संकट मोचन में सुर सरिता

वाराणसी के प्रसिद्ध संकट मोचन परिसर में अनोखे संगीत समारोह के 100 वर्ष पूरे. पहली बार सात दिनी आयोजन में 13 मुस्लिम कलाकारों समेत रिकॉर्ड 180 कलाकार ले रहे हिस्सा

बात फूलों की...गजल गायक तलत अजीज वाराणसी के संकट मोचन संगीत समारोह में गजल पेश करते हुए
बात फूलों की...गजल गायक तलत अजीज वाराणसी के संकट मोचन संगीत समारोह में गजल पेश करते हुए

महादेव की नगरी वाराणसी के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर में बह रही भक्ति गंगा में श्रोता डुबकी लगाने को बेताब थे. 10 अप्रैल से शुरू हुए ''संकट मोचन शताब्दी वर्ष संगीत समारोह'' की दूसरी निशा पर शाम सात बजे जैसे ही ड्रम वादक पंडित शि‍वहरि ने ड्रम पर स्टिक फेरी तो थाप के साथ हर-हर महादेव का उद्घोष शुरू हो गया. इसी क्रम में प्रसिद्ध गजल गायक तलत अजीज ने पहली बार संकट मोचन संगीत समारोह के मंच पर अपनी हाजिरी लगाई तो रामपुर घराने के शास्त्रीय गायक अरमान खान भी पहली बार इस मंच पर गायन का मौका पाकर निहाल नजर आए. 

हनुमंतलला की ड्योढ़ी पर 100 साल पूरा करने वाला यह संगीत समारोह इस बार पहली बार 10 से 16 अप्रैल तक हफ्ते भर का आयोजन है जिसमें कुल 180 कलाकार 58 प्रस्तुतियों के जरिए अंजनीपुत्र के समक्ष अपनी कला के माध्यम से शीश नवा रहे हैं. मार्च 2006 में संकट मोचन मंदिर में आतंकी हमले के बाद हुए संगीत समारोह में विख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्ला खां के भांजे मुमताज ने पहली बार शहनाई वादन करके जिस सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल स्थापित की थी, वह इस बार और मजबूत हुई है. संकट मोचन शताब्दी वर्ष संगीत समारोह में पहली बार 13 मुस्लिम कलाकार प्रस्तुति दे रहे हैं. 

समारोह की औपचारिक शुरुआत वर्ष 1923 में मंदिर के तत्कालीन महंत पंडित बांकेराम मि‍श्र ने की थी. वर्ष 1957 में छह वर्ष की उम्र से संकट मोचन संगीत समारोह से जुड़े वयोवृद्ध पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य बताते हैं, ''संकट मोचन संगीत समारोह आज के गिने-चुने आयोजनों में से है जिसमे सांझ से भोर तक गाई जाने वाली प्रत्येक राग-रागिनी को अवसर मिलता है.'' 

'60 के दशक में पुरुष नर्तकों को पहली बार नृत्य प्रस्तुति की अनुमति मिली. '70 के दशक में पंडित वीरभद्र मिश्र संकट मोचन मंदिर के महंत बने. अमि‍ताभ भट्टाचार्य बताते हैं, ''देवालय संगीत की शुचिता में महिलाएं निषिद्ध थीं. शुरू में महिलाएं समारोह में आती तो थीं लेकिन महज दर्शक के रूप में. मंच पर उन्हें स्थान नहीं मिलता था.'' 70 के दशक के शुरुआती वर्ष में महंत वीरभद्र मिश्र ने इस वर्जना को थोड़ा शिथिल किया. संगीत समारोह में पहली महिला कलाकार के रूप में कंकणा बनर्जी जो अपने गुरु प्रताप नारायण के साथ तानपुरे में बैठीं और सुर लगा दिया. इसके बाद 1973 में पहली बार संयुक्ता पाणि‍ग्रही ने नृत्य प्रस्तुत किया. तभी से महिला कलाकारों को मंच मिलने लगा. 

वर्ष 1977-78 में संकट मोचन संगीत समारोह चार दिवसीय हो गया. राज्य संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पंडित राजेश्वर आचार्य बताते हैं, ''संगीत समरोह के विस्तार के क्रम में इसमें गैर सनातनी संगीत साधकों को भी अपनी भक्ति प्रस्तुतियों के लिए अवसर मिला. बाद में उपशास्त्रीय गायन के दरवाजे खुले तो पाकिस्तान से बड़े गुलाम अली खां ने भी हाजिरी लगाई.'' संगीत समारोह के लिए कलाकारों का चयन वर्तमान महंत विशंभरनाथ मिश्र और उनके चार सहयोगी करते हैं. समारोह में 60 प्रतिशत नामी कलाकार और 40 प्रतिशत नए उदीयमान कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है. कलाकार नि:शुल्क प्रदर्शन करते हैं तो दर्शकों से भी कोई शुल्क नहीं लिया जाता है.

10 अप्रैल को पहली निशा के मौके पर विवाद हो गया जब गायक जसवीर सिंह जस्सी ने आधी रात के बाद ''दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी... '' और ''कोका-कोका... '' जैसे गीत सुनाकर मनोरंजन किया. इसके बाद संगीत समारोह ''अखिल भारतीय संत समिति'' के निशाने पर आ गया. समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती कहते हैं, ''संकट मोचन के पूर्व के महंतों ने कभी भी फिल्मी कलाकारों को इस मंच पर जगह नहीं दी. पूर्वजों की परंपरा को दूषित होने से रोकने की जरूरत है.'' महंत प्रोफेसर विशंभरनाथ मिश्र किसी भी विवाद को खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ''कलाकार के लिए दर्शक ही भगवान हैं. और अगर दर्शक किसी खास गाने की मांग कर रहे हैं तो वह रोक नहीं पाते.''

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