द्रविड़ भूमि पर कैसे जमें पांव
अन्नाद्रमुक के हमले के बावजूद अन्नामलै गठबंधन को खतरे में नहीं डालना चाहते

अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक)-भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) गठबंधन के लिए हालात अच्छे नहीं नजर आ रहे. असल में, तमिलनाडु से आ रहे कुछ बयानों को भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों के लिए शर्मिंदगी और चेतावनी, दोनों रूप में देखा जाना चाहिए. पूर्व मंत्री और अन्नाद्रमुक के मदुरै पश्चिम के विधायक सेलूर के. राजू ने 4 जून को राज्य भाजपा प्रमुख के. अन्नामलै पर आगे निकलने के लिए ''अनावश्यक हड़बड़ी पैदा करने'' का आरोप लगाया. राजू द्रविड़ प्रदेश में भाजपा की उज्ज्वल संभावनाओं के अन्नामलै के लगातार दावों की ओर इशारा कर रहे थे—खासकर उनकी यह टिप्पणी कि भाजपा अब राज्य की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है—बावजूद इसके कि कांग्रेस का '60 के दशक में द्रविड़ पार्टियों के उभार से पहले सियासी दबदबा था. राजू ने दिलचस्प तुलना करने में कोई कंजूसी नहीं बरती और कहा, ''भाजपा के लिए जो भीड़ जुटती है, वह कौए के झुंड की तरह होती है, जो कुछ न मिलने पर उड़ जाएगी. हमारे कार्यकर्ता रोटी के टुकड़े का इंतजार करने वाले कौए नहीं हैं. वे विचारधारा से निर्देशित होते हैं.''
इस बयान ने अन्नाद्रमुक के भीतर फैली नाराजगी का संकेत दिया, यहां तक कि इसमें अस्तित्व को लेकर भी अंदेशे का भाव है. अन्नाद्रमुक के संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन के सहयोगी और पार्टी के दिग्गज नेता तथा संगठन सचिव सी. पोन्नैयन ने भाजपा पर अन्नाद्रमुक की कीमत पर अपना आधार बढ़ाने के लिए ''दोहरे मापदंड'' अपनाने का आरोप लगाया था. उसके कुछ ही दिनों बाद यह बयान सामने आया. पोन्नैयन ने कार्यकर्ताओं को आगाह करते हुए कहा था, ''अगर हमें भाजपा के सामने नहीं झुकना है तो हमें अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा और प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभानी होगी.'' उन्होंने कहा, ''भाजपा का उभार न केवल अन्नाद्रमुक बल्कि सामान्य रूप से द्रविड़ राजनीति के लिए भी अच्छा नहीं होगा.'' साफ तौर पर, 2016 में करिश्माई जे. जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक ने राज्य में भाजपा से सहयोग का जो रास्ता चुना, उसका यही नतीजा निकलना था: क्षेत्रीय संघर्ष.
अन्नाद्रमुक की सहयोगी की भूमिका निभाने में संतुष्ट होने की बजाए, भाजपा को सबसे आगे रखने की अन्नामलै की आक्रामक शैली को लेकर ज्यादा नाराजगी है. केवल वही नहीं, पार्टी के अन्य नेताओं का भी ऐसा ही रुख है. अन्नाद्रमुक की अपदस्थ नेता वी.के. शशिकला की पार्टी में फिर से वापसी की अटकलों को लेकर भाजपा विधायक एन. नागेंद्रन ने कहा, ''अगर अन्नाद्रमुक अपनी पूर्व अंतरिम महासचिव (शशिकला) को फिर से शामिल नहीं करना चाहती तो हम उनका भाजपा में स्वागत करेंगे.'' लेकिन पूर्व आइपीएस अधिकारी और 4 जून को 38 साल के हो गए अन्नामलै इस झगड़े के केंद्र में हैं. वे पार्टी में जिस तेजी से ऊपर चढ़े हैं, इस वजह से सबका ध्यान उनकी ओर गया है.
वे 2020 में ही भाजपा में शामिल हुए थे, और जुलाई 2021 में उन्हें—अब तक का सबसे युवा—राज्य अध्यक्ष बना दिया गया. उनका संदेश साफ है: तमिलनाडु की राजनीति में कोई वजूद नहीं रखने वाली भाजपा को प्रभावशाली ताकत के रूप में बदलने के पुराने मकसद को आगे बढ़ाना. अपनी सांगठनिक क्षमता—पार्टी में युवाओं की तेजी से भर्ती—और अपनी सार्वजनिक घोषणाओं के जरिए अन्नामलै वाकई अपनी छाप छोड़ रहे हैं.
उनके आलोचक उन पर अंतरराज्यीय जल विवादों और भाषा की राजनीति में तमिलनाडु को धोखा देने का आरोप लगाते हैं. इसके जवाब में अन्नामलै का कहना है कि वे हिंदी नहीं जानते और तमिलों पर इसके थोपे जाने का विरोध करते हैं तथा वे खुद को शुद्ध द्रविड़ कहते हैं. उन्होंने अपने विभिन्न ट्वीट में इस बात पर जोर दिया कि भाजपा तमिल का विरोध नहीं करती है. वे विपक्षी राजनीति में भी माहिर हैं और काडर को संगठित करने के लिए खूब यात्राएं करते हैं. सत्तासीन द्रमुक पर तलवार भांजने के लिए वे शासन की कथित खामियों पर तीखी नजर रखते हैं.
इंजीनियर और आइआइएम लखनऊ से स्नातक भाजपा अध्यक्ष अन्नाद्रमुक के नाराज नेताओं के दांव में फंसने और गठबंधन को खतरे में डालने की इच्छा नहीं रखते. कई लोगों को लगता है कि यह भाजपा के जमीनी स्तर पर बढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं है. तो क्या अन्नामलै का मुख्य एजेंडा बस अपने लिए 'अच्छी जगह' बनाना है. इसकी मिसालें भी हैं. पूर्व राज्य भाजपा अध्यक्ष तमिलीसाई सुंदरराजन अब तेलंगाना और पुदुच्चेरी की राज्यपाल हैं, तो उनके उत्तराधिकारी एल. मुरुगन मोदी के मंत्रालय में हैं.