दिल्ली की हवा में कौन-कौन सा जहर

दिल्ली जब धूल और धुएं की इस चादर से ढक जाती है, ज्यादातर लोगों को नाक बहने से लेकर अस्थमा और दूसरी कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है

हवा में जहरः राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की नियति बन गई
हवा में जहरः राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की नियति बन गई

पिछले कई सालों से दीवाली के ठीक बाद कुछ हफ्तों के लिए गैस चैंबर बन जाना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की नियति बन गई है. हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जलाई जाने वाली पराली के साथ-साथ दीवाली में जलने वाले पटाखों और वाहनों के प्रदूषण को इसके लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार माना जाता है. दिल्ली जब धूल और धुएं की इस चादर से ढक जाती है तो ज्यादातर लोगों को नाक बहने से लेकर अस्थमा और दूसरी कई स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हालात इस बार भी कुछ अलग नहीं हैं. आइए, समझते हैं कि दिल्ली पर धूल और धुएं के इस साये में कौन-कौन सी जहरीली गैसें या पदार्थ होते हैं और वे सेहत के लिए किस कदर खतरनाक हैं.

पीएम 2.5
पीएम (पार्टिकुलेट मैटर) हवा में मौजूद ठोस लेकिन महीन कणों को कहा जाता है. पीएम के आगे लिखी संख्या इनका आकार बताती है. सामान्य भाषा में समझें तो इनसान के सिर के बाल के मुकाबले पीएम 2.5 की चौड़ाई 30 गुना कम होती है. ये कण सांसों के जरिए फेफड़े तक पहुंचते हैं और फिर शरीर के रक्त प्रवाह में शामिल हो जाते हैं. जिन्हें पहले से अस्थमा या दिल की बीमारी हो, उनकी बीमारी को यह और बढ़ा देते हैं. पीएम 2.5 स्वस्थ लोगों में सांस लेने में दिक्कत पैदा करता है. पीएम 2.5 की वजह से खांसी और नाक बहने की समस्या आम है.

पीएम 10
ये धूल कण होते हैं. जब-जब हवा में पीएम 10 की मात्रा बढ़ती है, अस्थमा और सांस लेने में तकलीफ की गंभीर बीमारी सीओपीडी (क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मनरी डिजीज) के मरीजों का हाल बुरा हो जाता है और कई मामलों में उन्हें अस्पतालों में भर्ती करवाने की जरूरत पड़ती है.

ओजोन
ओजोन भी इनसान के फेफड़ों को प्रभावित करती है. इससे सांस लेने का पूरा तंत्र बेहाल हो जाता है. यह आंखों में भी जलन पैदा करती है. साथ ही जिनको इससे एलर्जी की समस्या हो, उनके लिए जानलेवा तक हो सकती है.

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
कुछ रिसर्च से यह बात पता चली है कि जब भी हवा में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है तो सांस की बीमारियों की वजह से अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या बढ़ जाती है. यह जहरीली गैस फेफड़े की काम करने की क्षमता को कम कर देती है और संक्रमण का खतरा बढ़ा देती है.

सल्फर डाइऑक्साइड
सल्फर डाइऑक्साइड भी फेफड़ों में संक्रमणका खतरा बढ़ाती है. आंखों और पूरे श्वसन तंत्र में जलन पैदा करती है. यह गैस लोगों को अस्थमा और ब्रोंकाइटिस का मरीज भी बना सकती है.

कार्बन मोनोऑक्साइड
गाड़ियों के ईंधन और पराली के पूरी तरह नहीं जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड गैस पैदा होती है. यह शरीर में खून की ऑक्सीजन वहन क्षमता को कम कर देती है. अगर थोड़े समय में बहुत अधिक कार्बन मोनोऑक्साइड इनसान के शरीर में पहुंच जाए तो इससे दम घुटकर मौत हो सकती है.

जहरीली हवा से कैसे निबटें
उपचार से बेहतर बचाव

प्रदूषण की वजह से जो जहरीली गैसें हवा में हैं, उनके लोगों की सेहत पर तात्कालिक और दूरगामी, दोनों प्रभाव होते हैं. इन गैसों के शॉर्ट टर्म एक्सपोजर से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसे सांस की पुरानी बीमारी वाले मरीजों की बीमारी बढ़ जाती है और कई बार अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाती है. वहीं लॉंग टर्म एक्सपोजर से लोगों को ये बीमारयां हो भी सकती हैं. इनसे फेफड़े के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है. इन गैसों के प्रभाव से सिर्फ सांस की बीमारी ही नहीं बल्कि हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, हाइपरटेंशन के अलावा लिवर, किडनी, आंख, त्वचा आदि की बीमारियां भी होती हैं.

इन जहरीली गैसों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए सबसे जरूरी है मास्क लगाना. बच्चे और बुजुर्ग, तब तक घर से बाहर न निकलें, जब तक बहुत जरूरी न हो. स्वस्थ लोग भी बेवजह घर से बाहर निकलना कम कर सकते हैं. प्रदूषण से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है. इसलिए अपने खान-पान में ऐसी चीजों को शामिल करें जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़े. आपकी डाइट में ऐंटीऑक्सिडेंट और प्रोटीन की उचित मात्रा जरूरी है. शरीर को हाइडे्रटेड रखना जरूरी होता है. पूरे दिन खूब पानी पीएं, जूस भी पी सकते हैं. खाने में हरी सब्जियां और फल की मात्रा बढ़ा सकते हैं.

घर के अंदर या ऑफिस में कुछ वैसे पौधे भी लगा सकते हैं, जिनमें हवा साफ करने की क्षमता होती है. सुबह-सुबह बाहर सैर करने या दौड़ लगाने से बचें. जहां तक संभव हो, सार्वजनिक परिवहन माध्यमों का उपयोग करें क्योंकि जितनी गाड़ियां सड़क पर आएंगी, प्रदूषण का स्तर उतना ही अधिक बढ़ेगा. हमेशा यह ध्यान रखें कि उपचार से बेहतर है बचाव. वायु प्रदूषण के सभी पहलुओं की जानकारी सही ढंग से लोगों तक पहुंचाई जाए ताकि आम लोगों में जागरूकता का स्तर बढ़े और वे बचाव के उपायों का पालन कर सकें.

दिल्ली भविष्य में गैस चैंबर न बने, इसके लिए दीर्घकालिक उपायों के तहत दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में पराली जलाने पर रोक हो और उसके डिस्पोजल की वैकल्पिक व्यवस्था हो. इसके अलावा सभी वाहनों में बीएस—6 ईंधन मानक लागू हों, वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों को बढ़ावा दिया जाए, पटाखे जलाने पर पूरे साल का और कड़ा प्रतिबंध हो, सार्वजनिक परिवहन ढांचे को मजबूत और बेहतर बनाया जाए और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर प्रभावी डस्ट मैनेजमेंट प्लान लागू किया जाए. लेकिन जब तक यह सब नहीं हो रहा इस समस्या का सामना करने के लिए हमें खुद को तैयार रखना होगा.

हेड, पल्मनरी मेडिसिन विभाग और सह प्रभारी, सेंटर फॉर ऑक्यूपेशनल ऐंड एन्वॉयरनमेंटल हेल्थ, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली

-डॉ. नरेश कुमार

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