बेल्लारी की खदानों में फिर लौटती जान
इस्पात और खान मंत्रालयों ने पाया कि बेल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुर की खदानों के लिए देश के बाकी हिस्सों जैसी ही परिस्थितियां बनाना जरूरी था

कर्नाटक के लौह-अयस्क खनन के बंटाधार के एक दशक बाद बेल्लारी इलाके में सामान्य स्थिति बहाल करने के रोडमैप ने पिछले महीने एक निर्णायक मील का पत्थर पार किया—2011 से इस मामले की निगरानी कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई को अयस्क के निर्यात पर एक दशक से जारी प्रतिबंध को हटा दिया.
बड़े पैमाने पर अवैध खनन की वजह से बेल्लारी की बदनामी 2011 में अपने चरम पर थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने वहां की सभी खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी और चीजों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया शुरू की. सभी 166 खदानों को इस आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया कि वे कितनी सही ढंग से संचालित हो रही थीं—श्रेणी ए और श्रेणी बी की खदानों को गतिविधियां फिर से शुरू करने की इजाजत दी गई, बशर्ते वे कोर्ट की शर्तों का पालन करें. वहीं सबसे अधिक अतिक्रमण वाली श्रेणी सी की खदानों को रद्द कर दिया गया और उन्हें फिर से नीलामी के लिए रखा गया. हालांकि, अवैध रूप से निकाले गए कच्चे लोहे और ताजा खोदे गए भंडार, दोनों को केवल ई-नीलामी के जरिए राज्य के भीतर के ही खरीदारों को बेचा जा सकता था. इसमें 10-25 फीसद बिक्री मूल्य अलग रखा गया.
कर्नाटक में खनन से बुरी तरह प्रभावित बेल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुर जिलों में यह बड़ी घटना है. कर्नाटक खनन पर्यावरण बहाली निगम (केएमईआरसी) को अब 20,000 करोड़ रुपए की राशि मिली है. केएमईआरसी एक स्पेशल पर्पज वेहिकल यानी विशेष प्रयोजन माध्यम (एसपीवी) है, जिसे इन जिलों में परियोजनाओं की बहाली को लागू करने का काम दिया गया था. इस अप्रैल में शीर्ष अदालत ने केएमईआरसी के 25,000 करोड़ रु. के एक ब्लूप्रिंट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी और इसकी प्रगति की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी को निगरानी अधिकारी के तौर पर नियुक्ति किया है. खनन प्रभाव क्षेत्र के लिए व्यापक पर्यावरण योजना (सीईपीएमआइजेड) 10 साल की बहाली परियोजना है.
नष्ट हुए जंगलों को फिर से बसाने के अलावा, सीईपीएमआइजेड खनन इलाकों के लिए जरूरी रेलवे की सुविधा स्थापित करेगा और सड़क, बाइपास, पेयजल और सिंचाई परियोजनाओं सरीखे बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगा. सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं में स्कूल, अस्पताल, आवास और पर्यटन शामिल हैं. केएमईआरसी के एमडी प्रभाष चंद्र रे कहते हैं, ''इन तीन जिलों में पर्यावरण को नुक्सान पहुंचा है. सीईपीएमआइजेड का मुख्य मकसद उसको बहाल करना है.'' रे को उम्मीद है कि मंजूरी के आधार पर छोटी अवधि की परियोजनाएं तीन महीने के भीतर शुरू हो जाएंगी. स्थानीय जिला अधिकारी केएमईआरसी से वित्त पोषित होने वाली परियोजनाओं की पहचान करेंगे और उनका कहना है कि निगरानी अधिकारी की मंजूरी मिलते ही विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी.
भारत में कच्चे लोहे के उत्पादन में कर्नाटक का हिस्सा करीब 17 फीसद का है. ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बाद यह तीसरे नंबर पर है. 31 मार्च तक कर्नाटक की स्वीकृत सालाना उत्पादन क्षमता 4.5 करोड़ मीट्रिक टन थी.
इस दौरान कर्नाटक सरकार ने कच्चे लोहे के उत्पादन, प्रोसेसिंग, ढुलाई, बिक्री और रॉयल्टी के संग्रह को इलेक्ट्रॉनिक रूप से रेगुलेट और उसकी निगरानी के लिए एक डिजिटल एकीकृत प्रबंधन प्रणाली (आइएलएमएस) लागू की है.
सुप्रीम कोर्ट का 20 मई का आदेश कच्चे लोहे की खनन कंपनियों को बेल्लारी और दो अन्य जिलों में सीधे अनुबंध के जरिए अपने भंडार बेचने और अयस्क के निर्यात की अनुमति देता है. 'एक दशक पहले की गई व्यवस्था की समीक्षा करने का आ जाने' की बात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि ई-नीलामी की व्यवस्था ने ''अब तक संतोषजनक ढंग से काम किया है.''
इस्पात और खान मंत्रालयों ने पाया कि बेल्लारी, चित्रदुर्ग और तुमकुर की खदानों के लिए देश के बाकी हिस्सों जैसी ही परिस्थितियां बनाना जरूरी था. भारतीय खनिज उद्योग संघ (एफआइएमआइ) के दक्षिणी चैप्टर के पूर्व चेयरमैन बसंत पोद्दार का कहना है, ''सीधी बिक्री बेहतर कीमत और व्यापक बाजार मुहैया करेगी. इससे पहले यह कर्नाटक और आसपास के खरीदारों तक ही सीमित था. अब आप किसी को भी बेच सकते हैं.'' पोद्दार बताते हैं कि ए और बी श्रेणी में कई खनन पट्टे समय के साथ खत्म हो गए हैं और नए पट्टों के लिए नीलामी पर्याप्त तेजी से नहीं हो रही है. केंद्र सरकार की नई नीलामी नीति आने के बाद से पिछले सात साल में कर्नाटक में करीब 24 ब्लॉकों की नीलामी की गई है.
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इन तीन जिलों में कच्चे लोहे के उत्पादन के लिए अधिकतम सीमा समाप्त किए जाने के बारे में निगरानी अधिकारी से उनकी राय मांगी है. इस मामले में सुनवाई जुलाई में तय की गई है.
-अजय सुकुमारन