा और के. चंद्रशेखर राव की बीआरएस को साझा हित में साथ आने के लिए फुसला लिया है. ज्यादा साहसी कोशिश तमिलनाडु में हो सकती है जहां भगवा पार्टी द्रविड़ छाया से बाहर आने को बेताब है.
द्रमुक को बदनाम करना, जैसा कि सेंथिल बालाजी के मामले में किया जा रहा है, दक्कन के गहनतम हिस्सों में पैठ बनाने की कुंजी है. आने वाले महीनों में भारत के राजनैतिक पटल पर कई टूट-फूट और उथल-पुथल की उम्मीद की जा सकती है. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन के साथ इंटरव्यू में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने दलबदल करवाने के आरोप के खिलाफ अपनी पार्टी का बचाव किया. उन्होंने कहा, ''महाराष्ट्र में एनसीपी में ही आंतरिक मतभेद थे, अजित पवार व अन्य इच्छा से आए, इस विश्वास के साथ कि वे भाजपा के साथ काम करके देश की बेहतर सेवा कर सकते हैं. उनका स्वागत करके हमने विचारधारा से कोई समझौता नहीं किया है.’’
इस हफ्ते की आवरण कथा में, सभी ब्यूरो के हमारे संवाददाता मई 2024 में लोकसभा चुनाव से बहुत पहले प्रमुख राज्यों में विपक्ष को भोथरा करने के भाजपा के गेमप्लान का कच्चा चिट्ठा खोल रहे हैं. मतदाता इन दांव-पेचों के बारे में क्या सोचते हैं, यह तो खैर तभी पता चल पाएगा.