सोरेन का बड़ा दांव
सोरेन के दोनों फैसले भविष्य के परिदृश्य से निपटने के लिए उठाए गए कदम हैं

सरकारी नौकरियों में आरक्षण के दायरे को बढ़ाकर 77 फीसद तक करने और अधिवास (डोमिसाइल) की स्थिति निर्धारित करने के लिए 1932 को कट-ऑफ वर्ष बनाने की मंजूरी देने के झारखंड सरकार के कदम के एक दिन बाद 15 सितंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक वीडियो ट्वीट किया जिसमें उनके उत्साहित समर्थक नारे लगा रहे थे, ''झारखंड का मुख्यमंत्री कैसा हो, हेमंत सोरेन जैसा हो.''
कुछ लोगों को यह थोड़ा अजीब लगा. ऐसा नारा आमतौर पर मुख्यमंत्री पद के किसी संभावित उम्मीदवार के लिए लगाया जाता है. लेकिन पार्टी में जो लोग मुख्यमंत्री के इरादों को भांपने के दावे करते हैं, उनका मानना है कि मुख्यमंत्री के इस कदम में भविष्य के कई निहितार्थ छुपे हैं. सोरेन कई कानूनी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जिनमें उन्हें विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराए जाने की संभावना शामिल है. एक खनन पट्टे पर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का उल्लंघन करने के लिए क्या सोरेन को विधायक के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए, इस पर चुनाव आयोग ने पिछले महीने राज्यपाल रमेश बैस को अपनी सिफारिश भेजी थी.
सोरेन की मुख्य प्रतिद्वंद्वी भाजपा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्यपाल के पास याचिका दायर की थी, जिन्होंने इसे चुनाव आयोग को भेज दिया था. बैस ने अभी तक यह खुलासा नहीं किया है कि आयोग ने उस पर क्या निर्देश दिए हैं, पर माना जाता है कि मुख्यमंत्री के रूप में सोरेन के दिन ज्यादा नहीं बचे हैं. वे झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं. 5 सितंबर को मुख्यमंत्री ने एकतरफा विश्वास प्रस्ताव पेश किया और 82 सदस्यीय विधानसभा (एक मनोनीत एंग्लो-इंडियन सदस्य सहित) में 48 वोट हासिल करके इसे जीत लिया. भाजपा के पास 26 और उसकी सहयोगी आजसू पार्टी के दो विधायक हैं.
सोरेन के 14 सितंबर के दोनों फैसलों को लोगों का भरोसा जीतने और भविष्य के परिदृश्य से निपटने की तैयारी के लिए उठाए गए कदम के रूप में देखा जा रहा है. दोनों फैसले विवादास्पद हैं. सरकार ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए 26 फीसद से बढ़ाकर 28 फीसद, अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए 10 फीसद से बढ़ाकर 12 फीसद और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 14 फीसद से बढ़ाकर 27 फीसद कर दिया है. वहीं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 फीसद आरक्षण जारी है. ऐसे में कुल आरक्षण 77 फीसद हो जाता है.
दूसरा फैसला भी कम बहसतलब नहीं है. उसका मतलब है कि केवल उन लोगों को डोमिसाइल मिलेगा और वे आरक्षण के पात्र होंगे जिनके पास 1932 का खतियान (भूमि दस्तावेज का प्रमाण) है. जिनके पास भूमि नहीं है या उनके परिवार का नाम भूमि अभिलेखों में है, उन्हें अधिवास प्राप्त करने के लिए अपनी ग्रामसभा से अनुमोदन प्राप्त करना होगा.
इस कदम के साथ, सोरेन ने अपने पूर्ववर्ती, भाजपा की रघुबर दास सरकार के 2016 के फैसले को उलट दिया जिसने एक कार्यकारी आदेश के जरिए 'स्थानीय लोगों' को फिर से परिभाषित किया था और झारखंड में निवास के प्रमाण के लिए अनिवार्य रूप से 1985 को कट-ऑफ वर्ष बनाया था.
सोरेन इस बात से वाकिफ हैं कि दोनों फैसलों को लागू करना उतना आसान नहीं होगा. आरक्षण का हालिया कदम सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित आरक्षण की 50 फीसद की ऊपरी सीमा का उल्लंघन करता है. उसी तरह डोमिसाइल की स्थिति को पुनर्परिभाषित करना और इसे 1932 से जोड़ने के फैसले को भी अदालत का सामना करना होगा. इससे पहले साल 2002 में राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी ऐसा करने का प्रयास किया और मामला अदालत में चला गया था.
इसलिए सोरेन इसे लागू करने की जिम्मेदारी भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर डालना चाहते हैं. फैसलों का विधानसभा में अनुमोदन लिया जाएगा और फिर इन्हें न्यायिक समीक्षा से बाहर रखने के लिए नौवीं अनुसूची में शामिल करने के अनुरोध के साथ केंद्र को भेजा जाएगा. न्यायिक समीक्षा की एक गुंजाइश फिर भी बनेगी, अगर अदालत इसे किसी भी मौलिक अधिकार या संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन पाती है.
सोरेन का गेम प्लान साफ है. डोमिसाइल और आरक्षण का दायरा बढ़ाने के उनके कदमों को मूलवासियों और ओबीसी का समर्थन मिल रहा है तथा इससे उन्होंने इन दोनों वर्गों में अपनी पकड़ बढ़ाई है. अब, अगर केंद्र दोनों अधिनियमों को नौवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए सहमत हो जाता है, तो इसका सारा श्रेय सोरेन सरकार को जाएगा. अगर केंद्र इसे ठुकराता है या इस पर फैसले में देरी करता है, तो सोरेन दोष भाजपा के मत्थे मढ़ देंगे.
2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड की आबादी में ओबीसी करीब 46 फीसद औरएसटी 26.3 फीसद हैं. सोरेन के नेतृत्व में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), जिसका पहले से आदिवासियों के बीच मजबूत समर्थन आधार है, को उम्मीद है कि आरक्षण के उपायों से उसके मतदाता आधार में विस्तार होगा और कुछ नए सामाजिक समूह (ओबीसी जातियों के बीच से) भी जुड़ जाएंगे.
जब से यह स्पष्ट हो गया कि कानूनी चुनौतियां अंतत: उन्हें उत्तराधिकारी चुनने के लिए मजबूर कर सकती हैं, सोरेन सभी को खुश करने के मिशन में जुट गए हैं. 14 सितंबर के फैसलों से पहले, सोरेन ने सितंबर से सरकारी कर्मचारियों के लिए उस पुरानी पेंशन योजना को फिर से शुरू किया, जो पेंशन के रूप में अंतिम आहरित वेतन के 50 फीसद की गारंटी देती है. वहीं, नई पेंशन योजना निवेश पर मिलने वाले रिटर्न पर आधारित थी और इसलिए पेंशन की राशि निश्चित नहीं होती थी. सोरेन ने पुलिसकर्मियों को एक महीने का अतिरिक्त वेतन और 20 दिनों का प्रतिपूरक भुगतान अवकाश देने के प्रस्तावों को भी मंजूरी दे दी. उन्होंने झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए वेतन सहित अध्ययन अवकाश (पेड स्टडी लीव) को भी मंजूरी दे दी है. लातेहार और गुमला जिलों के हजारों आदिवासी ग्रामीणों की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकारते हुए एक अन्य फैसले में नेतरहाट में फील्ड फायरिंग रेंज को फिर से अधिसूचित नहीं किया गया.
पिछले महीने के अंत में सोरेन ने अपने विधायकों को तोड़े जाने के डर से उन्हें छत्तीसगढ़ पहुंचा दिया था. पर उन्होंने जल्द ही रणनीति बदली. वे विधायकों को वापस रांची लाए और विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया. सोरेन बीते हफ्ते राज्यपाल से मिले और कहा कि वे आयोग के भेजे सुझाव पर अपना फैसला जल्द दें ताकि सोरेन के विधायक बने रहने को लेकर चल रहे भ्रम दूर हों.
नवंबर 2000 में नया राज्य बनने के बाद से झारखंड ने 11 मुख्यमंत्री और तीन बार राष्ट्रपति शासन देखा है. अगर सोरेन को अयोग्य ठहराया गया तो राज्य 12वां मुख्यमंत्री भी देख सकता है. पर अपने हालिया फैसलों से सोरेन लोकप्रियता के जिस स्तर पर खड़े हैं वहां से उन्हें पीछे धकेलने में विपक्ष को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा ताकत लगानी होगी.