कृषि मंत्री को गुस्सा क्यों आया?
कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने अपने बयानों से न केवल अपने विभाग बल्कि राज्य की अफसरशाही पर सवाल खड़े किए

पुष्य मित्र
पिछले दिनों बिहार के नए कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि उनके विभाग के सारे अफसर चोर हैं और वे चोरों के सरदार. यह बयान एक तरह से राज्य की उस अफसरशाही पर हमला था जिस पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे वक्त से भरोसा करते आए हैं. इस बयान ने पहले से हमलावर भाजपा को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया, वहीं सुशासन के लिए मशहूर नीतीश की स्थिति ऐसी हो गई कि उनसे कुछ बोलते नहीं बन रहा था.
सुधाकर कैमूर जिले की रामगढ़ विधानसभा सीट से विधायक हैं. वे 2020 की विधानसभा चुनाव में पहली बार विधायक चुने गए और मंत्री भी बन गए. दरअसल, वे कद्दावर नेता और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे हैं. सियासी विश्लेषकों का मानना है कि सुधाकर में अपने पिता जैसी अक्खड़ता है, इसीलिए उन्होंने ऐसा बयान दिया है. 2010 के विधानसभा चुनाव में जगदानंद ने अपने बेटे की जगह राजद के आम कार्यकर्ता अंबिका सिंह को तरजीह दी थी. जब सुधाकर भाजपा के टिकट से रामगढ़ सीट से चुनाव लड़े थे तो जगदानंद ने उनके खिलाफ प्रचार करके उनकी हार तय कर दी थी.
सुधाकर ने अपने बयान से अपने ही विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया है. राज्य में सूखे के मसले पर बातचीत के दौरान जब इंडिया टुडे ने उनसे पूछा कि आपके विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 87 फीसद जमीन पर धान की बुआई हो चुकी है, उन्होंने कहा, ''इन आंकड़ों से मैं खुद सहमत नहीं हूं. हमारे पास जो साधन हैं और जितनी कम बारिश हुई है, उसमें इतनी रोपनी संभव ही नहीं है. मैंने विभाग के अधिकारियों से फिर से आकलन करने कहा, पर वे विफल रहे. अब मैं रिमोट सेंसिंग के जरिए थर्ड पार्टी से आकलन करवा रहा हूं. अगर आंकड़े अलग आए तो मैं अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करूंगा.'' जाहिर है, सूखे के कारण एक ओर किसान परेशान हैं और दूसरी ओर उनका विभाग लीपापोती करने वाले आंकड़े पेश कर रहा है. इससे वे नाराज हो गए. उन्होंने बीज वितरण में घोटाले की भी बात उठाई और अपने विभाग के अफसरों को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया. मौजूदा यूरिया संकट की वजह से भी वे नाराज चल रहे हैं.
इधर, नीतीश भले ही प्रतिक्रिया नहीं दे रहे, मगर वे अफसरशाही पर सुधाकर के बयान से सहमत नहीं हैं. एक और बड़ा मसला है जिस पर कृषि मंत्री और मुख्यमंत्री की राय जुदा है. औद्योगीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश के तहत बिहार सरकार राज्य में 17 इथेनॉल प्लांट खोलने जा रही है. इन प्लांटों में मक्का और चावल का कच्चे माल के तौर पर प्रयोग होगा. कृषि मंत्री इससे सहमत नहीं हैं, ''लोगों के पास खाने के लिए मक्का और चावल नहीं है, ऐसे में इससे इथेनॉल बनाना उचित नहीं.''
सुधाकर के बागी तेवर से भाजपा खुश है. मगर दिलचस्प यह कि उनके मंत्री बनते ही राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उनका इस्तीफा मांग लिया था. दरअसल, राजनीति में आने से पहले सुधाकर व्यवसायी थे. कैमूर जिले में उनकी दो राइस मिलें हैं, सुधाकर राइस मिल और सोन वैली राइस मिल.
इन मिलों को राज्य सरकार डिफॉल्टर और चावल चोरी का आरोपी मानती है और दोनों पर मुकदमे दर्ज हैं. उनके मंत्री बनने पर मोदी ने प्रेस वार्ता में कहा कि 2013 में सुधाकर पर कैमूर के रामगढ़ थाने में 5.31 करोड़ रुपए के चावल घोटाले का केस दर्ज है. फिलहाल उन पर सरकार का ब्याज समेत 12 करोड़ रुपए से अधिक बकाया है. इसके लिए सुधाकर को जेल भी जाना पड़ा था. वहीं, इस मामले में सुधाकर का कहना था कि वे तो सरकार को चावल देने के लिए तैयार थे, सरकार ही इसे लेने के लिए तैयार नहीं हुई.
अब, सुधाकर राज्य के अफसरों से अधिक भाजपा पर हमलावर हैं और यूरिया संकट के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं. वे राज्य के नए कृषि रोडमैप की तैयारी में भी जुटे हैं और वे राज्य में सूखे की स्थिति को लेकर चिंतित हैं. उन्होंने कहा, ''जो जमीनी स्थिति है उसमें अगर 50 फीसद धान की फसल भी बच जाए तो बड़ी उपलब्धि होगी.
बारिश हो नहीं रही, हमारी नहर की सिंचाई की कुल क्षमता 20 लाख हेक्टेयर है, हम बारिश के अभाव में अधिकतम 10 लाख हेक्टेयर जमीन तक ही सिंचाई उपलब्ध करा पाएंगे.'' वे कहते हैं कि संकट बड़ा है और उससे मुकाबले के लिए कुछ छोटे उपाय किए जा रहे हैं, जैसे किसानों को डीजल सब्सिडी देना, वैकल्पिक खेती के लिए कम अवधि के बीज उपलब्ध कराना और कृषि फीडर से 65 पैसे प्रति यूनिट आठ घंटे के बदले 16 घंटे बिजली देना. जाहिर है, फिलहाल सुधाकर थोड़े नरम पड़ गए हैं, पर अपने बयानों से उन्होंने राज्य में आसन्न कृषि संकट की चेतावनी भी दे दी है.