अजित पवार पर भारी परिवार
एनसीपी के सूत्रों का कहना है कि दोनों नई नियुक्तियां पार्टी में दो विरोधी धड़ों के बीच संतुलन बिठाने की कवायद है

धवल कुलकर्णी
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर सत्ता की लड़ाई में उस वक्त अहम मोड़ आ गया जब 10 जून को पार्टी सुप्रीमो शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का ऐलान किया. सुले का पिता के राजनैतिक उत्तराधिकारी के तौर पर इस तरह राजतिलक कर दिए जाने के बाद तमाम नजरें उनके तेज-तर्रार चचेरे भाई और महाराष्ट्र के नेता विपक्ष अजित पवार पर हैं. अजित ने प्रभावी तौर पर एनसीपी में नंबर दो के तौर पर अपनी चचेरी बहन की नियुक्ति पर तत्काल कुछ कहने से मना कर दिया. उन्होंने मीडिया से कहा, ''मैं बहुत संतुष्ट हूं. यह (कयासबाजी) गैरजरूरी है.'' अजित ने नव नियुक्त पदाधिकारियों के समर्थन में ट्वीट भी किया.
शरद पवार ने 2 मई को एनसीपी नेताओं और समर्थकों को यह ऐलान करके चौंका दिया था कि वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोड़ देंगे. उस वक्त उनकी पार्टी का एक धड़ा भतीजे अजित की अगुआई में महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) से नाता तोड़कर भाजपा से हाथ मिलाने को आतुर बताया जा रहा था. माना जा रहा था कि पवार ने यह कदम पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश फूंकने और अजित को उनकी जगह दिखाने के मकसद से उठाया था. पवार के ऐलान का मकसद पूरा भी हो गया. मायूसी और बेचैनी की चीख-पुकार के बीच एनसीपी के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं, और दूसरी पार्टियों के कई राष्ट्रीय नेताओं ने भी, उनसे अपने कदम पर पुनर्विचार करने की मांग की. इस मंथन से और मजबूत होकर उभरने के बाद पवार ने 5 मई को अपना फैसला वापस ले लिया.
हालांकि अजित ने इससे इनकार किया कि वे भाजपा के साथ सौदेबाजी की कोशिश कर रहे थे, पर तमाम मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांच का सामना कर रहे एनसीपी के नेताओं का एक धड़ा कथित तौर पर ऐसा चाहता था. भाजपा के बड़े नेता और केंद्रीय मंत्री नारायण राणे ने कहा था कि अजित भाजपा की सीमारेखा पर थे. पार्टी के बहुत सारे विधायक भी अजित के प्रति वफादार बताए जाते थे. गौर करने वाली बात यह कि अपनी आत्मकथा के नए संस्करण के विमोचन में पवार के पद छोड़ने के ऐलान के बाद अजित एनसीपी के अकेले नेता थे जिन्होंने उनके फैसले का समर्थन किया. साथ ही उन्होंने पवार से पद पर बने रहने की गुजारिश कर रहे नेताओं को झिड़क तक दिया था. अलबत्ता जल्द ही वे अलग-थलग पड़ते दिखाई दिए. वे उस प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी नदारद थे जिसमें पवार ने इस्तीफा वापस लेने का ऐलान किया.
सुले को एनसीपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाना उम्मीद के मुताबिक ही था, पर पटेल की नियुक्ति ने कइयों को हैरान कर दिया. सूत्रों का कहना है कि पार्टी के दो प्रतिस्पर्धी धड़ों के बीच हितों का संतुलन बनाए रखने की गरज से दोनों को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. इनमें एक धड़ा शरद पवार के प्रति वफादार है, और दूसरा अजित की अगुआई वाला धड़ा है जो भाजपा के करीब आ रहा था. पटेल को दूसरे धड़े में माना जाता है. सुले को जिन राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई, उनमें महाराष्ट्र भी है, जो अजित का अधिकार क्षेत्र है. उन्हें एनसीपी के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण का भी अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इससे चुनावों के लिए पार्टी उम्मीदवारों के चयन में उनकी बात का खासा वजन होगा.
हालांकि एनसीपी के एक पदाधिकारी का कहना है कि सुले और पटेल की नियुक्तियां अजित के साथ सलाह-मशविरे के बाद की गईं. उन्होंने कहा, ''उनमें राष्ट्रीय भूमिका निभाने की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. उनका ध्यान महाराष्ट्र की राजनीति पर है, क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा अंतत: महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना है.'' एनसीपी में अजित के नजदीकी एक नेता यह भी कहते हैं, ''नेतृत्व में बदलाव के बावजूद कमान तो अजित दादा के हाथ में ही रहेगी. इस फैसले से पवार साहेब के वारिस के तौर पर सुप्रिया ताई के नाम पर मोहर लग गई है, पर महाराष्ट्र में तो अजित दादा को ही जमीन पर घट रही घटनाओं की रेशा-रेशा जानकारी रखने वाले जननेता के तौर पर देखा जाता है. दादा की हैसियत को कोई छू भी नहीं सकता, ऐसा हुआ तो पार्टी को झटका लगेगा.''
मगर एनसीपी के मजबूत आधार वाले पश्चिमी महाराष्ट्र के एक बड़े कांग्रेस नेता का कहना है कि यह ताजातरीन कदम अजित के पर कतरने की कोशिश थी. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के एक बड़े नेता कहते हैं, ''अजित को अब पता है कि अगर वे सीएम बनना चाहते हैं तो इस महत्वाकांक्षा का पूरा करने में बस एनसीपी ही मदद कर सकती है. वे भाजपा के साथ जाकर अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकते.''
पवार के परिवार से काफी समय से जुड़े रहे एक सहयोगी बताते हैं कि सुले को उनके पिता लंबे वक्त से तैयार कर रहे थे. वे कहते हैं, ''शरद पवार ने निर्णायक कदम तब उठाया जब 2019 में अजित ने विद्रोह करके देवेंद्र फडणवीस के साथ उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उन्होंने अपनी फौजों को लामबंद किया और तीन दिन के भीतर अजित को इस्तीफा देने पर मजबूर करके साबित कर दिया कि एनसीपी में उन्हीं का वर्चस्व है.'' उनका यह भी कहना है कि चचेरे पवार भाई-बहनों के बीच शक्ति प्रदर्शन में सुले अपनी जमीन पर मजबूती से टिकी रह सकती हैं.
सुले की नियुक्ति को ग्रामीण आधार वाली पार्टी को सौम्य, शहरी छवि देने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. प्रफुल्ल पटेल भी कॉर्पोरेट कंपनियों और दिल्ली में विभिन्न दूसरी पार्टियों के साथ नेटवर्किंग के लिए जाने जाते हैं.
हालांकि एनसीपी के विरोधी दावा करते हैं कि सुले और पटेल की नियुक्तियों से पार्टी के भीतर दरार चौड़ी ही होगी. एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना के प्रवक्ता और विधायक संजय शिरसाट दावा करते हैं, ''एनसीपी में दो खेमों के बीच फूट बढ़ सकती है. कयास लगाए जा रहे थे कि पटेल और अजित पवार पार्टी तोड़कर बीजेपी के साथ जाना चाहते थे. शरद पवार अब पटेल को अपनी तरफ लाकर अजित को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं.''
स्वाभाविक ही 'वंशवाद को आगे बढ़ाने' के आरोप भी लगाए गए. इसकी प्रतिक्रिया में सुले ने बेलाग-लपेट कहा, ''मैं स्वीकार करती हूं. घरानाशाही (पारिवारिक हुकूमत) तो है. मैं (इस आरोप से) भाग कैसे सकती हूं.'' हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि 'योग्यता' के आधार पर अपने प्रदर्शन से वे सांसद के रूप में अपनी काबिलियत साबित कर चुकी हैं. सुले पुणे के बारामती से तीन बार लोकसभा सांसद चुनी गई हैं और एक कार्यकाल राज्यसभा में भी रह चुकी हैं. पार्टी के पदानुक्रम में अपनी हैसियत भी सुले के मन में साफ थी, ''राष्ट्रीय स्तर पर मैं शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल को रिपोर्ट करूंगी. राज्य में... अजित पवार, छगन भुजबल और (राज्य एनसीपी प्रमुख) जयंत पाटील को.'' यह पूछे जाने पर कि क्या अजित को दरकिनार किया जा रहा है, उन्होंने कहा, ''यह सच नहीं है... वे नेता विपक्ष हैं, जो मुख्यमंत्री के समकक्ष पद है.''
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक विजय चोरमारे कहते हैं, ''अजित पवार क्या करेंगे? यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा... सुले भले ही कार्यकारी अध्यक्ष हों, इसमें शक नहीं कि महाराष्ट्र में पार्टी के मामलों में अजित की ही चलेगी.'' राजनीति में अजित पवार के लंबे अनुभव के मद्देनजर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि वे चुक गए.
अजित पवार: अब तक का राजनैतिक सफर
अजित पवार (63 वर्ष) का जन्म शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार और आशाताई के यहां 22 जुलाई, 1959 को हुआ
सहकारी क्षेत्र के जरिए राजनीति में आए
1991 में बारामती से लोकसभा में चुने गए; कुछ ही महीनों बाद चाचा शरद पवार के लिए सीट खाली कर दी, जो केंद्रीय रक्षा मंत्री बने
1999 में सत्ता में आई कांग्रेस-एनसीपी सरकार में अजित ने जल, ऊर्जा और वित्त सरीखे कैबिनेट पोर्टफोलियो संभाले. 2010-2014 तक उपमुख्यमंत्री रहे
2006 में चचेरी बहन सुप्रिया सुले के राजनीति में आने से पहले उन्हें शरद पवार का राजनैतिक उत्तराधिकारी माना जाता था
2019 में भाजपा के साथ कुछ दिनों की सरकार बनाई. एमवीए की सरकार बनने पर अजित को वित्त मंत्रालय के साथ उप-मुख्यमंत्री बनाया गया
सुनेत्रा पवार से शादी हुई, दो बेटे हैं, पार्थ और जय