बढ़ रही है लालिमा
कोलकाता नगर निगम के चुनाव में वामपंथी पार्टियों का मत प्रतिशत भाजपा के मुकाबले दो प्रतिशत ज्यादा रहा था

ऐसा दृश्य लोग लगभग भूल चुके थे कि कोलकाता के शैक्षणिक इलाके कॉलेज स्ट्रीट का बोईपाड़ा (पुस्तक बाजार) लाल रंग में रंगा हो. वाम दलों के हंसिया-हथौड़ा और सितारों वाले झंडे और चे ग्वारा की छवि वाली पेंटिंग्स यहां एक बार फिर छाई थीं.
बीते 2 सितंबर को राज्य और केंद्र द्वारा शिक्षा क्षेत्र में की जा रही दखलअंदाजी के विरोध में दो घंटे तक कॉलेज स्ट्रीट को ठसाठस भर देने वाली लगभग 10,000 लोगों की भीड़ में अधिकांशत: स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (माकपा की छात्र इकाई-एसएफआइ) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (इसकी युवा शाखा-डीवाइएफआइ) के सदस्य और समर्थक थे.
बीते एक दशक में बंगाल में वाम मोर्चे ने खूब गिरावट देखी है. 2019 के लोकसभा चुनावों में इसका वोट प्रतिशत गिरकर 6.3 प्रतिशत और 2021 के विधानसभा चुनावों में और नीचे 5.6 प्रतिशत तक पहुंच गया था. मोर्चा अब इस दुर्दशा से उबरता दिख रहा है. चंदननगर, सिलीगुड़ी, बिधाननगर और आसनसोल में शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में वामपंथियों की मत भागीदारी भाजपा के 14 प्रतिशत के मुकाबले 16.75 प्रतिशत तक पहुंच गई. कोलकाता नगर निगम चुनावों में इसकी मत भागीदारी भाजपा से दो प्रतिशत अधिक थी और अप्रैल में बालीगंज सीट के लिए हुए विधानसभा उपचुनाव में वामपंथियों का मत प्रतिशत पहले की तुलना में 24 प्रतिशत बढ़ कर 30.1 प्रतिशत तक पहुंच गया.
समाज विज्ञानी प्रशांत रे इसे शिक्षक पदों की कथित खरीद-फरोख्त समेत बहुत से मुद्दों पर मध्यम और कामकाजी वर्गों के वर्तमान सरकार से धीरे-धीरे हो रहे मोहभंग से जोड़ते है. एसएफआइ ने जल्दी ही समझ लिया था कि सरकारी स्कूलों में नौवीं से 12वीं कक्षा के 18,000 शिक्षक पदों के लिए आवेदन करने वाले एक लाख से अधिक उम्मीदवार इस घोटाले पर चुप नहीं रहेंगे. इसके अलावा, प्राथमिक शिक्षक पदों के दो-तीन लाख से अधिक आवेदकों ने भी इसी तरह की शिकायत की है. उनके बढ़ते क्षोभ को भांपते हुए वामपंथी छात्र और युवा संगठन मैदान में उतर आए.
हालांकि चुनावों में वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन खराब था, लेकिन वे अपने युवा संगठनों के माध्यम से उन मुद्दों को उठा रहे हैं जिनके समाधान की जरूरत है. वे 'डिजिटल खाई', रसोई गैस और आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी तथा कार्यकर्ताओं के सरकारी दमन जैसे मामलों पर सड़कों पर उतरे. एसएफआइ के महासचिव सृजन भट्टाचार्य कहते हैं, ''स्कूल खुलवाने के लिए हमारे दो महीने के आंदोलन के कारण ही सरकार ने जनवरी, 2022 में छात्रों को कक्षाओं में वापस जाने का मौका दिया.''
फरवरी में छात्र नेता अनीस खान की राज्य पुलिस के हाथों कथित हत्या को लेकर भी विरोध प्रदर्शनों में तेजी आई. इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले छात्रों को राज्य के दमनकारी उपायों का सामना करना पड़ा. मीनाक्षी मुखर्जी, महफूज खान और सुजॉय चक्रवर्ती जैसे छात्र नेताओं को 10 दिन की कैद में रखा गया, जहां उन्हें कथित रूप से प्रताड़ित किया गया. सोशल मीडिया और मध्यम वर्ग के हो-हल्ले ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया.
इन जनांदोलनों के साथ वामपंथियों का आत्मविश्वास बढ़ा और न केवल मोहम्मद सलीम, सुजान चक्रवर्ती, शमिक लाहिड़ी और सुशांत घोष जैसे शीर्ष माकपा नेता सड़कों पर उतरे, बल्कि युवा, ऊर्जावान और प्रतिबद्ध लोगों की एक नई पौध भी सामने आई. बीते मार्च में ही मृदुभाषी सूर्ज्य कांत मिश्रा की जगह 64 वर्षीय सलीम को बंगाल इकाई का महासचिव बना कर माकपा ने खुद को पहले से ज्यादा आक्रामक नेतृत्व के लिए तैयार कर लिया था. पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव लाते हुए 80 सदस्यीय राज्य समिति में 24 युवा चेहरों को लाया गया था.
इनमें दिप्सिता धर और आइशी घोष जैसे जेएनयू से पढ़े कुछ विद्वान हैं, तो मीनाक्षी, मयूख बिस्वास, सृजन और प्रतीकुर रहमान जैसे अनुभवी जमीनी कार्यकर्ता भी हैं. सलीम के कामकाज संभालने के बाद से पूरे बंगाल में करीब 10,000 रैलियां और मार्च निकाले जा चुके हैं. अगस्त के अंत में माकपा ने बर्धमान जिले में 'चोर धोरो, जेल भोरो' (चोर पकड़ो, जेल भरो) नामक कार्यक्रम का आयोजन किया. इस दौरान भ्रष्ट टीएमसी नेताओं की भर्त्सना कर रहे माकपाइयों और पुलिस के बीच घमासान भी देखने को मिला.
यह स्थिति 2018-19 से काफी बदली हुई है जब टीएमसी की आक्रामकता के कारण कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यालय नहीं खुल पा रहे थे. उनकी कमजोरी 2019 में भयावह पराजय में बदल गई जब वामपंथी वोटों के भाजपा में चले जाने से भाजपा का मत प्रतिशत 40 प्रतिशत तक पहुंच गया था. लेकिन शायद वामपंथियों की किस्मत बदल रही है. निश्चित रूप से वामपंथी जमीन पर पकड़ हासिल कर रहे हैं और प्रतिद्वंद्वी की आंखों में आंखें डाल कर देख रहे हैं.