परोक्ष निवेश का विकास
बाजार नियामक सेबी ऐसे नियम लाया है जिससे निवेशकों के लिए जटिल एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) और इंडेक्स फंड में ट्रेडिंग करना व्यावहारिक और आसान हो जाए

बाजार नियामक सेबी मई में एक परिपत्र जारी करके निष्क्रिय रूप से प्रबंधित फंडों के लिए कई नियम लेकर आया. इस परिपत्र का उद्देश्य तरलता में सुधार लाना और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) तथा इंडेक्स फंड की तरलता, ट्रैकिंग त्रुटियों और खुलासों में सुधार लाना है. परोक्ष निवेश इंडेक्स म्यूचुअल फंड और ईटीएफ के जरिए किए जा सकते हैं, जो दोनों ही बताए गए इंडेक्स के प्रदर्शन पर नजर रखते हैं. मसलन, आप एक इंडेक्स फंड ले सकते हैं जो एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स पर नजर रखता हो और साथ ही ईटीएफ भी.
क्या फर्क है? ईटीएफ की यूनिट शेयर बाजार में खरीदी और बेची जा सकती हैं, जबकि इंडेक्स फंड किसी भी दूसरे म्यूचुअल फंड की तरह काम करते हैं जिसका एनएवी (नेट ऐसेट वैल्यू) उसका मूल्य दर्शाता है. ईटीएफ के मामले में आपको अनिवार्य तौर पर डीमैट खाते की जरूरत होती है और कम से कम एक यूनिट खरीदनी ही होती है, जो शेयर बाजार में मान्यता प्राप्त ब्रोकर के जरिए एक नियमित शेयर खरीदने या बेचने की तरह है. इंडेक्स फंड दूसरे म्यूचुअल फंडों की तरह हैं जिनमें आप उस इंडेक्स की यूनिट खरीद सकते हैं जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है.
सेबी का सर्कुलर ज्यादा ऋण उन्मुख ईटीएफ की शुरुआत के साथ परोक्ष निवेश क्षेत्र के विकास में मदद की पेशकश करता है. साथ ही यह एक संभावित ईएलएसएस (इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम) ईटीएफ—जो सक्रिय रूप से प्रबंधित म्यूचुअल फंडों के प्रति अन्यथा सतर्क रहने वाले पहले-पहल निवेशकों को आकर्षित कर सकता है. अलबत्ता ईटीएफ के साथ एक मुश्किल यह है कि इनका बाजार सीमित है और इन्हें इसी सीमित बाजार के ट्रेड पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसका अर्थ है कि कभी-कभी खरीदार के लिए कोई बाजार न हो क्योंकि वहां केवल विक्रेता ही हैं. सेबी का परिपत्र ईटीएफ की इस सीमा को हल करने की और साथ ही ऐसे बदलाव लाने की कोशिश है जो ईटीएफ सेग्मेंट का मानकीकरण कर सकें और इन फंड के साथ वसूल किए जाने वाले शुल्कों की दर सीमा तय कर सकें.
ईटीएफ यूनिट अधिकृत भागीदार या अथॉराइज्ड पार्टिसिपेंट (एपी) के जरिए रची जाती है, जो 'बाजार निर्माता' हो सकता है या बड़ी वित्तीय संस्था भी. एपी बाजार में जाता है और वह आधारभूत प्रतिभूतियां खरीदता है जो ईटीएफ को रखनी होती हैं और फिर उन प्रतिभूतियों को ईटीएफ जारी करने वाले को देता है. ईटीएफ जारी करने वाला बदले में एपी को तय संख्या में ईटीएफ शेयर देता है जिसे खुले बाजार में बेचा जा सकता है. मसलन, अगर एक ईटीएफ को एसऐंडपी बीएसई सेंसेक्स पर नजर रखनी है, तो एपी इस इंडेक्स के सभी 30 शेयर समान मात्रा में खरीदता है.
इसके बाद एपी इन 30 शेयरों को ईटीएफप्रवाइडर को दे देता है; बदले में एपी को एक क्रिएशन यूनिट मिलती है जो ईटीएफ शेयर के बराबर मूल्य वाली होती है. ईटीएफ यूनिट की बिक्री के समय यही प्रक्रिया उलटे तरीके से काम करती है. ईटीएफ बाजार में जाते हैं और ईटीएफ की कीमत उनकी अंतर्निहित परिसंपत्तियों के अनुरूप हो जाती है. और, इस तरह के ट्रेड शेयरों की खरीद-फरोख्त की तरह होते हैं जिनकी कीमत दिनभर बदलती रहती है. जब कीमत नेट ऐसेट वैल्यू से भटकती है तो एपी ईटीएफ शेयर का भाव उचित स्तर पर लाने के लिए रिडेंप्शन मैकेनिज्म का सहारा लेते हैं. इस जटिलता को हल करने के लिए सेबी ने एएमसी (ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी) को ईटीएफ की यूनिटों का 100 फीसद मूल्य अग्रिम अदा किए बगैर या बाजार निर्माता द्वारा ऐसी यूनिटों की अग्रिम डिलिवरी के बगैर रिडीम ईटीएफ की यूनिटें बनाने की इजाजत दे दी है.
इससे यूनिटों के रिडेंप्शन की प्रक्रिया और ज्यादा लिक्विड हो जाएगी. ईटीएफ का एक और अनूठा पहलू है ट्रैकिंग त्रुटि. ट्रैकिंग त्रुटि इंडेक्स फंड और ईटीएफ के प्रदर्शन की परिवर्तनीयता की संकेतक है, जो एक निश्चित समयावधि के दौरान फंड की ट्रैकिंग अंतर में निरंतरता की ओर इंगित करती है. ट्रैकिंग त्रुटि इस बात की थाह लेती है कि इंडेक्स फंड या ईटीएफ के रिटर्न में से कितने बेंचमार्क इंडेक्स के रिटर्न से भटके हैं.
ईटीएफ और इंडेक्स फंड को निवेशकों के ज्यादा अनुकूल बनाने के लिए सेबी ने ट्रैकिंग त्रुटि की ऊपरी सीमा तय की और बेहतर खुलासे शुरू किए हैं. मसलन, डेट ईटीएफ के मामले में ट्रैकिंग त्रुटि पिछले एक साल के दौरान औसतन 1.25 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकती. इसके अलावा परोक्ष म्यूचुअल फंड के लिए ट्रैकिंग त्रुटि को मासिक आधार पर 'ट्रैकिंग अंतर' का खुलासा करना भी जरूरी है. एक तारीख विशेष को इंडेक्स उत्पाद के रिटर्न और उसके बेंचमार्क इंडेक्स के रिटर्न के बीच का अंतर ट्रैकिंग अंतर कहलाता है.
इन बदलावों के साथ परोक्ष निवेश क्षेत्र निवेशकों के हक में इस निवेशक क्षेत्र का फायदा उठाने की तलाश कर रहे एएमसी के लिए अवसर खोलता है. परोक्ष निवेश अपनी सादगी, इंडेक्स को ट्रैक करने के मॉडल और उनमें ट्रेडिंग की आसानी को देखते हुए निवेश का पंसदीदा विकल्प बन सकते हैं. ईटीएफ के जरिए परोक्ष निवेश करने वाले दुनिया भर में ज्यादा संख्या में हैं और अब शायद भारतीय निवेशकों के लिए भी वह वक्त आ गया है जब वे उन ढेर सारे ईटीएफ और इंडेक्स फंड का लाभ उठा सकते हैं जो मौजूद हैं और बाजार के संकेतकों को पूंजी में तब्दील कर रहे हैं.
—नारायण कृष्णमूर्ति
मोटर बीमा प्रीमियमों में बढ़ोतरी
कीमतें चौतरफा बढ़ रही हैं और मोटर बीमा, खासकर अनिवार्य थर्ड-पार्टी बीमा में भी बढ़ोतरी का रुख है. बीमा नियामक आइआरडीएआइ और सड़क परिवहन तथा राजमार्ग मंत्रालय ने दो सालों के अंतराल के बाद दरों में बढ़ोतरी का ऐलान किया है. सड़कों पर चलने वाले किसी भी वाहन के लिए लाएबिलिटी ओनली या थर्ड पार्टी कवर कानूनन अनिवार्य है. दरें वाहन की घन क्षमता और वाहन के प्रकार का एक कारक हैं. मसलन, सवारी कारों या व्यावसायिक वाहनों के मुकाबले दोपहिया वाहनों की दर अलग है.
सवारी कारों के लिए बढ़ोतरी 0.1 से 6 फीसद की सीमा में है. 350 सीसी से ज्यादा इंजन क्षमता वाले दोपहियों के लिए बढ़ोतरी ज्यादा 20 फीसद है. इलेक्ट्रिक दोपहिया की श्रेणी में भी तेज बढ़ोतरी हुई है, जो वाहन की चार्ज केवी (किलोवॉट) के हिसाब से अलग-अलग है. 20 केवी से ज्यादा वाले इलेक्ट्रिक दोपहियों के लिए थर्ड पार्टी बीमा दर में 20 फीसद की बढ़ोतरी की गई है. हैरानी की बात यह है कि 3-7 केवी दोपहियों के लिए थर्ड पार्टी बीमे के प्रीमियम में 5 फीसद की कमी कर दी गई है.
यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब बीमा कंपनियों ने कोविड के सालों के दौरान पॉलिसियों के लैप्स या कालातीत होने में भारी बढ़ोतरी देखी. यह बढ़ोतरी 1 जून, 2022 से प्रभावी हो गईं, जबकि पहले ऐसी बढ़ोतरियां हर साल मार्च की शुरुआत में समीक्षा के बाद इस महीने के अंत में लागू होती थीं.
—नारायण कृष्णमूर्ति