बड़बोले पड़े भारी

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संयमित रुख दिखाते हुए कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मथुरा और ज्ञानवापी विवाद में अदालत के फैसले का सम्मान करेगा

निलंबित : भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा
निलंबित : भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा

पैगंबर के खिलाफ भाजपा के कुछ शीर्ष नेताओं की टिप्पणियों ने मुस्लिम जगत में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो आग लगाई, उसे बुझाने के लिए केंद्र सरकार को बहुत मशक्कत करनी पड़ रही है. पार्टी ने राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा को निलंबित कर दिया है और दिल्ली भाजपा के मीडिया सेल के प्रमुख नवीन कुमार जिंदल को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. सरकार ने उन्हें ''हाशिए के तत्व'' बताते हुए मामले को हल्का करने की कोशिश की है.

लेकिन जहां पश्चिम एशिया और अन्य जगहों पर तैनात भारत के राजदूत भाजपा नेताओं के बयानों से हुए नुक्सान को नियंत्रित करने में जुटे हैं, वहीं भारत में भाजपा नेतृत्व के सामने अपने उग्र दक्षिणपंथी समर्थकों को शांत करना भी एक कठिन चुनौती है. वैज्ञानिक और दक्षिणपंथी विचारक आनंद रंगनाथन ने ट्वीट किया कि ''मुसलमानों ने भाजपा को केवल झुकने को कहा था, वह तो रेंगने लगी.'' सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे अन्य लोगों ने इसे ''छोटे से मुल्क कतर के सामने मोदी सरकार का दंडवत'' बताया. समर्थकों ने जैसे ही सपोर्ट नूपुर शर्मा के हैशटैग के साथ सोशल मीडिया पर अभियान चलाया, हर तरफ से उनके लिए समर्थन की बाढ़ आ गई. हालांकि, एक शीर्ष भाजपा नेता सरकार के कदम का बचाव करते हैं, ''हमारी मुसलमानों से कोई लड़ाई नहीं है... 500 साल पहले के लोगों ने जो कुछ किया, उसके लिए आज के मुसलमानों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.'' 

अपने बचाव में, नूपुर ने कहा कि वे भगवान शिव के साथ हुए ''अपमान'' से बहुत आहत महसूस कर रही थीं और उनकी टिप्पणी इसी की प्रतिक्रिया थी, जबकि जिंदल ने चुपचाप अपने आपत्तिजनक ट्वीट हटा दिए. लेकिन तब तक काफी नुक्सान हो चुका था. कानपुर में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए. पुलिस ने कार्रवाई की और 7 जून को 12 लोगों को गिरफ्तार भी किया. भाजपा युवा मोर्चा के नेता हर्षित श्रीवास्तव लाला उन लोगों में शामिल थे, जिन्हें कथित तौर पर पैगंबर से संबंधित ट्वीट और अन्य भड़काऊ मैसेज के लिए गिरफ्तार किया गया था.

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया, खासकर खाड़ी देशों में विरोध, ने पार्टी की समस्याओं को और बढ़ा दिया है. यह विशेष रूप से शर्मनाक हो गया क्योंकि नई दिल्ली के साथ अरब देशों के राजनयिक संबंधों के 50 साल पूरे होने का जश्न मनाने के तौर-तरीकों पर चर्चा के लिए उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू कतर की आधिकारिक यात्रा पर थे और उसी दौरान यह सब हो गया. सोशल मीडिया पर भारतीय उत्पादों का बहिष्कार करने, हमारी श्रम शक्ति को काम पर न रखने आदि के संदेशों की बाढ़ आ गई. कतर के नायब अमीर ने उपराष्ट्रपति के साथ दोपहर के भोजन पर होने वाली अपनी मुलाकात ''चिकित्सा कारणों'' का हवाला देते हुए रद्द कर दी. मीडिया के तीखे सवालों की आशंका से, नई दिल्ली ने भी कतर में नायडू की निर्धारित प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर दी.

5 जून को, कतर के विदेश मंत्री सुल्तान बिन साद अल-मुरैखी ने भारत के राजदूत दीपक मित्तल को तलब किया और एक आधिकारिक नोट सौंपा जिसमें ''भारत के सत्तारूढ़ दल के एक नेता द्वारा पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ की गई विवादास्पद टिप्पणियों पर कतर की ओर से निराशा जताते हुए कड़ी निंदा की गई है.'' जैसे ही यह खबर फैली, पश्चिम एशिया के अन्य देशों जैसे ईरान, सऊदी अरब और कुवैत ने भी अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए वहां के भारतीय दूतों को बुलाया. जल्द ही, ओआइसी (इस्लामिक सहयोग संगठन), पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों ने भी निंदा करनी शुरू कर दी. 

भारत के लिए, पश्चिम एशिया और विशेष रूप से खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देश महत्वपूर्ण साझेदार हैं. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के 40 फीसद से अधिक के लिए उन पर निर्भर है, जबकि 59 लाख से अधिक भारतीय इन देशों में काम करते हैं और वहां से अरबों रुपए भारत भेजते हैं. अकेले जीसीसी देशों के साथ, भारत 155 अरब डॉलर से अधिक का व्यापार करता है. पिछले आठ वर्षों में, प्रधानमंत्री मोदी ने इन देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने में जोर लगाया है. 

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि बड़बोले नेताओं के बयान पार्टी की घोषित लाइन के विपरीत थे. एक शीर्ष नेता कहते हैं, ''प्रवक्ता सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों के रूप में टीवी बहस में भाग लेते हैं...जिन्हें यह विशेषाधिकार मिला हो उन्हें मर्यादाओं का ध्यान रखना होता है.'' हालांकि, आलोचकों का कहना है कि पार्टी ने लंबे समय से नूपुर और आदतन सीमाएं लांघने वाले उन जैसे अन्य पदाधिकारियों को काफी छूट दे रखी है. 

पार्टी सूत्रों का दावा है कि घटना का समय दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), स्वयंभू छुटभैयों द्वारा हिंदुत्व की बहस को अपने हाथ में लेने की कोशिशों को रोकने में जुटे हैं. उनका कहना है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण कराने से पीएम मोदी को और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार को दूसरा कार्यकाल मिलने से बहुत राजनैतिक लाभ हुआ है और पार्टी हिंदुत्व के बड़े एजेंडे को आगे बढ़ाने की अगुआई करने को तैयार है. दरअसल, भाजपा शासित राज्यों ने समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण विरोधी कानून जैसे विवादास्पद मुद्दों को फिर से उठाना करना शुरू भी कर दिया था. 

भाजपा अब हिंदुत्व की लाइन पर सावधानी से चल रही है. पार्टी की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब हुई है, और देश के भीतर भी इसका मुस्लिम समुदाय के साथ कोई स्पष्ट जुड़ाव नहीं दिखता. दरअसल, कैबिनेट मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, एम.जे. अकबर और प्रवक्ता सैयद जफर इस्लाम के राज्यसभा से सेवानिवृत्त होने के बाद पार्टी का संसद में कोई मुस्लिम चेहरा नहीं होगा. 

मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि स्थल और वाराणसी के ज्ञानवापी में मस्जिदों को लेकर चल रहे विवाद में भी पार्टी और आरएसएस नेतृत्व संयमित रुख अपना रहा है. 2 जून को, नागपुर में आरएसएस के एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, ''इतिहास को बदला नहीं जा सकता. इस्लामी आक्रमणकारियों ने बहुत से मंदिरों को अपवित्र किया था...लेकिन इस मुद्दे को केवल उन जगहों पर उठाया गया है जहां से हिंदुओं की विशेष आस्था जुड़ी है.'' उन्होंने इसमें जोड़ा कि ''अगर मामला अदालत में जाता है, तो उसका फैसला दोनों पक्षों को स्वीकार्य होना चाहिए.'' दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने भी इसी लाइन पर बात की, ''अदालत और संविधान इन (दो विवादित जगहों पर विवाद) पर फैसला करेंगे और भाजपा उनके फैसले को अक्षरश: स्वीकार करेगी.'' 

इस बीच जमीन पर यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है. कथित तौर पर अल कायदा ने आत्मघाती हमलावर भेजने की धमकी दी है, हत्या की कथित धमकी के बाद दिल्ली पुलिस ने नूपुर की सुरक्षा बढ़ा दी है, जबकि यूपी में, योगी सरकार बुलडोजर और कानपुर में 40 दंगाइयों की सूची के साथ ऐक्शन में आ गई है. यही उम्मीद की जा सकती है कि जल्द ही शांति बहाल हो जाएगी. 

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