छत्रछाया में छात्रसंघ
ताकत और पैसे के लिए यूनियनों पर कब्जा कायम करने की होड़ मची रहती है

पश्चिम बंगाल में कॉलेज छात्रसंघ लंबे समय से सियासी दबदबा बढ़ाने के खेल में फंसे हैं. कॉलेज सियासी दलों की प्रतिद्वंद्विता के ऐसे अखाड़े बन गए हैं जहां हर चाल बेहद शातिराना होती है. 31 मई को एक कॉलेज के कार्यक्रम में परफॉर्म करने के बाद गायक केके (कृष्णकुमार कुन्नाथ) की दुखद मौत ने गंभीर अव्यवस्था के अलावा कई अन्य चीजों को सतह पर ला दिया है. जिस नजरुल मंच सभागार में यह कार्यक्रम हो रहा था, उसकी क्षमता 2,700 लोगों की है, पर उसमें 7,000 से ज्यादा लोग पहुंच गए. सभागार के एयर-कंडिशनिंग सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया और गर्मी असहनीय हो गई. इस अव्यवस्था से पता चला कि छात्रसंघ इसी तरह मनमाने ढंग से काम करते हैं. संघों (यूनियन) पर कब्जे की होड़ की कई वजहें हैं, पर उन्हें मिलने वाला फंड और कॉलेज प्रशासन पर उनका कथित दबदबा, सबसे बड़ी वजहें हैं.
कलकत्ता विश्वविद्यालय (सीयू) के तहत आने वाले कॉलेज यूनियन के चुनाव, आखिरी बार 2017 में हुए थे. हर यूनियन का कार्यकाल एक साल का होता है, इसलिए 2018 में नए सिरे से चुनाव होने थे, पर तृणमूल कांग्रेस सरकार चुनाव कराने से बच रही है. इसका एक बड़ा कारण उसका यह डर है कि कॉलेज यूनियन उसके हाथ से निकल जाएंगे. दूसरा कारण यह कि वह निर्वाचित यूनियनों की जगह एक मनोनीत छात्र परिषद की व्यवस्था देने की तैयारी में है जिसके सदस्यों की नियुक्ति कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी करेगी. गवर्निंग बॉडी में टीएमसी का दबदबा माना जाता है. सीयू के तहत 150 सरकारी प्रायोजित/मदद प्राप्त कॉलेजों में से केवल एक में वामदलों से संबद्ध यूनियन है; बाकी अधिकतर टीएमसी से जुड़े हैं.
सत्ता और पैसा ही वे कारण हैं जिनके कारण सियासी दलों में छात्रसंघों को अपने कब्जे में रखने की होड़ लगी रहती थी. कॉलेज के उत्सवों के लिए वे 20 से 25 लाख रुपए तक खर्च कर देते हैं जो कि कुछ कॉलेजों के वार्षिक बजट के बराबर है. यूनियनों को प्रत्येक छात्र से यूनियन चार्ज लेने की अनुमति है, जो सालाना 5 से 8 लाख रुपए आता है और उसे कॉलेज फीस में जोड़ा जाता है. बाकी पैसा कहां से आता है, इसके बारे में अधिकारियों को ज्यादा जानकारी नहीं है.
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के नेता देबंजन डे के अनुसार, यह पैसा सीटों के बेचने जैसे ''गैर-कानूनी तरीकों'' से जुटाया जाता है. डे कहते हैं, ''जब प्रक्रिया डिजिटल नहीं थी तब दाखिले में यूनियनों का नियंत्रण सबसे अधिक होता था. शहर के एक कॉलेज में भूगोल (ऑनर्स) में एक सीट की कीमत 1,00,000 रुपए से 1,20,000 रुपए के बीच होती है और विज्ञान विषयों के लिए सीटों की कीमत 50,000 रुपए से 70,000 रुपए के बीच होती है.'' दाखिला प्रक्रिया के ऑनलाइन होने के बावजूद, बताया जाता है कि छात्रसंघ दूसरी/तीसरी सूची में भी खाली रह गईं सीटों को बहुत महंगे दामों पर बेच देते हैं. इस प्रकार भर्ती हुए छात्रों को विभिन्न कॉलेज कार्यक्रमों के लिए पैसे देने पड़ते हैं, यहां तक कि कथित तौर पर स्थानीय (टीएमसी) नेताओं का जन्मदिन मनाने के लिए भी.
धन जुटाने के अलावा—कई लोगों का आरोप है कि यूनियन ने केके के कॉन्सर्ट के 'एक्सट्रा' टिकट 3,000 रुपए में बेचे थे. उसका एक हिस्सा कथित रूप से टीएमसी के नेताओं की झोली में गया क्योंकि कॉलेज छात्रसंघ पार्टी के भी कई खर्चे उठाते हैं. कोलकाता के एक सेंट्रल कॉलेज के एक छात्र का कहना है, ''युवाओं के दिमाग में पार्टी की विचारधारा भरने के लिए कॉलेज सबसे अच्छा मैदान है.'' वामपंथी झुकाव वाले पश्चिम बंगाल कॉलेज और यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुबोधॉय दासगुप्ता कहते हैं, ''उत्सवों के लिए भारी-भरकम पैसा किस स्रोत से आता है, यह एक रहस्य है. स्थानीय नेता अपने अधिकार क्षेत्र में कॉलेजों को नियंत्रित करते हैं. कॉलेज के प्रिंसिपल अक्सर दबाव के आगे घुटने टेक देते हैं.''
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब यूनियनों पर सख्ती करने के लिए फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने जैसी बातें कर रही हैं. पर कॉलेजों के छात्रसंघों की काफी पुरानी मनमानी को देखते हुए यह आसान काम नहीं होगा.