दक्षिण में नया दांव
भाजपा 2019 के आम चुनाव में तेलंगाना में अपने प्रदर्शन के बूते इस दक्षिणी राज्य से काफी उम्मीदें लगाए हुए है

इन दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री और भारतीय राष्ट्र पार्टी (बीआरएस) के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) कांग्रेस को छोड़ बाकी विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने में जी जान से जुटे हैं. उनका मकसद है कि किसी तरह 2024 के आम चुनाव से पहले वे केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ एक गठबंधन बना लें. हालांकि अभी तक उनकी ये कोशिशें कोई ठोस आकार नहीं ले पाई हैं, दूसरी तरफ भाजपा जरूर केसीआर को उनके ही गढ़ तेलंगाना में बराबरी की टक्कर देने की रणनीति जमीन पर उतारती दिख रही है.
तेलंगाना में इसी साल अक्तूबर में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं. 119 विधायकों वाली तेलंगाना विधानसभा में भाजपा को 2018 के चुनावों में सिर्फ एक सीट हासिल हुई थी. इसके बावजूद पार्टी ने इस साल के 'मिशन 90' का लक्ष्य रखा है. 2018 की एक सीट और सिर्फ सात प्रतिशत की वोट हिस्सेदारी को देखते हुए यह लक्ष्य किसी सपने सरीखा लगता है लेकिन भाजपा नेता अपने दावों में इस बात को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हैं कि दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद तेलंगाना ही वह राज्य बनने वाला है, जहां भाजपा सरकार बना सकती है.
तेलंगाना में भाजपा के अधिक जोर लगाने की एक अहम वजह यह है कि विधानसभा के फीके नतीजों के बाद 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को राज्य की 17 में से चार सीटों पर जीत हासिल हुई. वहीं वोट प्रतिशत भी सात से बढ़कर 19.45 हो गया. यही नहीं, भाजपा कुल 21 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे आगे रही. भाजपा के एक राष्ट्रीय महासचिव कहते हैं, ''बीस से ज्यादा विधानसभा सीटों पर भाजपा की बढ़त ने पार्टी में एक नई उम्मीद जगाई कि अगर सही रणनीति के साथ मेहनत की जाए इस दक्षिण भारतीय राज्य में हम सत्ता में आ सकते हैं.''
तेलंगाना में अपना असर बढ़ाने के लिए भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद से ही तैयारी शुरू कर दी थी. राज्य से सिर्फ चार सांसद होने के बावजूद सिकंदराबाद से चुने गए जी. किशन रेड्डी को मोदी सरकार में बेहद महत्वपूर्ण गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया. इससे प्रदेश में रेड्डी का कद बढ़ा और जुलाई 2021 में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाकर दो मंत्रालय दिए गए. वहीं करीमनगर से लोकसभा चुनाव जीतने वाले बंडी संजय कुमार को मार्च, 2020 में तेलंगाना का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.
लोकसभा चुनाव के बाद जहां पार्टी ने प्रदेश में एक नई लीडरशिप खड़ी की तो दूसरी तरफ सांगठनिक स्तर पर भी कई काम किए. विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों में भाजपा अपनी तैयारियों को आजमाती भी रही. नवंबर, 2020 में दुब्बक सीट पर उपचुनाव हुआ तो तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के इस गढ़ में भाजपा ने सेंध लगा दी और पार्टी उम्मीदवार रघुनंदन राव ने जीत हासिल कर ली. इस सीट को टीआरएस का गढ़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि जिस सिदीपेट जिले में यह सीट है, केसीआर इसी जिले के रहने वाले हैं.
मई, 2021 में नागार्जुन सागर सीट पर हुए उपचुनाव में फिर से टीआरएस को जीत मिली. लेकिन नवंबर, 2021 में हुजुराबाद सीट पर उपचुनाव हुए. 2004 के बाद से टीआरएस इस सीट पर कभी नहीं हारी थी. इसके बावजूद भाजपा ने इस सीट पर 23,000 से अधिक वोटों से जीत हासिल की. नवंबर, 2022 में मानुगोड विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में टीआरएस ने जीत तो हासिल की लेकिन इसके लिए मुख्यमंत्री को खुद और अपनी पार्टी की पूरी मशीनरी यहां लगानी पड़ी. इस उपचुनाव में टीआरएस और भाजपा के बीच सिर्फ 4.5 फीसद वोटों का अंतर रहा. इसके अलावा 2020 में ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम की 150 सीटों में से भाजपा ने 58 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि 2015 में पार्टी को सिर्फ चार सीटें मिली थीं. ये नतीजे दिखाते हैं कि पार्टी ने तेलंगाना में पैर जमाने के लिए लिए जो कोशिशें की हैं, उनके सकारात्मक नतीजे उसे मिले हैं.
इन नतीजों से उत्साहित होकर भाजपा इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए कई स्तर पर तैयारियां कर रही है. पार्टी ने बीते साल जुलाई में हैदराबाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की थी. पार्टी ने पहले अपने राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ को तेलंगाना का प्रभारी बनाया था. लेकिन अगस्त, 2022 में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए सुनील बंसल को भी पार्टी ने तेलंगाना का प्रभारी बनाया. उत्तर प्रदेश में संगठन महामंत्री रहते हुए बंसल ने कुशल संगठनकर्ता की पहचान बनाई है.
प्रभारी बनने के बाद से वे लगातार तेलंगाना जा रहे हैं. उन्होंने कार्यकर्ताओं को 5 से 20 फरवरी के बीच पूरे राज्य की 119 विधानसभा सीटों के सभी मंडलों में 9,000 नुक्कड़ सभाएं करने के लिए कहा है. राज्य में इन सभाओं का आयोजन होने भी लगा है. तेलंगाना को लेकर पार्टी की रणनीतियों के बारे में भाजपा के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी बताते हैं, ''पार्टी ने सभी 119 विधानसभा सीटों के तकरीबन 35,000 बूथों के लिए बूथ अध्यक्षों की पहचान कर ली है. आने वाले दिनों में पार्टी के जे.पी. नड्डा का इनसे संवाद होगा. पार्टी अभी मंडल स्तर पर सभाएं आयोजित कर रही है. इसके बाद विधानसभा सीट के स्तर पर सभाएं होंगी. अप्रैल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एक बड़ी सभा संबोधित करेंगे और इसमें चंद्रशेखर राव सरकार के खिलाफ चार्ज शीट जारी करेंगे.''
भाजपा की इन रणनीतियों का मुकाबला करने के लिए प्रदेश की सत्ताधारी बीआरएस क्या कर रही है? इस सवाल के जवाब में बीआरएस विधायक और मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की बेटी के. कविता कहती हैं, ''वे सिर्फ चुनाव जीतने की मशीनरी पर यकीन करते हैं लेकिन हमारी पार्टी प्रदेश के लोगों की भावनाओं को समझती है. मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के साथ प्रदेश के लोगों का एक भावनात्मक जुड़ाव है और यहां भाजपा की रणनीतियां काम नहीं आने वालीं.''
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बंडी संजय कुमार तेलंगाना में भाजपा की संभावनाओं के बारे में बताते हैं, ''तेलंगाना के 80 प्रतिशत हिंदुओं ने मन बना लिया है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनानी है. यही वजह है कि बीआरएस अब एआइएमआइएम से दूरी दिखाने की कोशिश कर रही है. चंद्रशेखर राव की सरकार भ्रष्टाचार में बुरी तरह से लिप्त है और हम सबूतों के साथ इसे लोगों के सामने रखेंगे.''
हिंदुओं के ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार के आरोपों पर के. कविता कहती हैं, ''तेलंगाना में पहले भी भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम करने की कोशिश की है लेकिन कामयाब नहीं हुई.''
तेलंगाना में अपनी संभावनाओं को मजबूत करने के लिए भाजपा बीआरएस और कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को भी अपने पाले में ला रही है. केसीआर सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे इटाला राजेंद्रन भाजपा में शामिल हुए और उपचुनाव में उन्हें जीत हासिल हुई. मध्य तेलंगाना में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. बीआरएस के सांसद रहे कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी और नरसिंह गौड़ा भी भाजपा में आ चुके हैं. कांग्रेस के कुछ नेता भी भाजपा में आए हैं. भाजपा नेताओं का दावा है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे, भाजपा में शामिल होने वाले दूसरी पार्टी के नेताओं की संख्या और बढ़ेगी.
हालांकि ऐसा नहीं है कि केसीआर और उनकी पार्टी तेलंगाना में भाजपा की बढ़ती ताकत को लेकर आंखें मूंदे हुए है. पार्टी के एक नेता का कहना है कि भगवा पार्टी से निबटने के लिए बीआरएस वामपंथी पार्टियों के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने पर विचार कर रही है. इसके अलावा बीआरएस पूरे प्रदेश में सरकार की उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करने के लिए कई सभाएं भी करने जा रही है. भाजपा की तरफ से मिल रही चुनौतियों के बारे में के. कविता कहती हैं, ''चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना में जो काम किए हैं, उनकी वजह से हम निश्चिंत है कि भाजपा यहां कामयाब नहीं होगी.''
अपने-अपने इन दावों के बीच तेलंगाना विधानसभा चुनाव भाजपा की दक्षिण विस्तार और केसीआर की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए भी बेहद अहम साबित होगा.