जंगल में विरोध के स्वर

हसदेव अरण्य जैव-विविधता के लिहाज से समृद्ध जंगल है, जिसे बचाने लिए आदिवासी खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं

एकजुटता : छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री टी.एस. सिंहदेव हसदेव अरण्य में प्रदर्शनकारियों के साथ
एकजुटता : छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री टी.एस. सिंहदेव हसदेव अरण्य में प्रदर्शनकारियों के साथ

उत्तर छत्तीसगढ़ के प्राचीन जंगलों में कोयला खुदाई को लेकर चल रहा विवाद पिछले हफ्ते उस वक्त चर्चा के केंद्र में आ गया जब राज्य सरकार ने वहां शुरुआती काम रोक दिया. स्थानीय आदिवासी संगठन महीनों से अंबिकापुर जिले के हसदेव अरण्य में परसा ईस्ट केते बासन (पीईकेबी) फेज 2 और परसा कोयला खनन परियोजनाओं के विरोध की अगुआई करते आ रहे हैं. ज्यादातर साल के पेड़ों से आच्छादित हसदेव अरण्य जैव-विविधता के लिहाज से समृद्ध घना जंगल है. यह जंगल हसदेव सहित छत्तीसगढ़ की कुछ और अहम नदियों का जल भराव क्षेत्र भी है. इस क्षेत्र में कुल चार कोयला खनन परियोजनाएं हैं—परसा, पीईकेबी फेज 1 और 2 और केते विस्तार परियोजना. चारों का काम अलग-अलग चरणों में है और फिलहाल केवल पीईकेबी की खुदाई चल रही है.

हालात तब तेजी से बिगड़े जब परसा और पीईकेबी फेज 2 परियोजना स्थलों पर पेड़ों की कटाई शुरू हुई और उन्हें बचाने की खातिर प्रदर्शनकारी पेड़ों से लिपटकर खड़े हो गए. अंबिकापुर के कांग्रेस विधायक और स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव 6 जून को हरिहरपुर स्थित घटनास्थल पर गए, प्रदर्शनकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए और कहा कि अगर नौबत आई तो इस मकसद के लिए ''पहली गोली मैं खाऊंगा.'' इसके चलते फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (सिंहदेव उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं) ने भी सुलह का रुख अपनाते हुए कहा, ''पेड़ तो छोड़िए, सिंहदेव से पूछे बगैर एक डाल तक नहीं काटी जाएगी.'' 

तो क्या मसला सुलझ गया? शायद नहीं. इसे शुरू से समझते हैं, जब छत्तीसगढ़ में 2007 से खुदाई के लिए कोयला खदानें आवंटित करने की शुरुआत हुई. केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 2009 में कुछ निश्चित 'नो गो' क्षेत्रों यानी निषिद्ध क्षेत्रों की पहचान की जहां पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाला काम नहीं किया जाना था. परसा, पीईकेबी फेज 1 और 2 सभी 'नो गो' क्षेत्र के भीतर हैं. 2011 में पीईकेबी को वन मंजूरी दी गई और फेज 1 का काम शुरू हुआ. 2014 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने एक याचिका के जवाब में पीईकेबी फेज 1 पर खुदाई रोक दी. मगर यह रोक ज्यादा वक्त नहीं रही. मामला अंतत: सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, जिसने एक जांच का आदेश दिया (जो 2019 तक नहीं हुई).

यह जांच भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद (आइसीएफआरई) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) ने की और वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने अक्तूबर, 2021 में खुदाई के लिए हरी झंडी दिखा दी. सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वरिष्ठ वकील सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, ''मगर डब्ल्यूआइआइ की रिपोर्ट में उठाई गई आपत्तियों पर विचार ही नहीं किया गया.''

पीईकेबी फेज 2 के आसपास विरोध प्रदर्शनों में घाटबर्रा, साल्ही, फतेहपुर, हरिहरपुर और बासेन गांव शामिल हैं, जिनके करीब 1,000 परिवार प्रभावित होंगे. परियोजना का विरोध कर रहे संगठन छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं, ''विरोध पर्यावरण और कानून के आधार पर किया जा रहा है. हसदेव अरण्य शायद मध्य भारत का सबसे अच्छा जंगल और हसदेव नदी का जल भराव क्षेत्र है. आदिवासियों की आजीविकाएं इस जंगल पर निर्भर हैं. डब्ल्यूआइआइ के अध्ययन ने साफ तौर पर परियोजना का विरोध किया और कहा कि खुदाई से इनसानों और हाथियों के बीच का टकराव और तीव्र हो जाएगा. और वैसे भी छत्तीसगढ़ में इस तरह की घटनाओं से हर साल कई जानें जाती हैं.'' शुक्ला यह भी दावा करते हैं, ''हसदेव अरण्य अनुसूचित 5 क्षेत्र में है जहां कानून के मुताबिक किसी भी तरह की खुदाई के लिए ग्राम सभा की मंजूरी अनिवार्य है. मंजूरी लेने का जो दावा किया जा रहा है, वह धोखे से ली गई थी, क्योंकि ग्रामीण तो 2014 से ही लगातार परियोजना का विरोध कर रहे हैं.''

इस कोयला खनन परियोजना को लेकर न केवल कांग्रेस के सियासतदां एक दूसरे के आमने-सामने आ गए बल्कि विपक्षी बीजेपी भी यह कहकर इसमें कूद पड़ी कि आदिवासियों की बात सुनी जाए. दिलचस्प बात यह है कि ये चारों कोयला खदानें राजस्थान राज्य विद्युत निगम को सौंपी गई हैं, जबकि अडाणी एंटरप्राइजेज माइन डेवलपर और ऑपरेटर है. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मार्च में रायपुर आए थे और उन्होंने खुदाई में तेजी लाने के लिए बघेल से बात की थी. उनकी यात्रा के एक दिन बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने पीईकेबी फेज 2 के लिए चरण 2 की वन मंजूरी दे दी, जबकि 6 अप्रैल को परसा कोल ब्लॉक के लिए भी यही मंजूरी दे दी गई. इसके बाद आंदोलन ने जोर पकड़ा.

कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य में बिजली की कमी के लिए परियोजना के विरोधियों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की थी. बघेल ने कुछ अरसा पहले इंडिया टुडे से कहा था, ''देश भर में कोयले की कमी है और केंद्र सरकार परियोजना की प्रगति जानना चाहती है. मैं इसे कैसे रोक सकता हूं? लेकिन अगर पर्यावरण या पुनर्वास के नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो हम इसकी जांच करेंगे.''

मगर सिंहदेव के बीच में आने के बाद बघेल नरम पड़ गए लगते हैं. उधर कांग्रेस के केंद्रीय कमान से राहुल गांधी भी इच्छुक पक्षकार बन गए हैं. कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्रों से बात करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि खुदाई की इजाजत के फैसले को लेकर समस्या थी और पार्टी के भीतर इसका समाधान निकाला जा रहा है. राजनैतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि छत्तीसगढ़ ने 'धीमे चलो पर परियोजना को तिलांजलि मत दो' का जो रवैया अपना रखा है, वह राहुल के इसी रुख से ही निकला है.

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