प्रधान संपादक की कलम से

योगी सरकार अंसारी की ताकत मानी जाने वाली उसकी संपत्तियों को कुर्क और नीलाम कर रही है. उसकी दलील है कि अपराध और अपराधियों को लेकर उसकी नीति जीरो टॉलरेंस की है

20 मार्च, 2013, 3 जुलाई, 2013 का आवरण
20 मार्च, 2013, 3 जुलाई, 2013 का आवरण

अरुण पुरी

माफियाओं के कारनामों के चर्चे देश और दुनिया में नए नहीं हैं. मारियो पूजो के उपन्यास पर बनी, विश्व सिनेमा में कालजयी मानी जाने वाली फिल्म गॉड फादर के 'नायक' माफिया डॉन कार्लियॉन को कौन न जानता होगा. अपने यहां भी मुंबई के हाजी मस्तान और करीम लाला से लेकर बिहार में शहाबुद्दीन और आनंद सिंह तथा उत्तर प्रदेश में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया तक की करतूतों के किस्से दशकों से सुने-सुनाए जाते रहे हैं. पर हाल के वर्षों में खासकर उत्तर प्रदेश में इस कड़ी में जिसकी करतूतें सबसे ज्यादा चर्चा में आईं, वह है मुख्तार अंसारी. कानून-व्यवस्था को चुनौती देने के साथ उसने पुलिसवालों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ बनाया हुआ था. लेकिन उत्तर प्रदेश में मार्च 2022 में दोबारा सत्ता में आई भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इस कुख्यात माफिया और उसके कारनामों को जैसे अपनी नाक का सवाल बना लिया. उसी का नतीजा है कि करीब चार दशक से सक्रिय मुख्तार को हाल ही में पहली बार अदालत से सजा हुई. 2003 में लखनऊ जेल में जेलर को जान से मारने की धमकी देने के मामले में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने उसे सात साल की और गैंगस्टर ऐक्ट के एक मामले में पांच साल की सजा सुनाई है.

मुख्तार पिछले साल अप्रैल में तब देश भर में सुर्खियों में छा गया था जब पंजाब की रूपनगर जेल में दो साल बिताने के बाद उसे उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में लाया गया था. उसे अंदेशा था कि यूपी की पुलिस उसे एनकाउंटर में मार डालेगी. इन्हीं अंदेशों के बीच पहले उसे पंजाब ले जाया गया था. फिलहाल बांदा की जेल में ही बंद मुख्तार पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर, मऊ, वाराणसी और लखनऊ समेत कई जिलों में कुल 59 मुकदमे दर्ज हैं. और इस तथ्य की विडंबना देखिए कि उसके खिलाफ पहला आपराधिक मामला, वह भी कत्ल का, 1988 में गाजीपुर सदर कोतवाली में दर्ज किया गया था. वहां उसने मंडी परिषद का ठेका दिलाने के लिए ठेकेदार सच्चिदानंद राय का कत्ल कर दिया था. यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है.

मुख्तार इस बात का जीता-जागता सबूत है कि तरह-तरह के अपराधों के जरिए एक माफिया तंत्र कैसे जड़ें जमाता है और फिर धनबल के बूते अपने काले कारनामों को ढकने के लिए जनबल जुटा लेता है. एक क्लासिक मामले में तो उसने सरकारी जमीन पर ही कब्जा करके गोदाम बनवाया और उसे सरकार को ही किराए पर देकर पैसा उगाहने लगा. बेशक इसमें पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के लोगों की मिलीभगत और हिस्साबंटाई का बड़ा रोल रहता ही है. साथ न आने वालों को उसने पुचकार कर साथ लाने, धमकाने या फिर किनारे लगा देने तक की तरकीबें अपनाईं. यहां तक कि जेलों तक में उसने पैसों के बूते अपने ऐशगाहें बनाईं. इस काम में वह कितना सिद्धहस्त है इसकी जानकारी बांदा में हो गई. इसी साल जून में जब बांदा जिला प्रशासन ने मंडल जेल कारागार में छापामारी की तब पाया कि कई जेल कर्मचारी उसकी पूरी आवभगत में लगे थे.

अपराधियों पर अपने सख्त रवैए के लिए चर्चित रहे यूपी के पूर्व डीजीपी बृजलाल से पूछिए तो वे उसकी कार्यशैली के बारे में बताएंगे, ''मुख्तार बेहद शातिर दिमाग अपराधी है. आम तौर पर वह खुद कोई अपराध नहीं करता, बल्कि करीबी लोगों के हाथों अंजाम दिलाता है. गवाहों को मारकर, खरीदकर या डराकर वह पक्ष में माहौल बनाता है. नवंबर, 2005 में पूर्व भाजपा विधायक कृष्णानंद राय हत्याकांड और जेल अधीक्षक आर.के. तिवारी हत्याकांड के दौरान मुख्तार जेल में बंद था.''

यह वही मुख्तार अंसारी है जिसके दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी आजादी की लड़ाई के दौरान 1926-27 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे. दिल्ली में एक सड़क का नाम उनके नाम पर रखा गया है. मुख्तार के पिता सुब्हानुल्लाह अंसारी कम्युनिस्ट नेता थे. पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख्तार के चाचा लगते हैं. पर मुख्तार अपने भाइयों और बीवी-बच्चों को अपराध तथा उगाही के विशाल नेटवर्क में शामिल कर खुद रॉबिन हुड बन बैठा.
पांच बार विधायक रहे मुख्तार ने दूसरे गैंगस्टरों की तरह सियासत को ढाल बनाया. कभी बसपा, कभी सपा तो कभी खुद की पार्टी बनाकर वह चुनाव जीतता रहा. बड़े सरकारी ठेकों में वर्चस्व स्थापित कर गरीबों की मदद करता था.

इस रणनीति से मुख्तार के समर्थकों की संख्या बढ़ती चली गई. सन् 2000 के बाद एक दूसरे माफिया बृजेश सिंह से टकराव के चलते वह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का केंद्र भी बनने लगा. 2014 में तो उसने वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने का ऐलान किया पर बाद में सांप्रदायिक आधार पर वोटों के बंटवारे की दलील देते हुए पीछे हट गया. उसका एक बेटा और भतीजा तो इस साल के चुनाव में विधायक भी बने.

योगी सरकार अंसारी की ताकत मानी जाने वाली उसकी संपत्तियों को कुर्क और नीलाम कर रही है. उसकी दलील है कि अपराध और अपराधियों को लेकर उसकी नीति जीरो टॉलरेंस की है. लेकिन हिंदू पहचान वाली भाजपा की सरकार इस तर्क के साथ जिस तरह से मुख्तार को घेर रही है, उससे सवाल भी खड़े हुए हैं. गाजीपुर से सांसद, मुख्तार के भाई अफजाल तभी तो तंज कसते हैं कि अंसारी परिवार को जन समर्थन और पूर्वांचल में अपनी हार को भाजपा पचा नहीं पा रही है. वे कहते हैं, ''गाजीपुर की माफिया लिस्ट में नाम तो बृजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह के भी हैं लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.''

इन पहलुओं पर बहसें जारी रहेंगी लेकिन मुख्तार अंसारी पर चल रहा प्रशासनिक और अदालती तंत्र का कोड़ा इस बात का प्रमाण है कि आप बहुत लंबे समय तक सिस्टम की आंखों में धूल नहीं झोंक सकते.

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