आदिवासियों को रिझाने की कवायद
भाजपा को समझ आ रहा है कि आदिवासी वोट कितने अहम हैं और इसलिए अब वह इस समुदाय के नेताओं को आगे कर रही है

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के एक के बाद एक कई कानूनी पचड़ों के बीच उलझते जाने का फायदा उठाते हुए विपक्षी भाजपा, झारखंड के आदिवासियों के बीच अपना पुराना समर्थन फिर से हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है. एक आदिवासी मुख्यमंत्री को निशाना बनाना खतरे से खाली नहीं, इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा सोरेन को घेरने के लिए महान आदिवासी नायक बिरसा मुंडा का सहारा ले रही है. भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के 5 जून को रांची में 'धरती आबा बिरसा मुंडा विश्वास' रैली आयोजित करने के पीछे यही वजह बताई जा रही है. रैली में नड्डा ने मुख्यमंत्री सोरेन को ''भ्रष्टाचार का प्रतीक'' बताया और इस बात का खूब बखान किया कि आदिवासियों को ताकतवर बनाने के लिए भाजपा ने क्या-क्या प्रयास किए हैं. उन्होंने इस तबके से आठ राज्यसभा सांसदों, 190 विधायकों और पार्टी के दो राज्यपालों की नियुक्ति का भी हवाला दिया.
आदिवासियों को रिझाने के लिए भाजपा ने जो समय चुना है, वह महत्वपूर्ण है. चुनाव आयोग ने जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत सोरेन को अयोग्य ठहराए जाने का नोटिस दिया है और झारखंड हाइकोर्ट ने खनन पट्टों में कथित अनियमितताओं और उनके परिवार द्वारा चलाई जा रही छद्म कंपनियों को फायदा पहुंचाने के आरोप वाली दो जनहित याचिकाएं स्वीकार ली हैं.
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के सह-संस्थापक शिबू सोरेन के पुत्र होने के नाते हेमंत सोरेन को आदिवासियों के बीच एक स्वाभाविक बढ़त है. आखिरकार उनके पिता की ओर से चलाए गए आंदोलन से ही अंतत: बिरसा मुंडा की जयंती पर नवंबर 2000 में बिहार से अलग झारखंड राज्य की स्थापना हुई थी. झारखंड की 25 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी है; इसकी 81 विधानसभा सीटों में से 28 एसटी के लिए आरक्षित हैं. 2019 के चुनाव में भाजपा की हार का श्रेय मुख्य रूप से झामुमो (19)-कांग्रेस (6) गठबंधन को दिया जाता है, जिन्होंने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 28 में से 25 सीटें जीती हैं.
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश का कहना है कि सोरेन और झामुमो को बेनकाब करना पार्टी की प्राथमिकता है. वे कहते हैं, ''आदिवासियों को लग रहा है कि हेमंत ने 'जल, जंगल, जमीन' के कल्याणकारी नारों के बल पर बहुमत हासिल किया, लेकिन सत्ता में आते ही वे बस अपने परिवार के सदस्यों का खजाना भरने में जुटे हुए हैं.''
झारखंड चार प्रमुख आदिवासी समूहों—संथाल, मुंडा, हो और उरांव—का घर है और कड़िया मुंडा और पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा के चलते मुंडा वोटों पर भाजपा की पकड़ है. 2019 की हार से सीख लेते हुए पार्टी ने गैर-आदिवासी नेता रघुबर दास को पीछे ही रखा है. पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी को भी पार्टी ने फिर से शामिल कर लिया है. जाहिर है, पार्टी आदिवासियों का विश्वास फिर से जीतना चाहती है.
-अमिताभ श्रीवास्तव