रिश्तों में कड़वाहट
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी के धनंजय मुंडे से हार के बाद से ही पंकजा और भाजपा के बीच रिश्ते खराब होने लगे थे

धवल कुलकर्णी
महाराष्ट्र की पूर्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय सचिव पंकजा मुंडे ने इस माह की शुरुआत में काफी तीखा बयान दिया. यह इस बात का भी संकेत है कि खलिश कहीं-न-कहीं बढ़ती जा रही है. भाजपा के सहयोगी राष्ट्रीय समाज पक्ष (आरएसपी) की ओर से 31 मई को दिल्ली में आयोजित एक जनसभा में दिग्गज ओबीसी और भाजपा नेता रहे दिवंगत गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा ने एकदम बेबाकी से कहा, ''मैं तो भाजपा की हूं लेकिन भाजपा मेरी नहीं है.'' उसी दिन, उनकी बहन और बीड से भाजपा सांसद प्रीतम मुंडे भी पार्टी रुख के खिलाफ जाकर रेस्लिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह का विरोध कर रहे पहलवानों के समर्थन में खड़ी नजर आईं. फिर, 3 जून को भी अपने पिता की पुण्यतिथि के मौके पर एक कार्यक्रम में पंकजा ने दो-टूक कहा कि वे अपनी बात केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष रखेंगी. उन्होंने कहा, ''मेरे नेता अमित शाह हैं. मैं उनसे मिलूंगी और खुलकर चर्चा करूंगी.''
पुराने घाव मुश्किल से भर पाते हैं. वंजारी समुदाय से आने वाली मुंडे बहनों और भाजपा के बीच दरार तभी बढ़ गई थी जब 2019 के विधानसभा चुनावों में पंकजा मुंडे को अपने चचेरे भाई और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) नेता धनंजय मुंडे से करारी हार झेलनी पड़ी थी. पंकजा को उम्मीद थी कि भाजपा इसके बावजूद उन्हें एमएलसी के रूप में सदन में पहुंचा देगी या फिर उनकी बहन को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जगह दे देगी.
लेकिन ऐसा कुछ करने के बजाए पार्टी ने औरंगाबाद के पूर्व महापौर डॉ. भागवत कराड को राज्यसभा सांसद बनाया और फिर केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी सौंपी. और, लातूर के रमेश कराड को एमएलसी चुना गया. चूंकि ये दोनों भी वंजारी जाति से ही आते हैं, यह निश्चित तौर पर मुंडे बहनों के प्रति पार्टी के ठंडे रुख का संकेत था. जनवरी में, भाजपा ने औरंगाबाद में पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की एक जनसभा के लिए आमंत्रित लोगों की सूची में पंकजा का नाम तक नहीं रखा (वैसे, वे अंतत: इसमें शामिल हुईं). और फिर, अप्रैल में जीएसटी अधिकारियों ने कथित कर चोरी के सिलसिले में परली स्थित वैद्यनाथ चीनी मिल पर छापा मारा, जिसे मुंडे बहनें ही चलाती हैं.
गोपीनाथ मुंडे के पुराने सहयोगी और अब एनसीपी नेता एकनाथ खडसे को इस पर काफी अफसोस होता है कि भाजपा 1980 के दशक में महाराष्ट्र में बहुजन समाज के बीच पार्टी की पैठ बढ़ाने वाले राजनेता के परिवार की इस कदर अनदेखी कर रही है. वहीं, पंकजा के आक्रामक तेवरों ने कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और यहां तक कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के नेताओं का ध्यान खींचा है, जो अपनी-अपनी पार्टियों में उनके स्वागत को तैयार बैठे हैं. मुंडे की पुण्यतिथि पर एनसीपी नेता खडसे की तो पंकजा के साथ एक बैठक भी हुई थी.
धनंजय से पंकजा की सुलह के संकेत पहले ही मिलने लगे थे. बीते साल दिसंबर में दोनों ने तय किया था कि नथरा ग्राम पंचायत—जो मुंडे परिवार का गृह क्षेत्र है—के चुनाव निर्विरोध होंगे. टकराव रोकने के लिए पंकजा अगला विधानसभा चुनाव परली के बजाए अहमदनगर के पाथरडी से लड़ सकती हैं. बहरहाल, मौसम की तरह बदलते मिजाज के बीच इस बारे में कोई अनुमान लगा पाना मुश्किल है कि ऊंट किस करवट बैठेगा.