आ अब भाग चलें
बिहार के नौजवान सदियों पुराने रीति-रिवाज ताक पर रखकर अपनी मोहब्बत के लिए शादी कर रहे हैं. मगर जातियों के खांचे में गहरे धंसे समाज की पिछड़ी मानसिकता उन्हें अक्सर भागने को मजबूर कर देती है—कभी न लौटने के लिए. और जब वे स्वीकृति पाने की कोशिश करते हैं तो नतीजे त्रासद हो जाते हैं

अमिताभ श्रीवास्तव
''लव करके भागे हैं घर से, बिहार लौट न पाएंगे, ठीक है?''
इश्क-मोहब्बत भारत और खासकर इसके उत्तरी हिस्सों के दूरदराज के कस्बाई इलाकों में हल्के लफ्ज नहीं हैं. यह निहायत संजीदा बात है. थोड़ा-सा भी ऊंच-नीच होने पर जिंदगी से हाथ धोना पड़ सकता है. ऊपर जिस भोजपुरी गाने की पंक्ति लिखी है उसने 2019 में बिहार में रिलीज होते ही धूम मचा दी थी. सीधे-सादे शब्दों में यह गाना इसी बात को तो बयां करता है. पुरातन जाति व्यवस्था के सख्त शिकंजे में रत्ती भर भी ढील आती दिखाई नहीं देती मगर नौजवान वही कर रहे हैं जिसमें उन्हें आदिकाल से महारत हासिल है: जवान होना और प्रेम में पड़ना. रीति-रिवाजों के फौलादी शिकंजे को धता बताकर वे इश्क-मोहब्बत की नाजुक डोर थाम रहे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें देस ही क्यों न छोड़ना पड़े. लब्बोलुआब यह कि प्रेम में पड़कर बहुत-से युवा शादी करके भाग रहे हैं. उस गीत के तमाम संस्करणों को यूट्यूब पर अब तक 8 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं. वह तो इन वक्तों का जीवनगीत हो सकता है. या फिर तेजी से बदलते समाज की एक जीती-जागती तस्वीर.
बिहार पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2020 के मुकाबले 2022 में भागकर शादी करने के मामलों में 37 फीसद का इजाफा हुआ है. भारत में भागने को ''अपहरण'' के तौर दर्ज किया जाता है क्योंकि माता-पिता इसी शब्दावली में मामला दर्ज करवाते हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2021 की रिपोर्ट में ''विवाह के लिए अपहरण'' के मामलों में उससे पहले के साल के मुकाबले 23 फीसद की बढ़ोतरी हुई. आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार में 2020 में 5,378 महिलाओं का ''शादी के लिए अपहरण'' किया गया. एक साल बाद यह आंकड़ा छलांग लगाकर 6,608 पर पहुंच गया.
''हम घर नहीं लौट रहे हैं.'' इन शब्द यथार्थ की शक्ल लेकर आसपास आ खड़े होते हैं. यह उन संदेशों का लब्बोलुआब है जो बिहार के बंटी और बबली भागने के बाद पोस्ट कर रहे हैं. यही वह अकेली तरकीब है जिसे वे अपने बड़ों की घुड़कियों के आगे आजमा रहे हैं. इसी साल अगस्त में जब वैशाली के विशाल पासवान अपनी गर्लफ्रेंड बंधन के साथ भागे, उन्होंने लड़की के माता-पिता की ओर से दर्ज अपहरण की एफआइआर का खंडन करते हुए सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया. उसी महीने दरभंगा की रूपांजलि कुमारी राजकुमार दास के साथ भाग गईं और उन्होंने मंदिर में शादी कर ली. अपने वीडियो संदेश में इस जोड़े ने अपहरण की एफआइआर गलत साबित करने और यह बताने के लिए कि वे बालिग थे, अपने पहचान के प्रमाणपत्र दिखाए. ये वीडियो रणनीतिक कदम होते हैं ताकि अपहरण की किसी भी एफआइआर की जांच करने के कर्तव्य से बंधी पुलिस कोई कड़ा कदम न उठाए. अदालत में आत्मसमर्पण करने की स्थिति में भी यह मदद करता है.
मगर भागने वाले ज्यादातर जोड़े परिवारों के हिंसक प्रतिशोध के अंदेशे से महीनों लुकाए रहते हैं. सुलह या फिर उनके रिश्ते को मंजूरी तो विरले ही मिल पाती है. ज्यादातर मामले ''अपराध'' के तौर पर दर्ज रहते हैं. एक अपवाद अगस्त में रचा गया. कहानी फरवरी में शुरू हुई जब 21 बरस की ब्राह्मण लड़की ईशा इंस्टाग्राम पर 24 बरस के कुर्मी समुदाय के लड़के स्मित राज से मिली. वे फौरन एक दूसरे को पसंद करने लगे. उधर मोहब्बत के इस खिलते फूल से अनजान ईशा के पिता उसके लिए शादी के प्रस्तावों की तलाश में थे. ईशा के पास सोच-विचार करके कदम उठाने के लिए ज्यादा वक्त न था. उसने अपने दिल की आवाज सुनी और भाग गई.
कमबख्त, ये लड़कियां
कहानी के दूसरे पहलू पर बढ़ने से पहले एक और पहलू पर भी गौर कर लेना लाजिमी है. वह यह कि पुरातनपंथी समाज घर की बेटी की पसंद, सहमति और इच्छा जानने से डरता है. कानून की शब्दावली इसका ख्याल तक रखने में नाकाम रहती है. अपराध के रूप में उसके पास यही दर्ज करने को रह जाता है कि लड़का लड़की को भगा ले गया. अपनी पीएचडी के लिए हिंदू विवाह के बदलते पैटर्न पर काम करने वालीं और पटना विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की सहायक प्राध्यापिका डॉ माधवी का मानना है कि यहां कुछ तो क्रांतिकारी किस्म की घटना घट रही है. वे कहती हैं, ''सिर्फ लड़कियों की और भागने में उनकी रजामंदी की बात करें तो कह सकते हैं कि बिहार के समाज में जबरदस्त फर्क आया है. मानसिकता में यह बदलाव अभूतपूर्व है.'' इसकी कुछ साफ वजहें हैं—मसलन, पढ़ाई और कामकाज के बढ़ते मौके. राज्य में लड़कियों के लिए नौकरियों में 35 फीसद आरक्षण है और इसके चलते ग्रामीण अंचलों के मां-बाप तक ने रोकना-टोकना छोड़ दिया है.
इसमें दूसरी तमाम और वजहों को जोड़ लीजिए: सस्ता इंटरनेट, स्मार्टफोन, बाहर की दुनिया से साबका. बिहार में 2014 में महज 80 लाख लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते थे, जो सितंबर 2020 तक जबरदस्त बढ़ोतरी के साथ 3.93 करोड़ हो गए. पटना हाइ कोर्ट के वकील संजीव कुमार कहते हैं, ''इसने लड़कियों को घर पर रहकर भी बात करने और नए दोस्त बनाने के मौके दिए. जाति और धर्म की पुरानी दीवारें अब भी कायम हैं पर नौजवान इन रुकावटों को तोड़ने को बेताब दिख रहे हैं. मगर कई बार उनके पास भागना ही अकेला विकल्प होता है.'' डॉ. माधवी इसे ऐसे बदलाव की अभिव्यक्ति के तौर पर देखती हैं जिसे काबू नहीं किया जा सकता. उनके अनुसार, ''यह होना ही है. मुमकिन है कि कई मामलों में जोश में कदम उठाए गए हों पर लड़कियां अक्सर सोच-विचारकर फैसला करती हैं. वक्त आ गया है जब मां-बाप संजीदा ढंग से बर्ताव करें.''
और कुछ वाकई ऐसा करते भी हैं. ईशा के मामले को ही लीजिए. उन्होंने और स्मित ने भागलपुर के एक मंदिर में शादी कर ली और उन्हें महज एक दिन के लिए भागना पड़ा. उन्होंने पहले स्मित के माता-पिता से संपर्क किया, जो उन्हें स्वीकार करने को राजी हो गए. एक हफ्ते बाद ईशा के माता-पिता भी मान गए. डॉ. माधवी के नजरिए से देखें तो यह अभिभावकों के परिपक्व होने की निशानी है.
आंकड़े काले-सफेद में
पर बदकिस्मती से संकेत तो यही हैं कि बहुत बड़ी तादाद में मां-बाप और परिवार अभी इस अवस्था में नहीं पहुंच सके हैं. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि प्रेम प्रसंग के चलते 2020 में 170 और 2021 में 174 हत्याएं हुईं. यानी हर दो दिन में प्रेम प्रसंग को लेकर तकरीबन एक हत्या. (ये नाजायज रिश्तों को लेकर हुई हत्याओं से अलग हैं). इस मोर्चे पर बिहार भारत के तीन बदतरीन राज्यों में है. ऐसी कुल हत्याओं में से 11 फीसद से ज्यादा यहीं होती हैं.
प्यार-मोहब्बत का उफनता सैलाब भी शायद इस जवाबी हिंसा को उकसाता है. बिहार पुलिस अलग से रिकॉर्ड रखती है, जिसमें उसने 2022 के महज पहले आठ महीनों में 'विवाह के लिए अपहरण' के 2,571 मामलों को पहली नजर में रजामंदी से भागने के खाने में रखा. इसका मतलब है बिहार में जोड़ों के भागने के रोज औसतन 11 मामले सामने आते हैं. पूरे 2020 में ऐसे मामले 2,817 ही थे. यह 37 फीसद का उछाल है. दरअसल प्रेमियों के भागने के मामले 2022 में अपहरण के कुल मामलों के 31 फीसद हैं. अगर हम इसमें विवाह के लिए अपहरण (जिनमें पुलिस को उनके रजामंदी से होने का पूरा यकीन नहीं है) के तौर पर दर्ज 3,556 मामले भी जोड़ लें तो आंकड़ा 6,227 पर पहुंच जाता है. इस तरह ऐसे मामले 2022 में बिहार में दर्ज अपहरण के कुल मामलों के 77 फीसद पर पहुंच जाते हैं.
पटना के एक शीर्ष पुलिस अफसर कहते हैं कि जमीनी हकीकत की पूरी मालूमात होते हुए भी एनसीआरबी इस डेटा को अलग-अलग नहीं करता. पटना के वकील के.डी. मिश्र इसका समर्थन करते हुए कानून के धुंधले पहलुओं के बारे में बताते हैं, ''सभी एफआइआर में आरोपी के खिलाफ अंतत: आइपीसी की धारा 366 लगाई जाती है, जो अपहरण या शादी के लिए महिलाओं को लुभाने से जुड़ी है, जिससे भागने का हर मामला तकनीकी तौर पर अपराध बन जाता है.'' लिहाजा ऐसे फलक पर जहां पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने विकल्प चुन रही हैं और नीतीश कुमार की सरकार अंतर-जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को 1 लाख रुपए का अनुदान दे रही है, इसे नकारात्मक सांचे में ढाला जाता है. पटना के पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले प्रो. घनश्याम यादव कहते हैं, ''लड़कियों के माता-पिता इश्क-मोहब्बत और खासकर अंतर-जातीय प्रेम को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पर दाग की तरह देखते हैं. इसलिए यह उन्हें हिंसा तक के लिए उकसाता है.''
पटना में डीजे सेवा मुहैया करने वाले 22 वर्षीय राहुल कुमार उर्फ छोटू उस असहिष्णुता के ताजातरीन शिकार में से एक थे. कोविड की पाबंदियां हटने के साथ शादियों के इस सीजन में वे अच्छे कारोबार की उम्मीद कर रहे थे. यहां तक कि उन्होंने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ भागने की योजना भी महीने भर के लिए मुल्तवी कर दी थी. 7 दिसंबर उनके लिए बड़ा दिन होना था. जोड़े ने उस दिन अपनी शादी रजिस्टर करवाने के बाद भागने का मनसूबा बनाया था और उन्हें शादी का प्रमाणपत्र लेकर नए साल में ही लौटना था. मगर उनकी गर्लफ्रेंड के भाई विकास को इस योजना की भनक लग गई. 6 नवंबर को विकास और उसके गैंग ने छोटू को बुरी तरह मारा-पीटा. अगले दिन उन्होंने अस्पताल में दम तोड़ दिया. छोटू की मां पिंकी देवी इस त्रासदी से उबर नहीं पा रही हैं. मगर घनघोर पीड़ा में भी वे जिन भावनाओं को जुबान देती हैं, काश दूसरे माता-पिता भी उनका अनुकरण कर पाते. लगातार सुबकते हुए वे कहती हैं, ''हम तो बेटे को अपनी पसंद की किसी भी लड़की से शादी करना स्वीकार लेते. अब हमें न्याय कौन देगा?''
मुजफ्फरनगर में 30 अक्तूबर को अयान की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई जब वह छठ के दौरान नदी किनारे अपनी गर्लफ्रेंड से मिल रहा था. जुलाई में छोटू यादव को उसकी गर्लफ्रेंड आरती के परिवार ने मार डाला. जून में 26 वर्षीय मोनू रॉय को उनकी पत्नी पूर्णिमा के पिता सुनील पाठक और भाई प्रभात ने उनके भागकर शादी करने के एक साल बाद गोली मारकर कत्ल कर डाला. वे जल्द ही इस उम्मीद में लौटे थे कि चीजें दुरुस्त हो गई होंगी. वे बिहार में पीढ़ियों के बीच एक नए युद्ध की भेंट चढ़ गए, जिसमें बेधड़क और निर्भीक नौजवान पुरानी दुनिया को मुंह चिढ़ा रहे हैं.
पिंजड़ा तोड़ते
भागकर शादी करने के मामलों में बिहार में खासी तेजी आई है. पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि 2020 के मुकाबले 2022 में ऐसे मामलों में करीब 36 फीसद का उछाल आया है.
भागकर शादी करने के करीब सभी मामलों में लड़की के परिजनों ने लड़के पर आइपीसी की धारा-366 के तहत अपहरण का मामला दर्ज करवाया है. पुलिस को ऐसे मामलों की जांच करनी होती है सो भागने वाले जोड़े अक्सर सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट करते हैं और यह बताते हैं कि उन्होंने आपसी सहमति से यह कदम उठाया है.
भागने वाले जोड़े अगर बाद में अपने परिवारों की सहमति हासिल करने की कोशिश करते हैं तो कई बार उन्हें इसके बुरे अंजाम भुगतने पड़ते हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक प्रेम-प्रसंगों के मामले में 2020 में 170 और 2021 में 174 हत्याएं हुई थीं. जोड़े