प्रधान संपादक की कलम से
वैसे भाजपा को भरोसा है कि ब्रांड मोदी कायम है और फल-फूल रहा है. इस ब्रांड पर अत्यधिक निर्भरता कांग्रेस के लिए इंदिरा गांधी की अहमियत की याद दिलाती है

अरुण पुरी
गुजरात ने अपनी बात कही और हिमाचल प्रदेश ने अपनी. दोनों इस ढंग से बोले कि हम 2024 के आम चुनाव की राह पर बढ़ते हुए कुछ अहम निष्कर्ष निकाल सकें. गुजरात में किसी भी पार्टी को मिली अब तक की सबसे ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिखा दिया कि भारतीय राजनीति में उनका ब्रांड अब भी बेमिसाल क्षमता और शक्ति से ओतप्रोत है. कहानी के दूसरे पहलू भी उतने ही दिलचस्प हैं. आम आदमी पार्टी ने हालांकि गुजरात में महज इकाई अंकों में सीटों से खाता खोला पर वोट उसने दहाई अंकों में बटोरे. वह तसल्ली कर सकती है कि अब वह बाकायदा एक राष्ट्रीय पार्टी है. टूटती-छीजती कांग्रेस ने गुजरात में पराजय से अपने जिद्दी अवसान की ओर बढ़ना जारी रखा हालांकि हिमाचल प्रदेश में अच्छी जीत से उसने थोड़ी लाज बचा ली.
कुल 182 में से 156 सीटें! वह भी 27 साल सत्ता में रहने के बाद. इसमें भी करीब एक दशक ऐसा जिसमें मोदी गृह राज्य को ज्यादा समय नहीं दे सके. उन्हें जमीनी स्तर पर हर तरह के असंतोष को दूर करना था क्योंकि गुजरात महज एक राज्य नहीं है. यह मोदी के अफसाने से अटूट रूप से जुड़ा राज्य है. इसे अजेय और अभेद्य साबित करना 2024 की पूर्वशर्त थी. इसीलिए कुछ भी भगवान भरोसे नहीं छोड़ा गया. पिछले साल प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री सहित पूरे मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया था और टिकट बांटते समय भाजपा ने 99 मौजूदा विधायकों में 42 को टिकट नहीं दिए. मोदी ने गुजरात में 13 दिन बिताए, 31 जनसभाएं और तीन रोडशो किए, जिनमें पूरे अहमदाबाद में 50 किमी लंबा भव्य जुलूस भी था.
उनके माइक से निकले 'आ गुजरात मैं बनाव्यू छे' के नारे ने गुजरात की अस्मिता को बड़े करीने से उनकी शख्सियत से जोड़ दिया. उन्होंने चाहा कि लोग अपनी वसीयत एक बार फिर उनके नाम कर दें, और लोगों ने कर दी. पर इस लड़ाई का ताना-बाना बुनते हुए मोदी की नजर महज इतिहास—माधवसिंह सोलंकी के रिकॉर्ड या खुद अपने—पर ही नहीं थी. यह आने वाले कल के बारे में भी उतना ही था जितना बीते कल के बारे में. अगर वे चुनावों की परखनली में ब्रांड मोदी की टिकने की क्षमता जांचना चाह रहे थे, तो इसलिए कि यह 2024 के लिए भाजपा का जादुई चिराग है और यह देखना बेहद जरूरी है कि कितनी चमक के साथ यह अब भी जलता है.
ध्यान रहे, 2023 में पांच राज्यों के मुश्किल चुनाव होने हैं और हर राज्य गुजरात नहीं होता. भाजपा के लिए चुनौती स्पष्ट है. पहला कर्नाटक है जहां कांग्रेस के जीतने की अच्छी संभावना है, खासकर अगर राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को मिली प्रतिक्रिया देखें. बोम्मई सरकार रोज एक नए लफड़े में फंस रही है और उसे सत्ता विरोधी भावना झेलनी पड़ सकती है. फिर हिंदीपट्टी के तीन राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान हैं, जो 2018 में कांग्रेस ने बड़े गाजे-बाजे से जीते थे. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पांच साल की हुकूमत के बाद फ्रंट-फुट पर नजर आते हैं, हालांकि उन्हें अंदरूनी फूट का सामना करना पड़ रहा है. भाजपा में उनका कोई भरोसेमंद प्रतिद्वंद्वी दिखता नहीं. पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का ब्रांड फीका पड़ गया लगता है.
मध्य प्रदेश में भाजपा ने दलबदल के बूते सत्ता फिर हासिल कर ली थी. मगर गद्दीनशीन शिवराज सिंह चौहान के साथ वहां सुस्ती और थकान है, जो 2018 के बाद दो साल छोड़ दें तो 2005 से मुख्यमंत्री हैं. इसीलिए पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ राज्य में एक बार फिर अपनी संभावनाओं को लेकर प्रफुल्लित हैं. राजस्थान में भाजपा मुख्यमंत्री पद के कई दावेदारों और खासकर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बारे में तय नहीं कर पाई है. वहां गद्दीनशीन अशोक गहलोत को हटाना आसान नहीं, पर पायलट के साथ उनकी अदावत राजस्थान में कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकती है. तीनों ही राज्यों में कमजोर नेतृत्व भाजपा की ओर ताक रहा है, जो केवल और केवल मोदी फैक्टर पर भरोसा करने का नतीजा है. उसके लिए अच्छी बात इतनी है कि अलसाई कांग्रेस भी अंदरूनी फूट से उतनी ही तार-तार है. हिमाचल की जीत से शायद कांग्रेस का मनोबल बढ़े और गुजरात तथा एमसीडी में भयावह नतीजे खून में कुछ ऑक्सीजन का संचार करने को उसे प्रेरित करें. उसके बाद तेलंगाना का मुकाबला है, जहां नई टकसाल में ढली भाजपा की राज्य इकाई केसीआर की भारी-भरकम ताकत से भिड़ने को तैयार है.
अलबत्ता जिन तीन राज्यों में भाजपा 2018 में हार गई थी, उन्होंने दिलचस्प विरोधाभास पेश किया है. 2019 के आम चुनाव में पार्टी ने इन राज्यों की कुल 65 सीटों में से तीन को छोड़ सब अपनी झोली में डाल लीं. पर यह अप्रत्याशित घटना के बूते हुआ—पुलवामा/बालाकोट के बाद मोदी का नेतृत्व कौशल इस तरह तमाम दूसरी चीजों पर हावी हो गया. फिर झारखंड (2019) और पश्चिम बंगाल (2021) समेत सिलेसिलेवार चुनावी झटकों के बाद 2022 में अहम राज्य उत्तर प्रदेश ने पार्टी के लिए पासा पलटा. और फिर गुजरात में जलवा.
मगर 2023 के मुश्किल मुकाबलों के अलावा, कुछ ऐसे बड़े राज्यों में पक्के तौर पर यह भविष्यवाणी नहीं की जा सकती कि ऊंट किस करवट बैठेगा. महाराष्ट्र अगले साल भाजपा को अपने धनवान स्थानीय निकायों में पैठ बनाने का मौका देगा, पर शिव सेना में टूट के बाद यह राज्य एक राजनैतिक भंवर में है. भगवा पार्टी के लिए इससे ज्यादा दिक्कत की बात यह है कि नीतीश कुमार के वापस सेकुलर महागठबंधन में जाने के बाद बिहार में समीकरण बदल गए हैं. लिहाजा मोदी की भाजपा अजेय जमीनी ताकत होने की जो छाप छोड़ती है, इसे 2024 के पहले बनाए रखना काफी मुश्किल होगा. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के रूप में भाजपा के पास एक मजबूत स्थानीय नेता है, पर वहां भी विपक्षी दलों के एकजुट होने के आसार हैं.
दूसरे मोर्चों पर भी सत्तारूढ़ पार्टी नैरेटिव को कैसे संभालती है, यह देखना दिलचस्प होगा. अर्थव्यवस्था में सुस्ती कायम है और वैश्विक एजेंसियां अगले दो-एक सालों के लिए भारत की ग्रोथ रेटिंग कम करती जा रही हैं. मंदी की ओर बढ़ते और टकरावों से तार-तार वैश्विक फलक पर नौकरियों के मोर्चे पर चमत्कार कर दिखाना आसान न होगा. नए जनादेश के लिए जाने तक मोदी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में एक दशक पूरा कर चुके होंगे. हिमाचल और दिल्ली में जो सत्ता विरोधी लहर दिखी, उसे केंद्र में कारक बनने से लंबे समय तक रोका नहीं जा सकता.
यही वजह है कि अयोध्या में राम मंदिर के होने वाले उद्घाटन और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर लगातार ध्रुवीकरण के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदुत्व सरीखी थीम पर 'विराट नैरेटिव' रचने की ही उम्मीद की जा सकती है. वैसे भाजपा को भरोसा है कि ब्रांड मोदी कायम है और फल-फूल रहा है. इस ब्रांड पर अत्यधिक निर्भरता कांग्रेस के लिए इंदिरा गांधी की अहमियत की याद दिलाती है. फिलहाल भाजपा का संगठनात्मक दिमाग 2024 की राह पर आंखें गड़ाए मजबूत और चौकन्ना है, जबकि विपक्षी पार्टियां बेतरतीब और अस्तव्यस्त हैं.