'अग्निपथ' पर उठते सवाल कितने सही?
अग्निपथ योजना को लेकर जताई जा रही सभी चिंताएं जायज नहीं हैं. अब बस एक चुनौती है, हिंदी पट्टी में कुछ सालों से भर्ती की तैयारी में लगे युवाओं को इसके लिए राजी कर पाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को लाल किले से दिए अपने भाषण में प्रमुख रक्षा अध्यक्ष यानी सीडीएस पद के सृजन का ऐलान किया. और इस पर तीनों सेनाओं में सबसे वरिष्ठ अधिकारी जनरल बिपिन रावत को तैनात किया गया. अब मोदी सरकार ने सैनिक सुधार की दिशा में दूसरा बड़ा कदम उठाते हुए सेनाओं में सबसे छोटे पद—सिपाही / सेलर / एयरमैन पर अपना ध्यान लगाया है और इस कदम का नाम है -अग्निपथ.
14 जून, 2022 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह तीनों सेनाध्यक्षों के साथ मीडिया के सामने आए, और उन्होंने फौज में नॉन कमिशंड रैंक (जिन्हें आम भाषा में जवान कहा जाता है) पर भर्ती की नई नीति का ऐलान किया. इसके तहत तीनों सेनाओं में 'अग्निवीरों' की नियुक्ति होगी. ये चार साल तक सेवा में रहेंगे. इसके बाद मेरिट और प्रदर्शन के आधार पर 25 फीसद को सेनाओं के स्थाई काडर में नियुक्ति मिलेगी और बाकी 'सेवा निधि' पैकेज के साथ समाज में वापस लौट जाएंगे.
अग्निपथ को फौज में ठेका पद्धति की शुरुआत भी कहा जा रहा है और सीडीएस जितना महत्वपूर्ण और दूरगामी सैनिक सुधार भी. इंडिया टुडे ने बहस के इन दोनों पक्षों पर रक्षा विशेषज्ञों की राय जानी और उनकी चिंताओं पर रक्षा मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के जवाब भी लिए. इस आधार पर हमने अग्निपथ योजना के संदर्भ, मकसद और संभावित असर की एक साफ तस्वीर तैयार करने की कोशिश की है.
'अग्निपथ' योजना क्यों लाई गई?
डिपार्टमेंट ऑफ मिलिटरी अफेयर्स में एडिशनल सेक्रेटरी, लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि अग्निपथ योजना के चलते 6 से 7 साल में सैनिकों की औसत आयु 32 से 26 साल हो जाएगी. बार-बार इस बात पर भी जोर दिया गया कि हर साल फौज में भर्ती होने वाले युवा बदलती तकनीक को लेकर ज्यादा सहज होंगे. लेकिन भर्ती प्रक्रिया में बदलाव से इतर, अग्निपथ का एक और कारण है, जिसके बारे में रक्षा मंत्रालय ने कुछ नहीं कहा.
13 दिसंबर, 2021 को रक्षा राज्यमंत्री अजय भट्ट ने राज्यसभा में सेना में पदों और रिक्तियों के आंकड़े दिए. इनके मुताबिक, तब सेना के तीनों अंगों में एक लाख 13 हजार 193 नॉन कमिशंड रैंक के पद रिक्त थे.
लेकिन भर्ती खुल ही नहीं रही थी. 2017 से 2019 तक हर साल 90 से ज्यादा भर्ती रैलियां हुईं. 2020-21 में 47 और 2021-22 में सिर्फ चार. भर्तियां कम क्यों हो रही थीं? क्योंकि सरकार 'टूर ऑफ ड्यूटी' नाम के एक प्रस्ताव पर विचार कर रही थी, जिसमें सेना में चार साल की एक इंटर्नशिप की कल्पना थी.
इस बीच एक और घटना हुई. 2021 के मध्य में खबर आई कि सीडीएस की अध्यक्षता वाला डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स तीनों सेनाओं के पेंशन नियमों में बदलाव पर विचार कर रहा है. इस प्रस्ताव में तीनों सेनाओं में सेवानिवृत्ति की आयु बराबर करने के अलावा पेंशन के लिए अनिवार्य सेवा को दोगुना करने की बात थी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक नॉन कमिशंड रैंक पर पूरी पेंशन के लिए अनिवार्य सेवा 35 साल करने का प्रस्ताव था.
इसका मतलब कि सरकार पेंशन के बढ़ते बिल को लेकर कोई बड़ा कदम उठाना चाहती थी. वित्त वर्ष 2022-23 के लिए केंद्र सरकार को रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं में पेंशन के लिए 1.2 लाख करोड़ रुपए का बजट जारी करना पड़ा है, जो देश के कुल रक्षा बजट के 25 फीसद के बराबर है. यह तीनों सेनाओं में नए उपकरणों की खरीद पर खर्च से ज्यादा है. रक्षा मंत्रालय इस बात को समझ गया था कि बदलते वक्त के साथ सेना में जिस तरह के आधुनिकीकरण की आवश्यकता है, पेंशन बिल उस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बन सकता है.
संभवत: इसीलिए रक्षा सूत्रों के हवाले से जिस 'टूर ऑफ ड्यूटी' प्रस्ताव की बात छेड़ी गई थी, उसपर रक्षा मंत्रालय वाकई गंभीरता से काम कर रहा था. मेजर जनरल अशोक कुमार (रिटायर्ड) ने इंडिया टुडे को बताया ''टूर ऑफ ड्यूटी के जिस शुरुआती प्रस्ताव पर बहस शुरू हुई थी, वह अंतिम ऐलान तक आते-आते पूरी तरह बदल गया है. सार्वजनिक मंचों और मीडिया में हुई बहस से निकले बिंदुओं पर साउथ ब्लॉक का ध्यान था. फिर तीनों सेनाओं ने अपने-अपने यहां अलग अलग कमेटियों का भी गठन किया, जिनकी अनुशंसाओं को योजना के अंतिम रूप में शामिल किया गया.''
'अग्निपथ' पर सवाल और उनके जवाब
अग्निपथ में 'ऑल इंडिया ऑल क्लास' भर्तियां होंगी. इसे लेकर एक चिंता यह जताई गई थी कि इससे सेना के रेजिमेंटल कल्चर पर असर पड़ेगा. इसे लेकर रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि आलोचक यह नहीं बता पाए हैं कि ऑल क्लास रेजिमेंट, जैसे ब्रिगेड ऑफ गार्ड्स, सिंगल क्लास रेजिमेंट, जैसे सिख रेजिमेंट से उन्नीस क्यों और कैसे हैं. फिर 80 फीसद से ज्यादा थल सेना पहले ही ऑल इंडिया ऑल क्लास है. इस पर लेफ्टनेंट जनरल राकेश शर्मा (रिटायर्ड) कहते हैं, ''अब तक सेना की भर्तियों में उत्तर भारत और पहाड़ी राज्यों का बोलबाला रहा है. अग्निपथ में जब पूरे भारत से चयन होगा, तब पूरे देश से समान भर्ती का रास्ता खुलेगा.''
दूसरी चिंता अग्निवीरों में प्रेरणा और प्रतिबद्धता के स्तर को लेकर जताई गई थी. इसे लेकर अशोक कुमार का कहना है कि सेना में कभी नहीं देखा गया कि कम वक्त के लिए सेवा में रहे फौजियों ने कमतर प्रदर्शन किया. इसलिए यह कहना कि चार साल की सेवा में प्रतिबद्धता कम होगी, सही नहीं होगा.
अग्निपथ का एक और असर हो सकता है, जिसके बारे में अभी कोई पक्के तौर पर नहीं कह रहा, लेकिन भविष्य की राह वही है-फोर्स ऑप्टिमाइजेशन. यह सभी जानते हैं कि सरकार सेना में सैनिकों की संख्या को कम करना चाहती है. इनकी जगह उन्नत तकनीक और उपकरण लेंगे. इस सब में अग्निपथ की भूमिका के बारे में राकेश शर्मा कहते हैं, ''संभव है कि फोर्स ऑप्टिमाइजेशन में अग्निपथ मॉडल की भूमिका हो, लेकिन अंतिम रोडमैप सरकार के पास ही है. इसीलिए अभी कुछ दिन इंतजार करना चाहिए.''
इन बातों से लगता है कि अग्निपथ योजना को लेकर जताई जा रही सभी चिंताएं जायज नहीं हैं. अब बस एक चुनौती है, हिंदी पट्टी में कुछ सालों से भर्ती की तैयारी में लगे युवाओं को इसके लिए राजी कर पाना. अग्निपथ के मौजूदा स्वरूप को लेकर हम बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में विरोध प्रदर्शन देख रहे हैं. वैसे युवाओं की नाराजगी शांत करने के लिए 16 जून की रात रक्षा मंत्रालय ने 2022 में होने वाली भर्तियों के लिए ऊपरी आयु सीमा 21 से बढ़ाकर 23 साल कर दी है ताकि कोरोना काल में जो युवा आयु सीमा पार कर गए, उन्हें एक मौका मिल जाए. रही बात राष्ट्रीय सुरक्षा पर अग्निपथ के असर की, तो उसे अच्छे से समझने में हमें एक दशक तक लग सकता है.
-निखिल धनराज वाठ